ब्रह्मानंद ठाकुर

अपने देश के मीडिया जगत में इन दिनों जो घटनाएं घट रही हैं, वह आकस्मिक नहीं कही जा सकती। इसका ताना-बाना तो काफी पहले ही बुना जा चुका था, आज़ादी मिलने के बाद ही। तत्कालीन राजनेताओं की यह गैरत ही थी कि उसे इस रूप में तब नहीं लिया गया, जिस रूप में आज यह देखने-सुनने को मिल रहा है। अभी हाल ही मे एबीपी न्यूज से अभिसार शर्मा और पुण्यप्रसून वाजपेयी की विदाई वाली घटना को भी उसी नजरिए से देखने की जरूरत है। पहले पटाओ और जब गैरतमंद पत्रकार नहीं पटे तो उसे दूध की मक्खी की तरह निकाल बाहर करो। कोई क्या कर लेगा ? मीडिया मालिक और सत्ता का गठजोर आखिर बना ही क्यों है ? कितना सरल तरीका ईजाद किया है भाई कि चेहरा अगर खराब दिखे तो आईना ही चूर-चूर कर डालो !

कुछ इन्ही परिस्थितियों में गांधी शांति प्रतिष्ठान से प्रकाशित गांधी- मार्ग का जुलाई – अगस्त अंक डाक से प्राप्त हुआ। यह अंक इस मायने में महत्वपूर्ण है कि इसमें उन सवालों को उठाया गया है, जिनसे आज पत्रकारों को रू-ब-रू होना पड़ रहा है। और उससे छुटकारे का उपाय भी सुझाया गया है।

इस अंक के सम्पादकीय में सम्पादक कुमार प्रशांत लिखते हैं -“भय, दंड और अत्याचार , सम्मान , पैसा और पदवी – अंग्रेजों ने इन छ: हथियारों के बल पर भारत में स्वतंत्र अभिव्यक्ति और लेखन पर रोक लगाई थी और देश की गुलामी को मजबूत बनाया था। 1878 में वे इस नतीजे पर पहुंचे कि स्वतंत्र लेखन, चिंतन, प्रकाशन में लगे भारतीयों को चुप कराने में उन्हें जो सफलता मिली है, उसे कानूनी जामा पहना कर पुख्ता कर लेना जरूरी है। इसलिए लाया गया वर्नाकुलर प्रेस एक्ट -1878। इस एक्ट ने भारतीय भाषाओं में साम्राज्य की आलोचना, लिखना , बोलना और छापना हर तरह से प्रतिबंधित कर दिया।” लेकिन हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। वह हुई भी। ब्रिटिश सम्राज्यवाद के भय, दंड, अत्याचार, सम्मान, पैसा और पदवी जैसे सारे अस्त्र धरे रह गये। गांधी ने राह दिखाई तब प्रतिरोध के स्वर फिर बुलंद हुए, कलम सारे प्रतिबंधों को नकारती हुई आगे बढने लगी। इसी लेख में कुमार प्रशांत आगे लिखते हैं – ‘ इतिहास के किसी भी दौर में, किसी भी आततायी के लिए यह सम्भव नहीं हुआ कि वह कलम को हमेशा के लिए रोक सके, झुका सके और उससे मनमाना लिखवा सके।’

जाहिर है ,आज जो लोग सत्ता के मद में चूर होकर अभिव्यक्ति की आजादी पर प्रतिबंध लगाने ,कलम की धार कुंद करने और असहमति की जुबान तराशने मे लगे हुए हैं वे लोकतंत्र के रक्षक नहीं भक्षक हैं। सच्चे लोकतंत्र मे असहमति की आवाज दबाई नहीं गम्भीरता से सुनी जाती है और उसके कारकों को दूर किया जाता है। कुमार प्रशांत ने आजादी के बाद 1975 के जून में लागू आपातकाल के दौरान समाचार पत्रों पर लगाई गई कठोर पाबंदी का भी जिक्र किया। उस पीढी के पत्रकार आज भी उस काले कानून के गवाह हों कि कैसे उस दौर में समाचार पत्रों मे छपने वाले लेखों और समाचारों को छपने से पहले सेंसरशिप से गुजरना होता था ! कुमार प्रशांत लिखते हैं ‘ पत्रकारों और अखबारों को ‘ठीक ‘ करने का दौर था वह।’

