ब्रह्मानंद ठाकुर

फोटो- अजय कुमार, कोशी

विप्लव जी इन दिनों गांव आए हुए है। इनका मूल नाम समरेन्द्र कुमार है लेकिन महानगर में जाकर जब लेखकीय पेशा अपना लिए तब से वे समरेन्द्र कुमार विप्लव हो गये हैं। गांव के लोग उन्हें अब भी समरीन्दर, समरीन्दर चच्चा या समरीन्द्र भाई ही कहते हैं। इनके बाप-दादे बड़े जमींदार थे। इनके पिता मुरारी बाबू (बाबू कृष्ण मुरारी) की बड़ी तूती बोलती थी। 1962  में जब इलाके में जमीन का सर्वे हो रहा था तब अमीन, कानूनगो उन्हीं के दलान में रहकर सर्वे का काम किया करते थे। कभी-कभी चकबंदी पदाधिकारी भी जब मुआयने के लिए आते तो कृष्णमुरारी बाबू के यहां ही ठहरते, खूब आवभगत होती थी उन लोगों की। कृष्णमुरारी बाबू का यह अतिथि सत्कार अकारथ नहीं गया। जब चकबंदी शुरू हुई तो उन्होंने दूर दराज के अपने ऊसर-खासर खेत के टुकडों को बदल कर घर के निकट एक बडा प्लाट कायम करा लिया। इस तरह जोड़-तोड़ से गांव में 7 प्लाट में कुल 20 बीघा जमीन के वे मालिक बन गये। बथान में दू जोड़ा बैल, चार भैंस और एक गाय। उसे चारा-दाना खिलाने के लिए चार-चार मजदूर भांज लगाकर दरवाजे पर भोर से देर रात तक मुस्तैद रहते।  खेती-बाड़ी देखने के लिए अलग से एक बड़ाहिल था। मुरारी बाबू गांव के अपने हमजोलियों के साथ घूमते और  शाम में गप्पगोष्ठी जमती। तब समरीन्दर शहर में रह कर पढाई करते थे और यदा-कदा ही घर आते थे।

घोंचू उवाच पार्ट-11

मुरारी बाबू के देहांत के बाद उनका बड़े हौसले से श्राधकर्म सम्पन्न कर समीरन्दर गांव की जमीन ठेका-बटाई पर देकर शहर चले गये। नौकरी करने का कोई इरादा नहीं था। छात्र जीवन में ही कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ाव हो जाने के कारण शोषित-पीडित जनता के हित की आवाज बुलंद करने लगे। पहली बार उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी के एक पत्र में समाजवाद की स्थापना के लिए सामंतवाद और पूंजीवाद को उखाड़ फेंकने का आह्वान किया था। इसी तरह बाद में उन्होंने कई और लेख लिखे और समरेन्द्र कुमार विप्लव के नाम से वामपंथी लेखकीय विरादरी में शामिल हो गये। माली हालत भी उनकी काफी अच्छी थी। पिता मुरारी बाबू डाकघर में काफी नकद राशि छोड़ कर मरे थे। पांच बीघा लीची आम का बगीचा था जिससे सालाना दस- बारह लाख की आमदनी हो ही जाती थी। 16 हजार रूपये प्रति वर्ष प्रति बीघा की दर से जमीन ठेका पर लगा देने से करीब ढाई लाख रूपये सालाना की आमदनी पक्की ही मानिए। यही समरेन्द्र कुमार विप्लव एक हप्ते से गांव आए हुए हैं।मनटचोटन भाई के दूरा पर हमेशा की तरह आज भी शाम की बतकही का दौर चल रहा था। तिनटंगा चउकी पर परसन कक्का, चुल्हन भाई, बटेसर, भगेरन चच्चा और घोंचू भाई बैठे हुए थे। मैं भी धान के खेत से एक बोझा सामी घास काट कर बथान में पटका, हाथ-गोर चापाकल पर धोया और ओसारे से बंस खटिया नीचे उतार कर बतकही में शामिल हो गया। आज की बतकही की शुरुआत परसन कक्का ने की। वे कहने लगे ‘बड़ा मुश्किल समय आ गया है। खेती में लागत पूंजियो लउट के नहीं आता हय। उल्टे हर साल घाटा ही हो रहा है। लागत लगातार बढती जा रही है और आमदनी जीरो। जीने का कोई दोसर उपाय रहता त खेती-पथारी बिल्कुले छोड देते। एगो गायो हय से तीन साल से बिसुखल है। आठ बेर पाल खिलाए लेकिन हर बार फेल कर जाती है। अब त खेती आ पशुपालन निर्घिन और चाकरी उत्तम पेशा हो गया है, हो घोंचू भाई ! उमिरो न हय जे बाहर जाकर मजदूरियो करें। वे अपना दुखडा रोइए रहे थे कि इसी बीच समरेन्द्र भी टहलते हुए वहां आ गये। उन्हें देखते ही बटेसर ने मनसुखबा को पुकारते हुए कहा , रे मनसुखबा, दउर के एगो कुरसी ला, लेखक जी आए हैं। ‘ सबलोग लेखक जी को देख तिनटंगा चउकी से उतर कर खड़ा हो गये। हम ने भी खटिया से उठ कर समरेन्दर को नमस्कार करने की मुद्रा में हाथ जोर दिया। तब तक मनसुखबा बुलेटना के घर से एगो कुर्सी लाकर रख दिया। समरेन्द्र के कुरसी पर बैठने के बाद सब लोग अपने अपने स्थान पर बइठ गये। समरेन्दर जी ने परसन कक्का की कुछ बात आते हुएसुन ली थी। उन्होंने कहा, हां परसन भाई, आपकी चिंता सौ प्रतिशत सही है। खेती से किसान विस्थापित हो रहे हैं। स्कूल-कॉलेज में पढाई नहीं हो रही है। देश में करोडों की संख्या में युवा बेरोजगार हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य बाजार के हवाले कर दिया गया है। पूंजीपति मालामाल हो रहे हैं और किसान-मजदूर, युवा का जीवन खस्ताहाल है। मैने काफी कुछ लिखा है इन समस्याओं पर। घोंचू भाई ने जरूर पढ़ा होगा मेरा आलेख। अब क्रांति ही एकमात्र विकल्प है। क्या घोंचू भाई ? ‘ 

