मछली का मायका नहीं होता
उसे ब्याह कर ससुराल नहीं जाना पड़ता
उसका मरद उसे छोड़ कमाने बाहर नहीं जाता
बच्चे भी हमेशा आस-पास ही रहते हैं
कितना सुंदर है मछलियों का संसार

फिर भी शायद…
रिश्ते तो उनके भी होते होंगे
होता होगा 
अपना-पराया
देश-परदेश
सरहद
तीज-त्योहार
धर्मस्थल
तीर्थस्थल
होती होंगी इच्छाएं
लालसाएं
वर्जनाएं

तभी तो…
आटे की गोली या कीड़ा खाने में
बिछड़ जाती हैं एक-दूसरे से
फंस जाती हैं जाल में
तोड़ देती हैं दम
तड़पते हुए, पानी से बाहर!


अखिलेश्वर पांडेय। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र। मेरठ में शुरुआती पत्रकारिता के बाद लंबे वक्त से जमशेदपुर, प्रभात खबर में वरिष्ठ संपादकीय पद पर कार्यरत।

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