पुष्यमित्र
जब मैं लिखता हूं कि पत्रकार का काम शास्वत विपक्ष हो जाना है तो कई मित्र को आपत्ति होती है। उन्हें लगता है कि पत्रकारों को सरकार के काम काज की तारीफ भी उतनी ही करनी चाहिये, जितनी उसकी नाकामियों की आलोचना। और अगर फेसबुक जैसा माध्यम हो तो लोग अपेक्षा करते हैं कि हर एक सरकार विरोधी पोस्ट के बाद अगली पोस्ट सरकार की तारीफ वाली लिखी जाये, ताकि बैलेंस बना रहे। ऐसा कहने वालों में बड़ी संख्या बीजेपी सोशल मीडिया ट्रोल्स की है, जिन्हें यही भूमिका दी गयी है कि वह सरकार के खिलाफ लिखने वाले हर पत्रकार का मानसिक उत्पीड़न करे, ताकि वह परेशान होकर लिखना बन्द कर दे। ऐसे लोग कई बार असली, कई बार फेक नाम से आकर यह सब करते हैं। उनकी पहचान यह है कि आपके दुत्कारने के बाद भी वे लगे रहते हैं। दिलचस्प है कि कई दफा वे मजबूत कुतर्क भी ढूंढ लाते हैं, क्योंकि वे वाट्सएप के जरिये आईटी सेल से जुड़े रहते हैं, जहां से ऐसे कुतर्क की सप्लाई होती है। ऐसे ट्रोल्स को संतुष्ट करने का मेरा कोई इरादा नहीं है। क्योंकि ये होंगे भी नहीं। मगर कई दफा इन ट्रोल्स की वजह से जेनुइन किस्म के मित्र भी भ्रमित हो जाते हैं कि आखिर यह आदमी क्यों लगातार सरकार की आलोचना करता है, यह कैसी पत्रकारिता है? यह पोस्ट उन्हीं मित्रों के लिये है। उनका जवाब इस पोस्ट से लगी तस्वीर में है। इसमें जो तीन लोग दिख रहे हैं, उनमें बड़े को सरकार मानिये, मझोले को विपक्ष और छोटे को जनता। आपकी अपेक्षा है कि पत्रकार पहली तस्वीर की तरह तीनों को बराबर महत्व दे। मगर क्या यह न्याय है?

आज की तारीख में सरकार के पास अपनी बात रखने के कई माध्यम हैं। अपनी उपलब्धियों के प्रचार प्रसार के लिये जनसंपर्क विभाग है जिससे वह हर साल अखबारों और अन्य समाचार माध्यमों को अरबों के विज्ञापन जारी करता है। इन विज्ञापनों से मिलने वाली धनराशि के एवज में वह सरकार की तारीफ छापने के लिये मजबूर भी होता है। सभी सरकारें इस राशि का दुरुपयोग अपनी पार्टी की छवि चमकाने के लिये करती है। यहां तक कि इस राशि से कई बार चुनाव प्रचार तक होते हैं।मगर विपक्ष अमूमन इस सुविधा से वंचित रहता है। चुकी समाचार माध्यमों को धन से प्रभावित करने के लिये उसके पास अपेक्षाकृत कम संसाधन होते हैं, ऐसे में इन माध्यमों में खुद बखुद विपक्ष की आवाज कम सुनायी देती है। अगर आप इस विषय को लेकर गम्भीर हैं तो किसी भी प्रमुख अखबार या टीवी चैनल के चुनाव से पहले के एक महीने का विश्लेशण कर लें कि उसमें सत्ता पक्ष से जुड़ी कितनी खबरें हैं और विपक्ष की कितनी खबरें। मेरा दावा है कि इसका अनुपात सामान्यतः तीन अनुपात एक या चार अनुपात एक होता है। कई बार तो यह दस अनुपात एक तक चला जाता है।

बिहार के अखबारों का ही उदाहरण लेता हूं, सामान्य दिनों में वे पहले पन्ने पर लगभग रोज नीतीश या मोदी के बयान को जगह देते हैं और राहुल या तेजस्वी के बयान आपको पहले पन्ने पर महीने में चार दिन भी नहीं मिलेंगे। राज पाट के पन्ने पर तेजस्वी के बयान को छापने का हर अखबार का फिक्स फॉर्मेट है। बयान के साथ जदयू प्रवक्ता संजय सिंह का उस बयान का खंडन भी छपता है। लगभग बराबर स्पेस के साथ। दो कालम की खबर में आधा तेजस्वी का बयान होता है और आधे में संजय सिंह का जवाब। जबकि नीतीश जी का बयान अमूमन रोज पहले पन्ने पर लीड छपता है। कम से कम तीन या चार कालम में। यह असन्तुलन ही वह वजह है जो मेरे जैसे पत्रकार को विपक्ष की आवाज को प्रमुखता से उठाने के लिये प्रेरित करती है। क्योंकि लोकतंत्र में विपक्ष की आवाज अगर दब जाये तो सत्ता तानाशाह हो जाती है।

मगर पत्रकार के लिये सबसे जरूरी उस तीन नम्बर के बच्चे यानी जनता की आवाज बनना है जिसके पास अपनी आवाज मीडिया में गूंजाने के लिये कोई संसाधन नहीं है। इसलिये एक निष्पक्ष पत्रकार सत्ता की खबर को रोक कर जनता की खबर को प्राथमिकता देता है। जैसा दूसरी तस्वीर में दिख रहा है। मेरे हिसाब से तो पत्रकारिता की निष्पक्षता वही है जो दूसरे तस्वीर में दिख रही है। अगर आप पहली तस्वीर को निष्पक्षता का उदाहरण मानते हैं तो आप शौक से मुझे एकपक्षिय, एजेंडा सेट करने वाला, और असंतुलित पत्रकार कह सकते हैं। यह आपकी इच्छा है।हालांकि आप यह नहीं देखते कि आज के करप्ट दौर में कई मीडिया हाऊस ने तीनों बॉक्स सरकार को ही दे दिये हैं और विपक्ष और जनता कुछ भी नहीं कह पा रही। वह भी देखिये।

और हां, जिस रोज आप यह देखें कि मैंने जनता के बॉक्स छीन कर भी विपक्ष को दे दिये हैं उस रोज आप जरूर मुझे सेटिंगबाज पत्रकार कहें।

पुष्यमित्र। पिछले डेढ़ दशक से पत्रकारिता में सक्रिय। गांवों में बदलाव और उनसे जुड़े मुद्दों पर आपकी पैनी नज़र रहती है। जवाहर नवोदय विद्यालय से स्कूली शिक्षा। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता का अध्ययन। व्यावहारिक अनुभव कई पत्र-पत्रिकाओं के साथ जुड़ कर बटोरा। प्रभात खबर की संपादकीय टीम से इस्तीफा देकर इन दिनों बिहार में स्वतंत्र पत्रकारिता  करने में मशगुल ।