पी साईनाथ, वरिष्ठ पत्रकार

विचारणीय यह है कि क्या वर्तमान में पत्रकार और पत्रकारिता की स्थिति उस वक्त से बदतर नहीं है क्या ? आखिर इस संकट का कारण क्या है ? पत्रिका के दूसरे आलेख ‘ कहां है हमारा मीडिया ‘ में प्रख्यात पत्रकार पी साईंनाथ ने बड़ी ही बेबाकी के साथ इस प्रश्न का माकूल जवाब दिया है। वे लिखते हैं – ‘ पत्रकारिता कब और कैसे मीडिया बन गई? जब तक वह कलम थी, हमारे हाथ में थी ; मीडिया बनी तो उसके हाथ में चली गई, जो कलम चलाना नहीं जानता, शेयर बाजार चलाना जानता है। मीडिया को फिर से पत्रकारिता बनाने की लड़ाई कलम के नाम उधार है।’ पी साईंनाथ की इस पीड़ा को समझना होगा। बिना इसे समझे हम मीडिया को उसका खोया गौरव, आम आवाम में उसकी विश्सनीयता पुनर्स्थापित नही करा सकते।

कभी राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने लिखा था , कलम देश की बड़ी शक्ति है भाव जगाने वाली , दिल ही नहीं, दिमागों मे भी आग लगाने वाली। वही कलम आज सत्ता की चेरी केसे हो गई ? इसी का जवाब पी साईंनाथ ने अपने आलेख में दिया है। पत्रकारिता ( कलम) आज पूंजीवादी राजसत्ता की दासी बन गई है। पूंजीवाद वह समाज व्यवस्था है जिसमें किसी तरह का उत्पादन (भौतिक या भावात्मक) केवल और केवल मुनाफे के लिए किया जाता है। मुनाफा कमाना ही इस व्यवस्था का चरम लक्ष्य है। और यह भी कि इसमें उत्पादन के साधनों का स्वामित्व श्रमिकों के हाथ में नहीं मालिकों ( पूंजीपतियों ) के हाथ में होता है। श्रमिकों को जीवन यापन के लिए मुनाफे में से बहुत कम हिस्सा वेतन एवं अन्य सुविधाओं के रूप में दिया जाता है। उतना ही, जितना भर देने से उसे जिंदा रखा जा सके ताकि, उसके शारीरिक और बौद्धिक श्रम का उपयोग पूंजीपति अपने हित में कर सकें।

अपने इसी आलेख में देश की जनता से मार्मिक अपील करते हुए पी साईंनाथ लिखते हैं – ‘ इस वक्त की राजनीतिक परिस्थिति हमारे इतिहास में विशिष्ट है। पहली बार एक खास विचारधारा का प्रचारक बहुमत के साथ प्रधानमंत्री बना है। बहुमत के साथ जब कोई प्रचारक सत्ता में आता है तो बड़ा फर्क पड़ता है। काफी कुछ बदल जाता है। मीडिया दरअसल इसी नई बनी स्थिति में खुद को अंटाने की कोशिश कर रहा है। सामाजिक, धार्मिक कट्टरपंथ और बाजार का कट्टरपंथ मिल- जुल कर देश की राजनीतिक जमीन पर कब्जा करने में लगा है। दोनों को एक-दूसरे की जरूरत है। ऐसे में आप क्या कर सकते हैं ? सबसे जरूरी काम है कि मीडिया के जनतांत्रिककरण के लिए लड़ा जाए, कानून के सहारे, विधेयकों के सहारे और लोकप्रिय आंदोलन के सहारे। साहित्य, पत्रकारिता, किस्सागोई- ये सब विधाएं बाजार की नहीं, हमारे समुदायों, लोगों और समाज की देन है। इन विधाओं को उन तक वापस पहुंचाने की कोशिश करें। ‘

इसी कड़ी में पी साईंनाथ इतिहास की एक घटना का उदाहरण देते हैं। बालगंगाधर तिलक को जब राजद्रोह की सजा हुई थी, तब लोग सडकों पर निकल आए थे। एक पत्रकार के तौर पर उनकी आजादी की रक्षा के लिए लोगों ने जान दी थी। ऐसा था तब मुम्बई का मजदूर वर्ग ! इसमें ऐसे लोग भी थे, जिन्हें पढना तक नहीं आता था, लेकिन वे एक भारतीय की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बचाने के लिए घरों से बाहर निकले। ऐसा था भारतीय मीडिया और जनता के बीच का रिश्ता ! आपको मीडिया के जनतांत्रिकरण के लिए, सार्वजनिक प्रसारक के सशक्तीकरण के लिए लड़ना होगा। आपको मीडिया पर एकाधिकार को तोड़ने में सक्षम होना होगा- यानी एकाधिकार से आजादी ! मीडिया एक निजी फोरम बन कर रह गया है , उनमें सार्वजनिक सवालों की जगह बनानी होगी। इसके लिए हमें लड़ने की जरूरत है। यह आसान नहीं लेकिन मुमकिन है।


ब्रह्मानंद ठाकुर। बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के निवासी। पेशे से शिक्षक। मई 2012 के बाद से नौकरी की बंदिशें खत्म। फिलहाल समाज, संस्कृति और साहित्य की सेवा में जुटे हैं। मुजफ्फरपुर के पियर गांव में बदलाव पाठशाला का संचालन कर रहे हैं।

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