धीरेंद्र पुंडीर

दशहरा और नीलकंठ। “नीलकंठ तुम नीले रहियो हमारी बात राम से कहियो”। पता नहीं कि अब हमको अपनी बात भगवान राम तक पहुंचानी है या नहीं। दशहरे पर सुबह-सुबह घऱ के बाहर पेड़ों की ओर जाने किस उम्मीद से ताक रहा था। सोसाइटी के बाहर लगे पेड़ों पर पक्षियों की आवाज से बार-बार ऐसे ही ऊपर देखने लगता था कि शायद दिख जाए लेकिन वो नहीं दिखा। मैं बहुत देर बाद ऑफिस पहुंच कर भी सोचता रहा कि ऐसा क्या है कि इस शहर में दशहरे को मेरी निगाहें नीलकंठ की तलाश करती है। उसी पक्षी की जिसको आम दिनों में देखना अब काफी मुश्किल माना जाता है।

दशहरे और नीलकंठ का रिश्ता बचपन की नदी की ऐसी लहर है जो गांव से निकल कर शहर आने वाले ज्यादातर यात्रियों को आज भी गीला कर जाती है। नीलकंठ की तलाश में सुबह से ही पेड़ों की ओर झांकना, खेतों की पगडंडियों के बीच की झाड़ियों में भी गहराई से ताकना शायद यहीं कहीं बैठा हो, भगवान राम के विजयदिवस पर भगवान तक आपकी बात पहुंचाने वाला नीलकंठ। और जब भी दिखा खुशी से हल्ला हो जाता था और बाकी तमाम लोग भी भाग कर देखने की कोशिश करते, उससे पहले ही नीलकंठ जाने कहां के लिए उड़ जाता था। विजयदशमी के दिन रावण और कुंभकरण के पुतलों को फूूंकने की तत्परता में और रामलीला के आखिरी मंचन के उत्साह में इस बात की ओर कम ही लोगों का ध्यान जाता है कि नीलकंठ भी दशहरे की पौराणिक कहानियों से नाता रखता है।

दशहरे पर शहर से गांव की ओर जाना होता था। त्यौहार बंधु-बांधवों के साथ मनाने की भारतीय पंरपरा को शहरीकरण ने बदल दिया है। मैं नष्ट करना नहीं कह रहा हूं क्योंकि हर कोई इस बदलते वक्त में अपनी नौकरी और घर से तालमेल बैठाने के लिए जो कर सकता है करता है। दीवाली पर घर जाने के लिए कई बार दशहरे पर मायूस रहना पड़ता है। हम जो अपने घरों से निकल महानगरों मे काम कर रहे हैं, अब किसी किसी त्यौहार पर बंधुओं और बांधवों में जा पाते हैं और कई बार वहां जाकर पता चलता है कि किसी दूसरे को छुट्टी नहीं मिली है। समय के साथ-साथ काफी चीजें बदल गईं या धीरे-धीरे पूरी तरह गायब हो गईं। उसी तरह से चुपचाप गायब हो गया नीलकंठ को खोजने का अभियान।

शहरों में पल रहे बच्चों को मोमो और ब्लू व्हेल से बचाने की जद्दोजहद से गुजरते वक्त कभी ये ख्याल नहीं आता कि इनको नीलकंठ की तलाश में लगाना चाहिए। ये देख सके कि नीलकंठ का रिश्ता आदमी की भगवान तक जुड़ने की चाह का इच्छा है। अपनी इच्छाओं को अपने सहारे भगवान तक पहुंचाने की चाह। खैर अब लगता नहीं कि इन महानगरों में कभी नीलकंठ को देखने के लिए दशहरे की सुबह-सुबह बच्चों का हाथ पकड़े हुए लोग निकलेंगे। अब तो लगता है कि गांव में शीशम की बाह, नीम का पेड़ , जमोएं की लंबी डालियों और घनी झाड़ियों में भी नीलकंठ नहीं आता होगा लेकिन यादों में नीलकंठ हमेशा रहेगा।

हो सकता है दशहरे पर हमको इस तरह से याद आता रहे नीलकंठ। नीलकंठ को देखते ही हम लोग चिल्ला-चिल्ला कर बोलते थे नीलकंठ तुम नीले रहियो, हमारी बात राम से कहियो। बदलते वक्त में बच्चों को भगवान राम के लॉर्ड रामा में बदलने के बाद लगा नहीं कि वो मानवीय रूप है। हजारों साल से एक देश का रिश्ता है उस मानवीय रूप से जो मर्यादाओं को मानते हुए मोक्ष की प्राप्ति और जन-जन के अंदर एक विश्वास पैदा करने के लिए अवतरित हुए। इसीलिए उनको अब संवाद की जरूरत नहीं है। हम लोग अपनी छोटी-छोटी खुशियां और गम दोनों ही राम को कहना चाहते थे, इसीलिए नीलकंठ हमारे लिए दशहरे की सबसे बड़ी तलाश हुआ करते थे।

नीलकंठ को लेकर कहा जाता कि भगवान श्रीराम जब रावण का वध करने के लिए जा रहे थे, उसी वक्त रास्ते में भगवान को नीलकंठ दिखाई दिया था। रावण से युद्ध के कई अतंराल में इसी दिन भगवान राम रावण का वध कर पाए थे। कहते हैं तभी से नीलकंठ के दर्शन इस दिन शुभ माने जाते हैं। इसके अलावा एक दूसरी कहानी भी है, जिसमें भगवान राम युद्ध के बाद बह्म हत्या के पाप से मुक्त होने के लिए भगवान शिव की अराधना करते हैं और भगवान शिव नीलकंठ पक्षी के रूप में धरा पर आकर भगवान राम को दर्शन देते हैं। ऐसी और भी कथाएं हो सकती हैं। अलग-अलग जगह लोगों ने अपने आप को अपनी कहानियों के साथ भगवान राम से जोड़ा है और फिर उसके सहारे प्रकृति के दूसरों रूपों को एक कथा में पिरोया है। और जो देश घूमता है वो जानता है कि इस देश के कण-कण में राम किस तरह व्याप्त हैं।


dhirendra pundhirधीरेंद्र पुंडीर। दिल से कवि, पेशे से पत्रकार। टीवी की पत्रकारिता के बीच अख़बारी पत्रकारिता का संयम और धीरज ही धीरेंद्र पुंढीर की अपनी विशिष्ट पहचान है। 

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