ब्रह्मानंद ठाकुर

भारत में लोकतंत्र का महापर्व ( 17 वां लोकसभा चुनाव )  चल रहा है। इस पूंजीवादी राजसत्ता में पूंजीपतियों को खुश रखने के लिए कौन सा दल सरकार बनाकर पूंजीपतियों की पूरी लगन और निष्ठा से सेवा कर सकेगा, इसको लेकर मंथन जारी है। नये-नये पंडे  हाथों में  नये झंडे थामे मैदान में निकल पडे हैं। चित्र -विचित्र नारों के शोर से वातावरण गुंजायमान है।  वादों की बरसात होने लगी है । हालांकि इन चुनावी वादों का हश्र क्या होता है, यह देश की जनता को भलीभांति मालूम है। सही राजनीतिक चेतना के अभाव में देश की शोषित-पीडित जनता  लम्बे समय से ठगे जाने के बाबजूद ‘ हरिजू मेरो मन हठि न तजै’ की तर्ज पर  पूंजीपतियों के बुने जाल में फंसती रही है, फंसने को मजबूर है। भारतीय लोकतंत्र का पहला महापर्व 1952 में हुआ था। तब कलम के जादूगर  अपने समय के प्रखर समाजवादी स्वतंत्रता सेनानी रामवृक्ष बेनीपुरी अपने गृह क्षेत्र तत्कालीन कटरा विधानसभा क्षेत्र से समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी थे। तब के उस चुनाव का  उन्होंने अपनी पुस्तक ‘डायरीके पन्ने’ में बड़े ही विस्तार से उल्लेख किया है। उस चुनाव में उन्होंने जयप्रकाश बाबू से कहा था -‘ दो लाख रुपये लाइए और बिहार में पार्टी की हुकूमत  बनकर रहेगी। ‘तब न रूपये का जुगाड़ हो पाया और न बिहार में समाजवादियों की सरकार बन पाई। आलेख की इस कड़ी के प्रथम भाग में प्रस्तुत है बेनीपुरी जी के कुछ चुनावी अनुभव।

अतीत  का झरोखा पार्ट-1

बेनीपुरी की डायरी 13 नवम्बर,1951

राजनीति ने मुझे फिर अपनी ओर पूरे जोर से खींच लिया है। चुनाव की धूम है। मैं भी अपने थाने से खड़ा हूं। अभी तीन दिनों तक वहां का दौरा करके लौटा हूं। शायद क्या निश्चय ही भारत में यह पहला अवसर है, उसके लम्बे से लम्बे इतिहास में यह सबसे पहला अवसर है– जब उसकी सारी बालिग जनता वोट देने जा रही है। अट्ठारह करोड़ मतदाता अपने झोंपडों से अपने दरबों से निकल कर जब संसार को बताने जा रहे हैं कि उन्हें कैसा राज पसंद है। देहातों में जाकर देख आया हूं, लोगों में काफी हलचल है। कांग्रेस की सरकार से उनमें जो विकर्षण पैदा  हो गया है, उसके प्रदर्शन के लिए वे बेचैन हैं। मुझे ऐसा लगा कि एक राजनीतिक भूकम्प होने जा रहा है। किंतु कुछ बातें ऐसी हैं, जिनसे निराशा ही निराशा हो रही है। एक तो ये कांग्रेस वाले वे नहीं चाहते कि जनता की दिलचस्पी चुनाव में हो। वे चाहते हैं कि जनता घुपचाप बैठी रहे और हर गांव में उनके जो दो-चार एजेन्ट हैं, उन्हीं को लेकर वे  चुनाव को जीत लें। गांधी जी की मृत्यु के बाद जनता में जो अकर्मण्यता आई, जडता आई वे नहीं चाहते कि वह दूर हो। उनका फायदा इसी में है कि जनता बैठी रहे और वे राज करते रहें।

