मूर्तिकार संजय कुमार ।
मूर्तिकार संजय कुमार ।

ब्रह्मानंद ठाकुर 

बिहार के मुजफ्फरपुर जिले का हमारा गाँव पिअर विगत 60 सालों में काफी कुछ बदल गया है । फिलहाल मैं अपने गाँव में शारदीय नवरात्र (दुर्गा पूजा) के आयोजन के संदर्भ में इस बदलाव कि चर्चा करने जा रहा हूँ । लौटता हूँ साठ साल पीछे, जब मैंने होश संभाला था । गाँव में शारदीय नवरात्र को दशई कहा जाता था । दशई माने कोई भी शुभ काम बंद, जादू-टोना के दिन बच्चों पर ख़ास निगरानी । कारण कि डाइन-योगिन इन्हीं दिनों जादू मंतर सिद्ध करती थी । ऐसा विश्वास या अन्धविश्वास गाँव के लोगों खासकर महिलाओं में था । कलश स्थापन से लेकर नवमी तक गाँव की महिलाएं अपने बच्चे को लेकर काफी सतर्क रहती थी । उनकी कमर में कई तरह के जंतर बांध दिये जाते थे । मेरी दादी ने तो 11-12 साल की उम्र तक मेरी कमर और गर्दन में गंदा-ताबीज बांधे रखवाती रही ।

उस समय कलश स्थापन से लेकर नवमी तक प्रायः सभी घरों में पंडितों द्वारा दुर्गा सप्तशती का पाठ कराया जाता था । गाँव में दुर्गा जी की प्रतिमा स्थापित नहीं होती थी । प्रतिदिन धूप, घी, तील, जौ से आम की लकड़ी जला कर हवन किया जाता था । पूरा वातावरण नौ दिनों तक सुगन्धित बना रहता था । अगरबत्ती का प्रयोग न के बराबर होता था । विजयादशमी के दिन अहले सुबह कौआ बोलने से पहले इस हवन के अवशेष पदार्थ को हमलोग नदी में विसर्जित कर देते थे । इसके बाद शुरू होता था पंडित जी और पुरोहितों द्वारा अपने-अपने यजमानों की शिखा में यंत्री बाँध कर आशीर्वाद देने का सिलसिला । पुरोहित अपने यजमान के माथे पर दायाँ हाथ रखकर ‘जय जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी, दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तुते कहते हुए यंत्री बांधते थे ।” यह यंत्री जौ के नवजात पौधे होते थे जिसे पुरोहित कलश्स्थापन के दिन अपने कुलदेवता के सामने मिट्टी रखकर जौ छिड़क देते थे, ऊपर से घड़े से बूंद-बूंद पानी टपकता रहता था, दसवें दिन यह पौधा चार से छः इंच का हो जाता था ।

piar gaonयह प्रथा अब भी है लेकिन पंडित सहित यजमानों की शिखा गायब हो गयी है । लिहाजा पुरोहित यजमान के माथे पर ही यंत्री रखकर आशीर्वाद देते हैं, जिसे यजमान तुरंत हटाकर अलग रख देते हैं । पुरोहितों को इस दिन दान दक्षिणा पहले से भी ज्यादा मिलाने लगा है । तब विजयादशमी के बाद रबी की बाई शुरू होती थी । किसान लोग पुरोहित से यंत्री के बारे में पूछा करते थे कि इस बार पौधा कैसा हुआ? अनुकूल जवाब पाकर किसानों के चहरे खिल जाते थे । रबी की अच्छी फसल की आशा बलवती हो जाती थी । इसके बाद बच्चे अपने-अपने अभिभावकों के साथ दुर्गा पूजा का मेला देखने जाते थे । हमारे गाँव में तब कोई मेला नहीं लगता था । पड़ोस के गाँव रतवारा और बोचहाँ प्रखण्ड के शर्फुद्दीनपुर में बसवरिया मेला लगता था, जहां दुर्गा जी की भव्य आदमकद प्रतिमा महिषासुर की छाती पर पैर रखे हुए आकर्षण का मुख्य केंद्र होती थी । शेर पर सवार दुर्गा जी का महिषासुर के प्रति आक्रामक रूप देखकर बच्चे सहम जाते थे । तब मुझे भी डर लगा था । आज हमारे इलाके के हर गाँव में कम से कम दो-तीन जगहों पर दुर्गा जी की आदमकद प्रतिमा स्थापित होती है । मेला भी लगता है । लगातार नौ दिनों तक भोजपुरी एवं अन्य फ़िल्मी धुनों पर पूजा के गीत गाये जाते हैं ।

‘प्यारा सजा है तेरा द्वार भवानी, भक्तों की लगी है कतार भवानी’ समेत अनेक गीत गाये जाते हैं । घरों में दुर्गा सप्तशती का पाठ पूर्ववत जारी है लेकिन बच्चों को गंदा ताबीज बंधने की परंपरा खत्म हो चुकी है । इसे शिक्षा का असर कह सकते हैं । पहले गाँव में भगत के दरवाजे पर पंचमी और सप्तमी को विशेष रूप से टेका लगता था । दूर तक मानर की आवाज गूंजती थी । काफी संख्या में कारणी पहुंचते थे, अब इसमें कमी आई है ।

हमारे गाँव में पहली बार दुर्गा जी की आदमकद प्रतिमा का निर्माण आज से 38 साल पहले 1978 में इसी गाँव के स्नातकोत्तर (दर्शनशास्त्र) योग्यता धारी युवा संजय कुमार ठाकुर ने शुरू किया । तब से आज तक हर साल वे स्वनिर्मित प्रतिमा स्थापित कर पूजा अर्चना करते आ रहे हैं । संजय बंगलौर में शाही एक्सपोर्ट प्राइवेट लिमिटेड में कार्यरत हैं । इस बार भी वे गाँव आकर प्रतिमा के निर्माण में जुट गये हैं । गाँव में एक हाट लगती हैं वहां भी प्रतिमा स्थापित कर पूजा की परंपरा कुछ वर्षों से चल रही है । कही-कही धूम-धाम से रावण दहन भी होता है लेकिन रावणत्व नहीं जला है कब जलेगा पता नहीं । देखता हूँ कि साठ सालों के दौरान इस धार्मिक अनुष्ठान में काफी बदलाव आया है । धार्मिक निष्ठां की जगह आडम्बर ने ले लिया है । शहरो में पूजा पंडालों के निर्माण में प्रतिस्पर्धा का दौड़ है । लाखों रूपये पंडाल के निर्माण पर खर्च हो रहे हैं ।

brahmanand


ब्रह्मानंद ठाकुर/ बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के रहने वाले । पेशे से शिक्षक फिलहाल मई 2012 में सेवानिवृत्व हो चुके हैं, लेकिन पढ़ने-लिखने की ललक आज भी जागृत है । गांव में बदलाव पर गहरी पैठ रखते हैं और युवा पीढ़ी को गांव की विरासत से अवगत कराते रहते हैं ।

संबंधित समाचार