ब्रह्मानंद ठाकुर

 
किसान आंदोलन के महान नेता स्वामी सहजानन्द सरस्वती की आज  पुण्यतिथि है।
स्वामी सहजानंद को गुजरे 68  बरस बीत गये लेकिन इस दौरान देश के किसानों की बेहतरी के लिए  व्यवस्था परिवर्तन का आंदोलन जो उन्होंने शुरू किया था, वह अपने लक्ष्य से भटक गया। किसानों की दशा दिन- प्रतिदिन बद से बदतर होती गई। ऐसा नहीं कि इस लम्बी अवधि में किसानो के हित के उद्देश्य से आंदोलन नहीं हुए। आंदोलन अवश्य हुए और हो भी रहे  हैं लेकिन उसका लाभ किसे मिल रहा है ?  सत्ता पर काबिज राजनीतिक दल और उसकी विरोधी पार्टियां किसानों के हित का राग अलापती हुईं, आखिर क्यों एक पर एक किसान-विरोधी नीतियां ही अपनाती जा रही हैं। वर्तमान संदर्भों में यदि इसे समझना है तो स्वामी सहजानन्द सरस्वती के किसान आंदोलन सम्बंधी विचारधारा को समझना होगा। उसी के आधार पर जाति, धर्म , लिंग और सम्प्रदाय की भावना से हटकर खुद में वर्गचेतना जागृत करनी होगी। किसान – मजदूरों को एकजुट सशक्त आंदोलन जारी रखना होगा।

