ललित सिंह                       

जब- जब समाज में हिंसा, दर्प और नैराश्य की स्थिति हावी होने लगती है तब एक रौशनी की जरूरत पड़ती है और वो रौशनी है गांधी। जब हिंसा के बदले हिंसा की भावना गहराने लगे, जब असहमति को देशद्रोह से जोड़ा जाने लगे , जब लोक पर तंत्र हावी होने लगे तब गांधी का पूरा जीवन रौशनी की  तरह नज़र आता है। रंग निर्देशक और फिल्म अभिनेता एम. के . रैना गांधी को अपना रॉकस्टार मानते हैं। उनके जीवन को गांधी ने बहुत प्रभावित किया है।

बातचीत के दौरान एम के रैना ने अपना एक किस्सा बताया कि जब वे छठवीं कक्षा में थे तो उनको गांधी के सत्याग्रह पर निबन्ध लिखने के लिए कहा गया था , उसी दौरान उन्हें पता चला कि गांधी में जो सत्य के प्रति  इतनी आस्था और शक्ति है वह एक स्त्री से सीखने को मिली है। जब कोई स्त्री चाहे वह कितनी भी विपन्न और कमजोर स्थिति हो वह बच्चे को जन्म देती है , उसे पाल-पोष कर बड़ा करती है वैसे ही गांधी ने सत्य को अपनाया है जो उन्हें हर विपरीत परिस्थिति में गलत का विरोध करने और सत्य के साथ लड़ने की शक्ति देता है ।

गांधी का पूरा जीवन विविधताओं से भरा है जो हर परिस्थिति में संवाद के लिए आमन्त्रित करता है। जीवन का शायद ही कोई पक्ष हों जिस पर गांधी ने अपनी बात न रखी हो। शिक्षा , स्वास्थ्य , स्वराज्य , प्रकृति , परंपरा , आधुनिकता और न जाने क्या – क्या । जब हिंसा के विरोध में हिंसा की बात की जाती है तो गांधी  विरोध करते हैं और कहते हैं कि अगर आँख के बदले आँख छीन ली जाएगी तो समाज पूरी  तरह से अंधत्व का शिकार हो जाएगा। ऐसे में जरूरी है संवाद करने की, अहिंसा पूर्वक विरोध करने की।

गांधी पर बहुत तरह के सवाल उठाए गए , बहुत जगहों पर विचारों का खंडन किया गया पर इसके बावजूद गांधी आज दिनों दिन प्रासंगिक होते जा रहे हैं । खासतौर पर तब जब अपने ही भाई बंधुओं को कपड़ों से पहचानने की बात की  जा रही हो , गोली मारने की बात की जा रही हो , विविधताओं को एक ही रंग में रंगने की बात की जा रही हो। पिछले दिनों  महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के अवसर पर देश  भर में गांधी दर्शन, व्यक्तित्व और कृतित्व पर गोष्ठियों, नाटकों तथा कार्यक्रमों का आयोजन हो रहा था। इसी क्रम में  राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की संस्कार रंग टोली ने प्रख्यात नाट्य निर्देशक एम. के. रैना के निर्देशन में ‘बाबला और बापू @साबरमती आश्रम’ का मंचन श्री राम सेंटर, नई दिल्ली में किया।

बाल रंगमंच में कई निर्देशक और संस्थाएं लगातार कार्य कर रही हैं. इनमें राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की बाल रंगमंच की इकाई ‘संस्कार रंग ‘टोली’- ‘थिएटर इन एजुकेशन’  एक प्रमुख संस्था हैं। बाल रंगमंच एक ऐसी जादुई चाबी है, जो सहजता से बाल मन के दरवाजे खोल देती है। बच्चों की दुनिया वयस्कों की दुनिया से अलग होती है, वहां यथार्थ और नैतिक आदर्श सिर्फ वैचारिक रूप में सहज स्वीकार्य नहीं होते बल्कि वह दुनिया भावप्रधान और कल्पनाप्रधान होती है। खेल-खेल और मनोरंजन में ही बच्चे बहुत कुछ सीखते हुए अपनी एक काल्पनिक दुनिया बनाते हैं। बच्चों के सोच विचार न तो सीमित हैं और न ही किसी  वयस्क से कम। बस अलग यह है कि बच्चा भावनाओं के साथ ज्यादा सोचता है, बुद्धि के साथ थोड़ा कम। 

यह नाटक नारायण देसाई की किताब  ‘बापू की गोद में’ पर आधारित है जिसका नाट्यालेख स्वयं इस नाटक के निर्देशक एम०के० रैना ने ‘बाबला और बाबू @ साबरमती आश्रम’ के नाम से तैयार किया है। लेखक नारायण देसाई 1917 से 1942 तक महात्मा गांधी के सचिव रहे महादेव देसाई के पुत्र हैं।  1924 में क्रिसमस की पूर्व संध्या को जन्मे नारायण देसाई ने अपने जीवन के प्रथम 24 वर्ष गांधीजी के आश्रम में ही व्यतीत किए। यह इसलिए बताना  जरूरी है क्योंकि नाटक की जड़ें और जीवनानुभव आश्रम के हैं। नाटक गांधी के आश्रम में पल्लवित और पुष्पित हुए नारायण देसाई की बचपन की स्मृतियों एवं कारगुजारिओं पर आधारित है। इस नाटक में बच्चों के संसार में बापू की भूमिका और हस्तक्षेप को  दिखाने की शानदार कोशिश की गई है।

