ब्रह्मानंद ठाकुर

ये कैसी विडंबना है कि देश का किसान जो हर हिंदुस्तानी का पेट भरता है आज वही मर रहा है। सरकार की नीतियों के बोझ तले दबकर किसान दम तोड़ रहा है। सरकार पहले कर्ज देती है फिर उसे माफ करने की मांग उठती है और सरकार उसे अपने फायदे के मुताबिक सही वक्त पर माफ करने का ऐलान भी कर देती है। सवाल ये है कि आखिर किसान के सामने ऐसी नौबत ही क्यों आती है कि वो कर्ज ले, अगर वो कर्ज ले भी लिया तो वो उसे चुकता क्यों नहीं कर पाता? इस पर विचार करने की बजाय हमारी सरकारें सिर्फ सियासत करने में जुटीं रहती हैं। सरकार किसानों को खेती के नाम पर कर्ज देती है। किसान उससे महंगे हाईब्रिड बीज खरीदते हैं और कहते हैं यही हाईब्रिड बीज किसानों की सबसे बड़ी मुश्किल बन जाते हैं। पैदावार बढ़ाने के लिए किसानों को हाईब्रिड की लत लगाई गई और उसका फायदा बहुराष्ट्रीय कंपनियों को पहुंचता रहा।

80 के दशक में प्रख्यात कृषि वैज्ञानिक डॉक्टर एके श्रीवास्तव ने हाईब्रीड के बढ़ते प्रचलन पर चिंता जताई थी और कहा था कि ‘’हर हाल में खेती में हाईब्रिड कल्चर से बचिये। यह टिकाऊ खेती की राह में एक बड़ी रुकावट बन सकती है। एके श्रीवास्तव को जिस बात का डर था आज वही हो रहा है। इधर कुछ दिनों से खेती में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा उत्पादित हाईब्रिड सीड का क्रेज काफी बढ़ गया है। गेहूं हो या फिर धान या कोई और फसल, किसान हाईब्रिड बीज का आदी हो गया है। हाईब्रिड सीड से पैदावार तो जरूर बढ़ती है लेकिन खेत की उर्वरा शक्ति कमजोर हो जाती है, जिससे रासायनिक खाद पर निर्भरता बढ़ जाती है और उत्पादन की लागत भी काफी बढ़ जाती है।

धान की बात करें तो पहले परम्परागत किस्म के बीज जैसे बकोल, लालसर , कतिका, बीआर 34, परबापांख, सिलहट आदि लम्बे समय के प्रभेद वाले धान की खेती लोग बड़े पैमाने पर करते थे। अपनी उपज को ही बीज में इस्तेमाल करते थे। लेकिन सत्तर का दशक आते-आते ये परम्परागत प्रभेद कब गायब हो गये, पता ही नहीं चला। अब परंपरागत बीज की जगह हाईब्रीड आईआर-8, नगीना, एनसी1626 जैसे धान के बीजों ने ले लिया। हालांकि आईआर 8 की उपज क्षमता काफी अच्छी होती है। बौने किस्म का यह प्रभेद दो क्विंटल प्रति कट्ठा तक उपज देता है। इसकी जड़ें काफी मजबूत होती हैं और जमीन के अंदर के पोषक तत्व का इतना दोहन करती हैं कि अगली फसल में बिना गोबर और रासायनिक उर्वरक के प्रयोग के अच्छी उपज नहीं ली जा सकती।

डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय ने धाने के अनेक संकुल प्रभेद दिए। ऊपरी जमीन के लिए कई किस्में जैसे- सहभागी, प्रभात, धनलक्ष्मी , रिछारिया, राजेन्द्र भगवती और साकेत-4, सीधी बुआई के लिए राजेन्द्र नीलम, वन्दना और राशि, निचली जमीन के लिए राजश्री, राजेन्द्र महसूरी, बीपीटी,  5204, स्वर्णा सत्यम, स्वर्णा सब-1 और किशोरी एवं गहरे जलजमाव वाले चौर क्षेत्र के लिए सुधा, वैदेही, जलमगन और जललहरी प्रभेदों का विकास किया। वैदेही, राजश्री  और राजेन्द्र भगवती तो बहुत ही उपयोगी प्रभेद रहे। प्रभात 80 से 85 दिनों में तैयार होने वाली किस्म है। अगस्त से सितम्बर तक पक कर तैयार होने वाले इस प्रभेद की खेती के बाद आलू, तोरी या तम्बाकू की अगात खेती की पूरी गुंजाईश रहती है। यहां से साठ दिनों में तैयार होने वाला धान का एक अन्य प्रभेद तुरंता धान का विकास हुआ था लेकिन यह खास लोकप्रिय नहीं हुआ। ये सभी धान के संकुल प्रभेद हैं और किसान बीज के लिए अगली फसल में भी इसका उपयोग कर सकते हैं। उपज क्षमता भी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा उत्पादित हाईब्रिड प्रभेदों से थोड़ी ही कम है।

फिलहाल परम्परागत प्रभेदों के गायब हो जाने और कृषि विश्व विद्यालय द्वारा विकसित धान के संकुल प्रभेदों को पूरी तरह स्वीकार न करने की प्रवृति से किसानों की निर्भरता हाईब्रिड प्रभेदों की खेती पर काफी बढ़ी है। सारा प्रचार तंत्र इस दिशा में किसानों के पीछे लगा हुआ है। सरकार भी इस पर अनुदान दे रही है। मुझे इस बार साढे तीन एकड़ धान की खेती करनी है। पिछले साल मैंने राजेन्द्र भगवती की खेती की थी। उपज 15क्विंटल प्रति बीघा हुई थी। सूखे के कारण आठ सिंचाई करनी पड़ी थी। उससे पहले एक विशेषज्ञ और परिचित बीज बिक्रेता की सलाह पर पायोनियर कम्पनी के प्रभेद 27 पी-31की खेती की थी, उपज 17 क्विंटल प्रति बीघा हुई थी।

विडंबना देखिए सरकार भी ऐसे ही बीजों को प्रोत्साहन देती है यानी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बीज को बढ़ावा देने के लिए सरकार किसानों को अनुदान देती है। इस बार सरकार ने ऐसे प्रभेदों पर 100 रूपये प्रति किलो अनुदान की घोषणा की हुई है। ये अलग बात है कि अनुदान कब आएगा इसका पता नहीं । फिलहाल 288 रूपये प्रतिकिलो की दर से 4320 रूपये भुगतान करने के बाद 27 पी 31 प्रभेद वाला हाईब्रिड धान का 3-3 किलो का 5 पैकेट खरीद चुका हूं। अब अनुदान का इंतजार है। यानी चाहकर भी मैं हाईब्रिड के जाल से बाहर नहीं निकल पा रहा हूं।


ब्रह्मानंद ठाकुर। BADALAV.COM के अप्रैल 2017 के अतिथि संपादक। बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के निवासी। पेशे से शिक्षक। मई 2012 के बाद से नौकरी की बंदिशें खत्म। फिलहाल समाज, संस्कृति और साहित्य की सेवा में जुटे हैं। गांव में बदलाव को लेकर गहरी दिलचस्पी रखते हैं और युवा पीढ़ी के साथ निरंतर संवाद की जरूरत को महसूस करते हैं, उसकी संभावनाएं तलाशते हैं।

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