इस शृंखला के अन्तर्गत आप अभी तक अराजकवाद से सम्बंधित विभिन्न दार्शनिकों के विचारों से अवगत हो चुके हैं । अराजकवादी विचारक किस तरह वर्तमान औद्योगिक सभ्यता को ही समस्या का मूल मानते हैं, इस पर भी अपनी पुस्तक ‘गांधी और अराजकवाद’ में सच्चिदानन्द सिन्हा ने संक्षेप में प्रकाश डाला है। आलेख की तीसरी कड़ी में प्रस्तुत है वर्तमान समय के सबसे महत्वपूर्ण अराजकवादी विचारक जॉन जेरजन और महात्मा गांधी के विचारों  की समानता  के कुछ बिन्दु। 

एक अमरीकी चिंंतक जॉन जेरजन , वर्तमान सभ्यताके कुछ पहलुओं पर वेसी ही बातें करते हैं, जैसी बातें गांधीजी के हिन्द स्वराज में है। इस बिन्दु पर दोनों के विचारों में  कुछ समानता है। जॉन जेरजन लिखते हैं ,  “सम्भवत:  एक नई दुनिया में स्वास्थ्य की समस्या आवासीय व्यवस्था से भी कम पहचान में आने वाली होगी। आज की अमानवीय औद्योगिक ‘ दवा ‘ समाज के सम्पूर्ण ताने- बाने के अनुरूप है , जो हमें जीवन और इसकी आंतरिक शक्ति से हीन करती है। वर्तमान समय के अधिकांश आपराधिक कर्मों में लोगों की दुर्दशा से मुनाफा कमाने के रुझान को सर्वोच्च श्रेणी में रखा जाना चाहिए। सभ्यता के पहले बीमारियों का अस्तित्व लगभग नगण्य था। इससे अलग कुछ हो भी कैसे हो सकता था ?  गलन , संक्रमण , भावनात्मक बीमारी और ऐसी बाकी बीमारियों का उबाऊ काम विषाक्तता , बेगानापन , भय , अर्थहीन जीवन – , क्षतिग्रस्त  बेगाना हकीकत के समग्र पटल को छोड़ ? इनके उद्गम को नष्ट करके सभी तरह के दुखों का निवारण हो सकेगा। छोटी – मोटी बीमारियों का  इलाज जडी -बूटियों आदि से या शुद्ध ( बिना प्रोसेस किए गये ) भोजन से हो सकेगा। यह तो जाहिर है कि औद्योगीकरण और कारखानों को एकाएक खत्म नही किया जा सकता ,लेकिन यह भी स्पष्ट है कि इनका सफाया पूरी शक्ति और विद्रोही तेवर से होना चाहिए “

जॉन जेरजन सभ्यता  के पतन की शुरुआत आज से करीब 10 हजार बर्ष पहले हुई कृषि क्रांति से मानते हैं। गांधी ऐसा नहीं मानते हैं। सभ्यता के  सम्बंध में हिन्द स्वराज में गांंधी जी के विचार  ऐसे थे –  एक पाठक के इस सवाल पर कि अब तो आपको सभ्यता की बात करनी होगी क्योंकि आपके  हिसाब से यह सभ्यता बिगाड़ करने वाली है , गांधी कहते हैं —” मेरे हिसाब से ही नहीं , बल्कि अंग्रेज लेखकों के हिसाब से भी यह सभ्यता बिगाड़ करने वाली है। उसके बारे में बहुत किताबें लिखी गई है। वहां इस सभ्यता के खिलाफ मंडल भी कायम हो रहे हैं। एक लेखक ने ‘ सभ्यता ,उसके कारण और उसकी दवा ‘ नाम की किताब लिखी है। उसमें साबित किया गया है कि यह सभ्यता एक रोग है।” –” पहले लोग खुली हवा में अपने को जो ठीक लगे , उतना ही काम स्वतंत्रता से करते थे। अब हजारों आदमी अपने गुजारे के लिए इकठ्ठा होकर बड़े कारखानों या खानों में काम करते हैंः उनकी हालत जानवरों से भी बदतर हो गई है। उन्हें सीसे वगैरह के कारखाने में जान जोखिम में डालकर काम करना होता है। इसका  लाभ पैसे वाले को मिलता है। पहले लोगों को मारपीट कर गुलाम बनाया जाता था , आज लोगों को पैसे और भोग का लालच देकर गुलाम बनाया जाता है। पहले जैसे रोग नहीं थे  वैसे रोग आज लोगों में पैदा हो  गये हैं और उसके साथ डाक्टर खोज करने लगे हैं कि रोग कैसे मिटाया जाए ? यह सभ्यता ऐसी है कि अगर हम धीरज धर कर बैठे रहेंगे तो सभ्यता की चपेट में आए लोग खुद की जलाई आग में जल मरेंगे। ” 