नाटक मार्क्सवादी कला चिंतन के प्रभाव से जन्मी ‘ग्रिप्स शैली’ पर आधारित है।  इस शैली में बच्चों के नजरिये से बच्चों का संसार वयस्कों के द्वारा मंचित किया जाता है। इसमें बच्चों के पात्र भी वयस्क ही किया करते हैं और  वयस्क के पात्र तो वे खुद ही निभाते हैं। नाटक में पहला दृश्य आश्रम का है जिसमें बाबला गांधी की कथा सुना रहा है। वह गांधी के अहिंसा पथ, स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और स्वदेशी अपनाने की बात कर रहा है, तभी बैकग्राउंड में गांधी जी की आवाज  सुनाई देती है।  वह बाबला से कहते हैं कि तुम यह क्या कर रहे हो? लोग बोर हो रहे हैं। तुम मेरी कथा न सुनाओ बल्कि अपनी कथा सुनाओ जिससे लोगों का मन लगा रहे और शायद कुछ सीखने को भी मिले। फिर बाबला साबरमती आश्रम में बिताए गए दिनों की कथा सुनाता है। 

नाटक की पूरी कहानी फ्लैशबैक में चलती है। नाटक में कुछ भी ऊपर से आरोपित किया हुआ नहीं लगता। नाटक की खूबसूरती इस बात में है कि पूरे नाटक में बाल मनोभावों, कौतूहल, आदत और कल्पनाशीलता को मुकम्मल रूप में मंच पर प्रस्तुत किया गया है। स्कूल जाने में आनाकानी करना, रास्ते में छुप जाना, टॉफी के लालच में आश्रम की बातें लोगों को बताना आदि कई तरह की बालसुलभ आदतें जो दर्शकों को अपनी तरफ आकर्षित करती हैं और गुदगुदाती हैं। बच्चों के व्यवहार में एक तरफ आश्रम का प्रभाव है तो दूसरी तरफ बालपन की मजबूरी या आदतें। वो दोनों में संतुलन साधने की कोशिश करते हैं। बच्चों ने अपनी टोली बना रखी है जिसमें सहमति और असहमति के लिए लोकतांत्रिक स्पेस है। वह चोरी करने से पहले खेत के मालिक को इत्तला करते हैं कि हमें भूख लगी है हम सभी सब्जी चुराने आ रहे हैं। फिर अपने आप ही फैसला करते हैं कि यह चोरी नहीं है क्योंकि हमने तो पहले ही बता दिया था।

बच्चे विदेशी खिलौनों का बहिष्कार करते हैं क्योंकि बापू ने कहा है कि  जिस चीज का उपयोग हम स्वयं करेंगे तो हम उनका बहिष्कार करने के लिए लोगों से कैसे कह सकते हैं? बापू बच्चों के नाराज होने पर कहते हैं भगवान कृष्ण के एक अर्जुन थे, तुम  सब मेरे कई अर्जुन हो सबके सवालों का जवाब मैं दूंगा। नाटक में स्वतंत्रता आंदोलन की घटनाओं, महिलाओं को आंदोलन में आने के लिए प्रोत्साहित करना। शराब मुक्ति के लिए महिलाओं द्वारा किए गए आंदोलन को सामाजिक समरसता और महिला शक्ति के रूप में दिखाना। अंग्रेजों को रावण के रूप में देखना फिर उसकी लंका को जला कर भारत माता को आजाद कराना। विविधता में एकता, बहुभाषा, मानव धर्म और संस्कृति जैसे कई प्रश्नों को नाटक बखूबी उठाता है।

नाटक में संगीत और प्रकाश योजना का बहुत संतुलित तरीके से प्रयोग किया गया है। जो नाटक में आए स्पेस को भरने की कोशिश करता है। नाटक में एक चीज बीच- बीच में थोड़ा खटक रही थी वह यह कि बच्चों की तरह बोलना या ऊपरी तौर पर हरकत करना बाल सुलभ अभिनय की जगह कैरिकेचर ज्यादा लग रहा था। इन दृश्यों में और सहजता कैसे आए इस पर काम करने की जरूरत है। हालॉंकि कथ्य के लिहाज से यह एक अच्छी और ज़रूरी प्रस्तुति बन पड़ी है। एम.के रैना ने अपने रॉकस्टार को बखूबी मंच पर उतारा है। पूरे मंचन में गांधी हर अभिनेता के रॉकस्टार लग रहे थे और साथ ही दर्शक समुदाय को भी गांधी को अपना रॉकस्टार बनाने के लिए प्रेरित कर रहे थे। यही नाटक की सार्थकता है। इस बात की पुष्टि के लिए ‘राम मूरत राही’ की एक कविता बहुत सटीक बैठती है – बापू जैसा बनूंगा मैं / सत्य की राह चलूंगा मैं।/ बम से बंदूकों से नहीं, / बापू जैसा लड़ूंगा मैं।/ जब भी कांटे घेरेंगे / फूलों के जैसे खिलूंगा मैं। / वतन की खातिर जीता हूं / वतन की खातिर मरूंगा मैं।/ आपस में लड़ना कैसा/ मिलकर सबसे रहूंगा मैं।

ललित सिंह। दिल्ली विश्वविद्यालय में रिसर्च स्कॉलर। रंगकर्म में गहरी दिलचस्पी। बाल रंगमंच, मुखौटों और कठपुतलियों पर शोध। आप से 8586022945  पर संपर्क किया जा सकता है।  इमेल – lalitkumarsingh251@gmail.com