ब्रह्मानंद ठाकुर

तस्वीर सौजन्य- अजय कुमार कोसी बिहार

चुल्हन भाई तीन दिन पर ससुराल से लौटे हैं। वैसे वे यदा -कदा विशेष काज -परोजन पर ही ससुराल जाते हैं। इधर दो साल से वे ससुराल नहीं गये थे। इसबार उनके ससुराल जाने का खास मकसद था। बात यह थी कि धनेसरा का तीन बरीस का बेटा इधर कुछ समय से बीमार रहने लगा है। हाथ -गोर सूख कर कांटा हो गया है। कुम्हकरनी मउसी कहती है कि उसको ममरखा रोग है। ममरखा माने सुखइनी रोग। जिसमें हाथ -गोर सूखने लगता है और बच्चा हर समय आंख मिलमिलाता रहता है। देह में तनिको दम्मे नहीं रहता है। गाव में लोगों का मानना है कि यह बीमारी झाड़-फूंक से दूर हो जाती है और बच्चा बिल्कुल तंदुरुस्त हो जाता है।

घोंचू उवाच-10

कुम्हकरनी मौसी का नइहर और चुल्हन भाई का ससुराल एक्के गांव में है। उस गांव में ममरखा झाड़ने वाला एक गुनी ओझा है। उसका एकबाल इतना बढा हुआ है कि दूर-दूर से लोग एतबार मंगल को अपने बच्चे का ममरखा झड़वाने वहां पहुंचते हैं। बस, टेम्पू और मोटर साइकिल से भी। बस से जिस जगह पर लोग उतरते हैं, उस जगह का नामे ममरखा चौक हो गया है। हमारे इलाके के बैगन चौक की तरह। सैंकड़ों की भीड़ लगती है इस ममरखा झाड़ने वाले के दरबाजे पर। पीड़ित बच्चे का गार्जियन बच्चा को गोदी में लिए रहता है और ममरखा झाड़ने वाला पांच गो दूभी का मुड़ी लेकर उस बच्चे के माथ से नाक तक पांच बार कुछ कुछ बुदबुदाते हुए ऊपर से नीचे करता रहता है। और बच्चे की नाक से दू – चार गो छोटा – छोटा पिलुआ नीचे गिर जाता है। ऊ पिलुआ एतना छोट और महीन होता है कि ठीक से बुझैबो नहीं करता है। बस झाड – फूंक करने वाला जब कहता है कि देखू ,देखू पिलुआ गिर रहल हय और लोग मान लेते हैं कि जरूर ई पिलुए होगा।

तस्वीर सौजन्य- अजय कुमार कोसी बिहार

‘यही पिलुआ ममरखा रोग का कारण है ‘ झाड़ – फूंक करने वाला वह ओझा बच्चे के गार्जियन को आश्वस्त करता है कि चार – पांच एतबार – मंगल को झाड़ देने से बच्चा ठीक हो जाएगा। अभी तक कितने को अच्छा हुआ है इसका कोई सबूत नहीं है। खर्चा भी कोई ज्यादा नहीं। एक दिन का मात्र 10 रुपइया। आने – जाने का खर्चा अलग। सो चुल्हनभाई धनेसरा के साथ उसके बच्चे का ममरखा झड़वाने सनीचर के ससुराल गये थे। एतबार और मंगल को ममरखा झड़वा कर आज दोपहर लौटे हैं। आज शाम की बतकही में जब वे शामिल हुए तो उन्होंने ममरखा झाड़ने का आंखों देखा हाल बताते हुए घोंचू भाई से कहा -‘ बड़ा कारगर और सस्ता उपाय है ममरखा छुड़ाने का हो घोंचू भाई। हमको त पूरा भरोसा हय कि धनेसरा का बेटा इसी झाड़ फूंक से ठीक हो रहा है। दू दिन मे ही आठ -दस गो पिलुआ गिरा है।अही से न ऊ बराब नाक मे अंउरी करता रहता है।

घोंचू भाई को चुल्हन भाई की ई झाड़- फूंक और मंतर -तंतर की बात रास नहीं आई। उन्होंने छूटते ही कहा – ‘ देखो चुल्हन भाई, दुनिया विज्ञान की बदौलत मंगल ग्रह पर चली गई और तुम अब भी आदिम समाज की तरह झाड़-फूंक, जादू – टोना में फंसे हुए हो। क्या इसी भाववादी सोच से संसार का भला होगा ? हर्गिज नहीं। हमें अपनी सोच बदलनी होगी और इसके लिए भाववादी तरीके से नहीं, वस्तुवादी तरीके से सोचना होगा, बताओ तो जिसके नाक और सिर में पिलुआ हो जाए तो भला वह जिंदा रह पाएगा ? यह सब हाथ की सफाई है। सीधे – सादे लोगों को ठगने का काम है यह। तंत्र – मंत्र , जादू – टोना और झाड़- फूंक इसी भाववादी चिंतन पद्धति की उपज है।

तस्वीर सौजन्य- अजय कुमार कोसी बिहार

घोंचू भाई की यह बात जब मेरी समझ में नहीं आई तो मैंने उनसे पूछ ही दिया ‘जरा समझा कर कहिए घोंचू भाई। ई भाववादी और वस्तुवादी चिंतन आखिर है क्या ? और इससे झाड़फूंक का सम्बंध आप काहे बता रहे हैं ?’ घोंचू भाई कहने लगे- ‘आदिम समाज के इतिहास से यह पता चलता है कि आदिम मानव का चिंतन भौतिकवादी था, भाववादी नहीं। तब आदिम मानव के चिंतन में भाववाद का कहीं नामोनिशान तक नहीं था। इसी भौतिकवादी चिंतन को लेकर मानवसमाज की विकास यात्रा शुरू हुई थी। काफी समय बाद भौतिकवादी चिंतन के साथ-साथ मानव समाज में भाववादी चिंतन भी पैदा हुआ। इसी के बाद से भौतिकवादी और भाववादी चिंतन, ये दो चिंतन पद्धति मानव समाज में साथ – साथ चलती आ रही है।