सभ्यता के पतन और इसके कारण एवं काल के सम्बंध में जॉन जेरजन और गांधी के मत अलग- अलग हैं। जहां जॉन इसका कारण 10 हजार बर्ष पूर्व हुई कृषि क्रांति को मानते हैं वहां गांधी जी इसका कारण पश्चिमी औद्योगिक सभ्यता को मानते हैं। आधुनिक अराजकवादी , जो अपने को अनार्किस्ट प्रिमिटिविस्ट कहते हैं , इस व्यवस्था का अंत कृषि व्यवस्था  , जिसे वे डोमिस्टिकेशन कहते हैं , को खत्म करने में देखते हैं , जबकि गांधी जी पारम्परिक कृषि और पारम्परिक हस्त उद्योगों पर आधारित विकेन्द्रित और आत्मनिर्भर ग्रामीण समाज में इससे मुक्ति देखते हैं। वे विकेन्द्रीकरण की दिशा में यहां तक जाते हैं कि हर जगह कपास के लिए स्थानीय स्तर पर  कपास की खेती होनी चाहिए। इसी तरह जरूरत की सभी वस्तुओं के लिए स्थानीय संसाधनों के विकास पर जोर देते हैं जो दूरदराज के विनिमय को अनावश्यक बना दे। 

अराजकवादी इस तथ्य की ओर ध्यान आकर्षित करने की कोशिश करते हैं कि कृषि  की तरफ संक्रमण आबादी के दबाव की वजह से नहीं हुआ बल्कि कृषि और पशुपालन की ओर संक्रमण से जो जीवन की स्थितियां पैदा हुईं और भोजन की उपलब्धता बढी , उसी की वजह से अचानक आबादी का  तेज संक्रमण हुआ। शायद यह बात सही है ,लेकिन आज हम जीवन पद्धति में जो भी परिवर्तन करेंगे , उसमें इस बढी हुई आबादी की मूल जरूरतों को नजअंंदाज नहीं कर सकते। महात्मा गांंधी, जिनके लिए भारत की घनी आबादी और सीमित भूमि एक कठोर हकीकत थी , कृषि क्रांति के पहले की कल्पना में जीने के बजाय भारतीय जीवन की जो वास्तविक स्थितियां थीं, उसी के परिप्रेक्ष्य में जीवन और समाज के लिए नई दिशा ढूंढ रहे थे।

इस संदर्भ में यह भी ध्यान देने की बात है कि आधुनिक औद्योगीकरण ने धरती और इसके संसाधनों पर बोझ घटाने के बजाय लगातार बढाया ही है। खनिजों और उद्योगों के लिए बनपजों की  बढती मांंग के कारण लगातार वनभूमि और कृषि योग्य भूमि को बंजर या कृषि के लिए अनुपयुक्त भूमि में तब्दील किया जा रहा है। दूसरी ओर, भूमि की उपज को अखाद्य वस्तुओं जैसे रबर  या एथनाल में तब्दील किया जा रहा है। इसी तरह विपणन के विस्तार के लिए यातायात बढता है और इससे कृषियोग्य भूमि को अधिग्रहित कर सड़कों का जाल बिछाया जा रहा है। यह जीवन की जरूरत की जगह विनिमय को त्वरण देने के  लिए हो रहा है। कुल मिलाकर इस आम धारणा के विपरीत कि औद्योगीकरण से भूमि पर आबादी का बोझ घटता है , हकीकत में आबादी का बोझ बढता है क्योंकि आदमी की जरूरतें बढाई जा रही है। अपने विशाल क्षेत्रफल और कोयला , तेल आदि की प्रचुर उपलब्थता के बावजूद  , हमारी एक चौथाई से कम आबादी वाले देश अमेरिका को अपने ऊंचे जीवनस्तर के लिए सारे संसार में पैर पसारना अपरिहार्य लगता है। अगर भारत उसकी तरह के जीवन की आकांक्षा रखे तो इस धरती जैसे कितने ही ग्रहों पर साम्राज्य फैलाना होगा। यह सब सीधी- सी बात है। लेकिन आधुनिकता की फैन्टेसी मे जीने वाले हमारे इलीट लोगों की समझ में आज भी जो बात नहीं आ रही है , वह महात्मा गांधी ने अपने युवा काल में  तीन महादेशों के अनुभव से समझ ली थी और इसी आधार पर अपने और समाज के जीवन को ढालने की कोशिश कर रहे थे।