राकेश कायस्थ

1. यह बहुत साफ था कि 2019 की लड़ाई अंकगणित बनाम केमेस्ट्री होगी। मतलब यह कि जितने भी बीजेपी विरोधी गठबंधन बने हैं, उनके वोट आप जोड़ लीजिये और उन्हें सीट में तब्दील कीजिये। साथ ही यह मान लीजिये कि जिन राज्यों में बीजेपी अधिकतम पर है, वहां कुछ सीटें कम होंगी ही। यूपी और कांग्रेस से सीधी लड़ाई वाले राज्यों में होनेवाले नुकसान की भरपाई बीजेपी बंगाल और उड़ीसा से किस तरह करेगी यह एक अहम सवाल था। लेकिन इससे भी बड़ा सवाल यह था कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पक्ष में कोई अंडर करेंट हैं?
2. विश्लेषकों का एक बहुत बड़ा तबका मान रहा था कि प्रदर्शन कितना भी बेहतर हो बीजेपी के लिए बंगाल और उड़ीसा से यूपी और बाकी राज्यों के नुकसान की भरपाई कर पाना संभव नहीं होगा। ऐसा तभी संभव था जब वह मोदी मैजिक काम करे जिसका दावा बीजेपी की तरफ से किया जा रहा था।
3. तमाम एग्जिट पोल में मोदी मैजिक पूरी तरह से काम करता दिख रहा है। यूपी को लेकर की गई आजतक और एबीपी की भविष्यवाणियां सिरे से अलग-अलग हैं। इन्हें छोड़ दें तो ज्यादातर एग्जिट पोल लगभग एक जैसे रूझान दिखा रहे हैं, जिनका सिरे से गलत होना लगभग नामुमकिन लगता है।
3. बंगाल और उड़ीसा में तमाम एग्जिट पोल बीजेपी को झोली भरकर सीटें दे रहे हैं। आजतक के हिसाब से उड़ीसा में बीजेपी को 21 में 19 सीटें मिल रही हैं। यह आंकड़ा लगभग अविश्वसनीय है। इस ट्रेंड के हिसाब से उड़ीसा विधानसभा से भी नवीन पटनायक की विदाई होनी चाहिए।
4. पुलवामा के बाद के सर्जिकल स्ट्राइक का असर उम्मीद से कहीं ज्यादा हुआ है। हिंदुत्व और बीजेपी का राष्ट्रवाद अब भारतीय राजनीति के केंद्र मे हैं। कांग्रेस जिन आर्थिक सवालों को विमर्श के केंद्र में लाना चाहती है, उनका कहीं कोई नामो-निशान नहीं है। गांधी परिवार और राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर शंका और गहरी होगी।
5. सीटें चाहे जितनी भी मिलें लेकिन यह बहुत साफ है कि भगवा लहर के बीच सपा-बसपा राष्ट्रीय राजनीति में मजबूती से उभरेंगी। कमंडल और मंडल की लड़ाई देश की भावी राजनीतिक दिशा तय कर सकती है और कांग्रेस इस खेल में और पीछे छूट सकती है। सवाल यह भी है कि नतीजों के वास्तविकता में बदलने के बाद क्या तीसरा मोर्चा को एक मजबूत भावी विकल्प बनाने की कोशिशें तेज़ होंगी? राष्ट्रीय राजनीति में क्षत्रपों की रूचि और अब तक की भूमिका को देखते हुए इसकी संभावना कम लगती है।
6. एग्जिट पोल के आंकड़ों पर यकीन करते हुए भी इनके गलत होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। अगर आप गौर करेंगे तो अंदाज़ा होगा कि ज्यादातर सर्वे एजेंसियों के पिछली भविष्यवाणियों में एक पैटर्न है। उदाहरण के लिए टुडेज चाणक्य की 2014 में की गई एक भविष्यवाणी को छोड़कर बाकी सारे अनुमान सिरे से गलत साबित हुए हैं। यह एजेंसी बीजेपी को हमेशा बाकी एजेंसियों के मुकाबले सबसे ज्यादा सीटें देती है। गुजरात से लेकर कर्नाटक तक तमाम विधानसभा चुनावों में चाणक्य ने बीजेपी को जितनी सीटें दी हैं, उसके मुकाबले असली नतीजों में सीटें बहुत कम आई हैं।
7. यह भी एक दिलचस्प संयोग है कि प्रधानमंत्री 300 सीटों की बात कर रहे हैं और पोल ऑफ पोल्स में भी लगभग इतनी ही सीटें मिल रही हैं। बिहार चुनाव में एग्जिट पोल का सिरे से गलत होना हर किसी को याद है। लेकिन यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि बिहार जैसा अंकगणित राष्ट्रीय स्तर पर नहीं है। फिलहाल मोदी की केमेस्ट्री जोरदार तरीके से जीतती नज़र आ रही है।

राकेश कायस्थ।  झारखंड की राजधानी रांची के मूल निवासी। दो दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय। खेल पत्रकारिता पर गहरी पैठ। टीवी टुडे,  बीएजी, न्यूज़ 24 समेत देश के कई मीडिया संस्थानों में काम करते हुए आप ने अपनी अलग पहचान बनाई। इन दिनों एक बहुराष्ट्रीय मीडिया समूह से जुड़े हैं। ‘कोस-कोस शब्दकोश’ और ‘प्रजातंत्र के पकौड़े’ नाम से आपकी किताब भी चर्चा में रही।