26 जून- सहजानंद सरस्वती की 68 वीं पुण्यतिथि पर विशेष

 स्वामी सहजानंद सरस्वती को जाति विशेष के दायरे में बांधने की कोशिश होती रही है। ऐसा इसलिए कि उनके सार्वजनिक जीवन की शुरुआत भूमिहार ब्राह्मण सभा से हुई थी। 1914 में उन्होंने भूमिहार ब्राह्मण महासभा का गठन किया था। 1915 में ‘ भूमिहार ब्राह्मण ‘ पत्र का प्रकाशन शुरू किया। इस पर पुस्तकें लिखीं। तब वे सक्रिय राजनीति में नहीं आए थे। राजनीति में वे तब आए जब 1920 में 5 दिसम्बर को पटना में उनकी मुलिकात महात्मा गांधी से हुई। असहयोग आंदोलन में सक्रिय हुए और जेल गये। यह सब करते हुए उन्होंने  स्थितियों को बारीकी से समझा और 1929 में भूमिहार ब्राह्मण महासभा को भंग कर बिहार प्रांतीय किसान सभा की स्थापना की और उसके प्रथम अध्यक्ष बनाए गये। यहीं से शुरू हुआ उनका किसान आंदोलन। अपने स्वजातीय जमींदारों के खिलाफ भी उन्होंने आंदोलन का शंखनाद किया।
स्वामी जी का मानना था कि यदि हम किसानों, मजदूरों और शोषितों के हाथ मे शासन का सूत्र लाना चाहते हैं तो इसके लिए  क्रांति आवश्यक है। क्रांति से उनका तात्पर्य- व्यवस्था परिवर्तन से था। शोषितों का  राज्य क्रांति के बिना सम्भव नहीं और क्रांति के लिए राजनीतिक शिक्षण जरूरी है। किसान- मजदूरों को राजनीतिक रूप से सचेत करने की जरूरत है ताकि व्यवस्था परिवर्तन हेतु आंदोलन के दौरान वे अपने वर्ग दुश्मन की पहचान कर सकें। इसके लिए उन्हें वर्ग चेतना से लैस होना होगा। यह काम राजनीतिक शिक्षण के बिना सम्भव नहीं। हजारीबाग केन्द्रीय कारा में रहते हुए उन्होंने एक पुस्तक लिखी- ‘किसान क्या करें। ‘ इस पुस्तक में अलग अलग शीर्षक से 7 अध्याय हैं  1.खाना-पीना सीखें 2.आदमी की जिंदगी जीना सीखें 3.  हिसाब करें और हिसाब मांगें 4.डरना छोड़ दें  5. लड़ें और लड़ना सीखें 6. भाग्य और भगवान को मत भूलें और 7. वर्गचेतना प्राप्त करें।  ( स्वामी सहजानन्द और उनका किसान आंदोलन ले. अवधेश प्रधान ,नयी किताब प्रकाशन )
स्वामी जी ने करीबी से देखा कि किसानों की हाड़तोड़ मेहनत का फल किस तरह से जमींदार, साहूकार, बनिए, महाजन, पंडा – पुरोहित, साधु- फकीर,ओझा-गुणी, चूहे यहां तक कि कीड़े- मकोड़े और पशु-पक्षी तक गटक जाते हैं। वे अपनी किताब में बड़ी सरलता से इन स्थितियों को दर्शाते हुए किसानों से सवाल करते हैं कि क्या उन्होंने कभी सोचा है कि वे जो उत्पादन करते हैं,उस पर पहला हक उनके बाल-बच्चे और परिवार का है ? उन्हें इस स्थिति से मुक्त होना पड़ेगा। जाहिर है पूरी व्यवस्था किसानों एवं उसके परिवार वालों को भूखा – नंगा रखने को कृतसंकल्पित है ताकि वह निरुपाय होकर शोषकों के ऐशो आराम के लिए खुद को उत्सर्ग कर दें।
स्वामी सहजानंद  कहा करते थे  कि जीवन का उद्देश्य होना चाहिए स्वाभिमान के साथ जीना और आत्म सम्मान बनाए रखना। ‘किसान यदि अपने को इंसान समझेगा तभी इंसान की तरह जी सकेगा। और यही चाह उसे मानवोचित अधिकार हासिल करने के लिए आवाज़ उठाने को प्रेरित करेगी। यह चाह हर हाल में पैदा करनी होगी। हमारे देश में आज़ादी के बाद से आज तक किसानों की दशा लगातार बद से बदतर होती गई है। खेती-किसानी के अलाभकर हो जाने से लाखों की संख्या में किसान खेती से विस्थापित हो कर महानगरों की ओर पलायन कर चुके हैं। यह सिलसिला लगातार जारी है। दूसरी और पूंजीवादी राजसत्ता सम्पोषित पूंजीपतियों का मुनाफा आसमान की बुलंदी छू रहा है। किसानों की आवाज संगीनों के बल पर दबाई जा रही है। यह स्थिति आजादी के 70  सालों बाद भी यथावत है। इस ओर अगाह करते हुए स्वामी सहजानन्द सरस्वती ने काफी पहले अविराम संघर्ष का उद्घोष करते हुए  कहा था कि यह लड़ाई तब तक जारी रहनी चाहिए जब तक शोषक राजसत्ता का खात्मा न हो जाए। इस लड़ाई में नारी शक्ति को भी शामिल करने के वे पक्षधर थे। वे किसान आंदोलन और जनांदोलन की सबसे बडी बाधा भाग्य और भगवान को मानते थे। उन्होंने कर्मकांड, धार्मिक आस्था और अंधविश्वास को किसानों की मुक्ति की राह में बड़ी बाधा माना।
‘किसान क्या करे ‘ पुस्तक में एक जगह वे लिखते हैं – ‘ वंश परम्परा, कर्म, तकदीर, भाग्य और पूर्व जन्म की कमाई जैसी होगी, उसी के अनुसार सुख-दुख मिलेगा ,चाहे हजार कोशिश की जाए। भाग्य और भगवान की फिलासफी और कबीर की कथनी ने उन्हें इस कदर अकर्मण्य बना दिया है कि सारी दलीलें और समझाना- बुझाना बेकार है। इस तरह शासकों और शोषकों ने, धनियों और अधिकारियों ने एक ऐसा जादू उनपर चलाया है कि कुछ पूछिए मत। वे लोग मौज करते, हलवा- पूड़ी उड़ाते हैं। मोटरों पर चलते हैं और महल सजाते हैं, हालांकि खुद कुछ कमाते-धमाते नहीं। खूबी तो यह है कि यह सब भगवान की ही मर्जी है। वह ऐसा भगवान है जो हाथ धरे कोढियों की तरह बैठने वाले, मुफ्तखोरों को माल चखाता है। मगर दिन- रात कमाते – कमाते पस्त किसानों को भूखों मारता है। “

आज पूंजीवादी शोषणमूलक राजसत्ता के मैनेजर विभिन्न राजनीतिक दल जिस तरह से किसानों की समस्याओं पर घड़ियाली आंसू बहाते हुए किसान मुक्ति आंदोलन को लक्ष्य से भटकाने का काम कर रहे  हैं, उसे देखते हुए स्वामी सहजानन्द सरस्वती के किसान आंदोलन सम्बंधी विचारों से प्रेरणा लेकर पूंजीवाद विरोधी समाजवादी आंदोलन को मुकाम तक पहुंचाने की जरूरत है। यही भारतीय किसान आंदोलन के महान योद्धा स्वामी सहजानन्द सरस्वती के प्रति सच्ची श्रद्धांजली होगी।


ब्रह्मानंद ठाकुर। बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के निवासी। पेशे से शिक्षक। मई 2012 के बाद से नौकरी की बंदिशें खत्म। फिलहाल समाज, संस्कृति और साहित्य की सेवा में जुटे हैं। मुजफ्फरपुर के पियर गांव में बदलाव पाठशाला का संचालन कर रहे हैं।

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