वामपक्ष इस जडता को दूर कर सकता था लेकिन उसमें फूट है। इन्हें आपस में ही गाली देने से फुर्सत नहीं। कम्युनिस्टों का सबसे बुरा रोल। समझ में नहीं आता, ये पढे-लिखे लोग किस प्रकार ऐसी दिमागी दासता में जकडे हैं। सोशलिस्ट पार्टी से ही लोगों की आशा थी। किंतु इसके ऊपर के लोगों में भी अजीब वैमनस्य है। एक-दूसरे पर शक करते हैं, एक-दूसरे के पैर खींचते हैं। मैने चुनाव में कुछ विशेष दिलचस्पी दिखाई  तो साथियों ने उड़ाया- बेनीपुरी तो बिहार का प्राइम मिनिस्टर होना चाहते हैं। “पानी में मछली नौ-नौ कुटिया बखरा” देहाती कहावत इन पर चरितार्थ हो रही है। इसी प्रकार सभी साथियो पर कुछ न कुछ तोहमत।इस ईर्ष्या द्वेष के कारण काम नहीं हो रहा जैसा होना चाहिए। जयप्रकाश जी भी कम चिंतित नहीं हैं। किंतु करें तो क्या ?  तीन महीने से बातें चल रहीं हैं, आजतक उम्मीदवारों का चुनाव खत्म नहीं हुआ। फिर काम क्या हो ? हां, खुशकिस्मती की बात यह है कि पार्टी के नीचे कार्यकर्ताओं में काफी जोश है, उमंग है। वे गांव-गांव में दौड़ रहे हैं। मेरे चुनाव क्षेत्र में छ:-सात आदमी ऐसे धुनी हैं कि उनका उत्साह देखकर मुझे शरमा जाना पड़ा। यदि यही उत्साह पार्टी के नेताओं में होता तो क्या से क्या हो जाता। “

इसके एक महीना पांच दिन बाद 18 दिसम्बर 1951  की डायरी में बेनीपुरी जी लिखते हैं -“इधर कुछ दिनों से लगातार दौरे पर हूं। ” जनता “के सम्पादन में भी समय नहीं दे पाता। अबतक गया, जमुई, बेगुसराय, मोतिहारी, पटना (फतहपुर), सारण जिले के तीन स्थान और अपने जिले के सकरा थाने में दौरा कर चुका हूं। अपने चुनाव क्षेत्र में तीन दिनो तक पैदल दौरा किया और तीन दिनों तक फिर जीप पर दौड़ता फिरा हूं। उफ  कितनी परेशानी ! थकावट के मारे चूर-चूर। प्राय: भोर से आधी रात तक दौड़ता हूं। कहीं विश्राम नहीं, कहीं चैन नहीं।  जहां जाता हूं, कांग्रेस के खिलाफ अजीब वातावरण। लोग भला-बुरा कहते हैं , गालियां तक देते हैं। औरतें अपने फटे-चिथड़े वस्त्र को दिखातीं हैं, मर्दों के मुर्दनी वाले चेहरे चिल्ला-चिल्ला कर कहते हैं, किन मुसीबतों में उनके दिन कटे हैं।

सबसे बुरी बात यह है कि कांग्रेस ने लोगो के मन में किसी भी संस्था पर विश्वास नहीं रहने दिया है। सबसे अधिक यही समझाना पड़ता है कि हमलोग तुम्हारी मुसीबत दूर करने के लिए अवश्य कुछ करेंगे। उस दिन उस राजपूत ने कड़क कर कहा — वोट तो आप को ही देंगे, आप कसम खाइए कि सच्चाई पर चलेंगे।” इसी दिन इससे आगे वे लिखते हैं “सोशलिस्ट पार्टी की जीत निश्चित थी; किंतु सब जगह रूपये का अभाव। सवारी का कोई प्रबंध नहीं।गरीब खड़े किए जाएं , सोशलिस्ट पार्टी की शान इसी में है, किंतु यह जनतंत्र तो है नहीं, यह तो धनतंत्र है ! चुनाव लड़ने के लिए भी पैसे चाहिए। स्वयं दो -ढाई हजार खर्च कर चुका। अभी इतना और लगेगा। फिर उन बेचारों की कैसी दुर्गति,जिनके पास नामजदगी के पर्चे दाखिल करने के लिए भी पैसे नहीं थे। उस दिन ढाई हजार रूपये महेश्वर बाबू ने दिए ,तो साथियो के पर्चे दाखिल हो सके।

मैने उस दिन जयप्रकाशजी से कहा,दो लाख रुपये लाइए और बिहार में पार्टी की हुकूमत बनकर रहेगी। किंतु वह लावें कहां से ? लोगों ने शोर मचा रखा है, सोशलिस्ट पार्टी को चुनाव लड़ने के लिए अमरीका से पैसे मिले हैं। किंतु पैसे कितने हैं और किस मुसीबत से जयप्रकाश जी उसका संग्रह कर पाते हैं ,मै स्वयं देख चुका हूं।

अगले भाग में बेनीपुरी जी के सन् 52 का चुनाव हारने की कहानी।


ब्रह्मानंद ठाकुर। बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के निवासी। पेशे से शिक्षक। मई 2012 के बाद से नौकरी की बंदिशें खत्म। फिलहाल समाज, संस्कृति और साहित्य की सेवा में जुटे हैं। मुजफ्फरपुर के पियर गांव में बदलाव पाठशाला का संचालन कर रहे हैं।