यह कहते हुए मेरे मन में घोंचू भाई ने एक जिज्ञासा पैदा कर दी। फिर मैंने उनसे पूछा ‘ घोंचू भाई, आदि मानव का शुरुआती चिंतन जब भौतिकवादी था तो फिर किस परिस्थिति में भाववादी चिंतन पैदा हुआ ? ‘ देखिए , इतिहास बताता है कि आदिम मानव सुपर नैचुरल फोर्स के बारे में पूरी तरह अनभिज्ञ था। इस बारे में उसकी कोई धारणा नहीं थी। लेकिन तब उसकी एक धारणा यह थी कि शक्ति का माने ही है भौतिक शक्ति, वस्तु की शक्ति। तब यह भौतिक शक्ति उसके लिए अनिष्टकारी थी, अमंगलकारी थी और दुर्जेय भी थी। चाहे वह पत्थर की शक्ति हो, हवा की शक्ति हो, हिंसक जानवर की शक्ति हो,आग की शक्ति हो या पानी की शक्ति।

सच में देखा जाए तो यह केवल वस्तु की ही शक्ति है। जब कहीं एक पत्थर ऊपर से गिरा और कुछ लोग उसके नीचे दब गये। कुचल कर मर गये। तब आदिम जमाने के मनुष्य ने सोचा कि यह तो भौतिक शक्ति है। उसके सामने भूत, प्रेत, एक अति प्राकृतिक वस्तु निरपेक्ष कोई सत्ता नहीं थी। बल्कि भूत, प्रेत थी, वह पत्थर की शक्ति जो मनुष्य को चोट पहुंचाती थी, उसे दबा देती थी। उस जमाने में आदि मानव ने उस पत्थर को या अन्य भौतिक शक्ति को अपने वश में करने के लिए, उसे संतुष्ट करने के लिए तब उनकी जो आदिम पद्धति थी, उसी के मुताबिक तरह-तरह का उपाय कर उसे वश में लाना या प्रसन्न करना शुरू कर दिया। तंत्र – मंत्र , पूजा -पाठ और जादू – टोना की पैदाइश उसी समय हुई। यही था भाववादी चिंतन।

तस्वीर सौजन्य- अजय कुमार कोसी बिहार

एक तरह से तंत्र – मंत्र ,जादू – टोना को आदिमानव का विज्ञान भी कह सकते हैं जो भौतिक यानि वस्तु की शक्ति को जानने और उसे अपने वश में करने के लिए पहली बार उपयोग में लाया गया। उस अवस्था में विज्ञान आज की तरह विकसित नहीं हुआ था। इसलिए तब मानव समाज ने वस्तु के बारे में जिस रूप में सोचा -समझा उसी तरह कुछ वाहियात काम भी किए। तंत्र- मंत्र को भी हमें इसी रूप में देखना होगा। थोड़ा गौर से देखने-सुनने भर से ही समझा जा सकता है कि ऐसे मंत्रों का न कोई सिर-पैर है और न कोई अर्थ। लेकिन इतना तो सही है कि आदिम जमाने में मनुष्य ने प्राकृतिक शक्तियों पर काबू पाने के लिए ही तंत्र -मंत्र , जप-तप और पूजा-पाठ का सहारा लिया था। यही तंत्र- मंत्र इतिहास के रास्ते चलते हुए अलौकिक, वस्तु निरपेक्ष, अदृश्य दैवी शक्ति को संतुष्ट करने , उसकी पूजा करने की परम्परा से अभिन्न रूप से जुड़ गया। इस तरह भाववाद और ईश्वर तत्व जब समाज में आया तो वही तंत्र- मंत्र उसकी पूजा करने में प्रयुक्त होने लगे।

बस यही कारण है कि आज के इस वैज्ञानिक युग में भी लोग अपना दुख, तकलीफ, पीड़ा और अन्य समस्याओं से मुक्ति के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण और वैज्ञानिक तरीका न अपना कर तंत्र-मंत्र और जादू-टोना का सहारा ले रहे हैं। इससे किसी समस्या का समाधान अब तक न हुआ है और न भविष्य में होने वाला है। धनेसरा के बेटा का ममरखा (सुखइनी) रोग झाड़ -फूंक से नहीं डाक्टरी इलाज से दूर होगा। घोंचू भाई के इस विश्लेषण के बाद परसन कक्का अचानक बोल उठे – ‘ हां चुल्हन, धनेसरा को कहो कि ऊ अपना बेटा को किसी अच्छे डाक्टर से दिखाए। घोंचू भाई ठीके कहते हैं। हम सबों को इस पर गम्भीरता से सोचना होगा। घोंचू भाई ने आज की बतकही में जिस सवाल को उठाया है उससे मेरे मन मे उथल -पुथल मच गया है कि आखिर इस भाववादी चिंतन से समाज को मुक्त कराया जाए तो कैसे? फिलहाल दूर-दूर तक इसकी कोई सम्भावना नहीं दिखाई दे रही है।


ब्रह्मानंद ठाकुर। बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के निवासी। पेशे से शिक्षक। मई 2012 के बाद से नौकरी की बंदिशें खत्म। फिलहाल समाज, संस्कृति और साहित्य की सेवा में जुटे हैं। मुजफ्फरपुर के पियर गांव में बदलाव पाठशाला का संचालन कर रहे हैं।

संबंधित समाचार