घोंचू भाई उनकी बात बड़े गौर से सुन रहे थे।  कहने लगे, ‘ वामपंथियों का यह फैशन हो गया है कि वह अपने और अपने आल-औलाद का भविष्य सुनिश्चित करने के बाद ही व्यवस्था परिवर्तन और क्रांति की बात करता है। अखबारों में क्रांतिकारी लेख लिखता है। समाजवाद को महिमामंडित करते हुए मार्क्स, एंगल्स, लेनिन, स्टालिन और माओत्सेतुंग के कथन को अपने हर भाषण मे उद्धृत करता है। लेकिन बाहर से वह जो दिखाई देता है, सचमुच में अंदर से वैसा वह होता नहीं। असल में वह यथास्थिति का ही समर्थक है। ‘ उनके इतना कहते ही समरेन्दर के चेहरे का रंग फीका पड़ने लगा। घोचू भाई इतने पर भी नहीं रुके। उन्होंने अपनी बात जारी रखते हुए कहना शुरू किया ‘ थोडी देर के लिए यह मान लिया जाए कि आपने अनेक क्रांतिकारी लेख लिखा है लेकिन आपके इन लेखों को क्रांतिकारी कैसे समझा जाए ? वास्तविकता तो यही है कि जो लेखक क्रांति की प्रक्रिया में शामिल ही नहीं है, वह क्रांतिकारी लेख आखिर कैसे लिखेगा ? वातानुकूलित कक्ष में बंद होकर जेठ की चिलचिलाती धूप और पूस के कडाके की ठंढ में खेतों , खलिहानों और कारखानों में काम करने वाले किसान-मजदूरों की दशा का जो उल्लेख आज हो रहा है, वह हृदयग्राही हर्गिज नहीं है, लेखक महोदय ! मानता हूं कि क्रांतिकारी लेख वह भी है जिसमें वस्तु जगत और मानव जाति के इतिहास का उल्लेख हो लैकिन ऐसा करना भी क्रांति की प्रक्रिया में शामिल हुए बिना सम्भव नहीं है।  क्रांति की प्रक्रिया में शामिल हुए बिना क्रांतिकारी दृष्टिकोण ही पैदा नहीं हो सकता। रूस के लेखक मैक्सिम गोर्की,चीन के लेखक लुशून, और अपने देश के लेखक प्रेमचंद, शरचंद्र आदि की रचनाएं इसलिए क्रांतिकारी हैं कि वे खुद क्रांति की प्रक्रिया में शामिल थे। आप आज अपने देश मे ही देखिए , सामाजिक स्तर पर कहीं भी क्रांति की प्रक्रिया नहीं चल रही है। आज क्रांति की स्पष्ट समझ ही कहीं नहीं है। लोग सत्ता परिवर्तन को ही क्रांति समझ रहे हैं। लेकिन बात ऐसी नहीं है। क्रांति का अर्थ ही है परिवर्तन। गौर कीजिए, कली का फूल बन जाना भी क्रांति है। हपकुनियां काटने वाला बच्चा जब खड़ा होता है, वह स्थिति भी क्रांति है। जिस दिन वनमानुष चौपाया से दो पाया बन कर मनुष्य बना वह भी तो क्रांति ही थी। और तो और आदिम मानव जब आदिम अवस्था से निकल कर क्रमश: बर्बर युग, दास प्रभु युग, सामंती व्यवस्था और फिर पूंजीवादी व्यवस्था में आया वह भी तो क्रांति ही थी। जिस दिन मनुष्य ने आग का आविष्कार किया, वह भी क्रांति ही थी। शैशव , यौवन और बुढापा की मंजिल तय कर जब मनुष्य मृत्यु को प्राप्त होता है वह भी क्रांति है लेखक महोदय! क्रांति बडा व्यापक शब्द है। इसे सीमाओं में आबद्ध नहीं किया जा सकता और यह भी जान लीजिए कि सामाजिक स्तर पर भले ही क्षीण या गौण रूप में ही सही, चलने वाली क्रांति की प्रक्रिया में शामिल हुए बगैर किसी भी लेखक के लिए क्रांतिकारी लेख लिखना सम्भव नहीं है। इसलिए यह वक्त लिखने का नहीं क्रांति के लिए कुछ करने का वक्त है।

घोंचू भाई की बात सुनकर लेखक समरेन्द्र कुमार विप्लव अवाक रह गये। तब तक मनसुखबा चाय लेकर आ गया। चाय का कप हाथ में थामते हुए आज पहली बार मनकचोटन भाई ने कहा ‘ हां, घोंचू भाई, शुरुआत तो पहले हमें खुद से ही करनी होगी। बहुत हो चुकी ‘पर उपदेश कुशल बहु तेरे’ की बात ।


ब्रह्मानंद ठाकुर। बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के निवासी। पेशे से शिक्षक। मई 2012 के बाद से नौकरी की बंदिशें खत्म। फिलहाल समाज, संस्कृति और साहित्य की सेवा में जुटे हैं। मुजफ्फरपुर के पियर गांव में बदलाव पाठशाला का संचालन कर रहे हैं।

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