डॉ. प्रीता प्रिया

गर्मियों की शादी के मौसम में एक अजीब सा खालीपन होता है, एक उदासी सी होती है, एक खलिश होती है मानो मौसम बोझिल सा उदास सा बेमन से, लाचारी से बड़ी निष्ठुरता से अपनी गुलमोहर, अमलतास सी ऊंची टहनियों पर झूला डाले पेंगें मारती बेटियों को किसी रंगीन बंसही पऊती में सजाकर दूर गाँव भेजने की तैयारी कर रहा हो।

रात्रि के दूसरे पहर बिस्तर पर लेटे-लेटे रोज की तरह दीए की मद्धम रौशनी में बनेरी में बंधी लकड़ियों की संख्या गिन रही थी वह, तभी अचानक से लाउडस्पीकर पर दूर से शारदा सिन्हा जी की गंभीर किन्तु मन को बींधती सी आवाज़ या यूं कहें कि खुरचती, छीलती सी आवाज हवा के घोड़ों पर सवार सरपट दौड़ती सी कभी पास आती और एक तीखी सी खरोंच देकर न जाने फिर कहाँ गुम हो जाती उन्हीं हवाओं में पुनः खरोंच देने तक।

“निमिया तले डोली रख दे मुसाफिर

सावन की आई बहार रे ……!

वह सोचती है कि जब लोकगीतकार ने डोली को नीम तले रखने की बात कही होगी तो कुछ सोचा होगा या यूं ही अनायास ही, बरबस ही यह ब्रह्म वाक्य गूंज उठा होगा उसकी वाणी में ? बीस साल से जमी परतें एक-एक कर उधरने लगतीं हैं “दिघरा वाली दुलहिन के मन से । “दिघरा वाली दुलहिन” हाँ यह नाम नहीं था उसका बीस साल पहले, कुछ और ही नाम था भला सा। जो उसे बहुत पसंद था,  हाँ! याद आया “अजिता” जो कभी पराजित होना जानती ही नहीं थी। वालीबॉल टीम की कैप्टन थी अपने स्कूल की, न जाने कितनी ट्राफियां जीती थी उसने अपने स्कूल के लिए। साथ ही लांग जम्प, हाई जम्प और बैडमिन्टन चैम्पियन भी और हाँ जब कभी स्कूल के मैदान में खेल की घंटी में दोस्तों के साथ “कमल का फूल” खेलती थी तो सखियों द्वारा आमने सामने बैठ कर एक के ऊपर एक रखे पैर के चारों पंजों के ऊपर चार बित्ते और उसके ऊपर अन्य दो सहेलियों द्वारा दोनों हाथों की ऊंगलियां फैलाकर बनाए गए कमल के फूल को एक ही झटके में फांद जाया करती थी वह। पढ़ाई में भी बहुत अच्छी थी। साधारण से सपने थे उसके यूपी बिहार के बच्चों वाले कि बस डीएम कलक्टर ही बनना है तो बनना है।

तभी हवा के घोड़ों पर बैठी शोर करती, फुसफुसाती, खिल्ली उड़ाती हुई तीखी सी आवाज आती है –

“अयोधा से आव तारे राम धनुर्धरिया

परेला झिर-झिर बूंदिया

परेला झिर-झिर बूंदिया

हो परेला झिर-झिर बूंदिया…।.”

और ये बूंदियाँ सारी किताबें-कापियाँ, रैकेट-काक, कंचे, कमल के फूल सब बहाए लिए चली जाती है अपने साथ और सौगात में छोड़ जाती है बाढ़ के बाद बचे कंकड़-पत्थरों की तरह सोना-चांदी, गहने-जेवर।

एक दर्द सा उभरा हवा के झोंकों के साथ एक निरर्थक सा मनुहार लिए –

“हरे,हरे,हरे बाबा बंसवा कटईह

ऊँचे-ऊँचे मड़वा छवईह हो,

ऊँचे ऊँचे मड़ऊआ तर बईठिह हो बाबा

सजन लोग छेकले दुआर हो “

वह कभी नहीं समझ पाई इस गीत का मतलब कि सजन द्वार कैसे छेक सकते हैं ?

कार ससुराल के दरवाजे पर जा लगी। साड़ी और दुपट्टे के दोहरे एक हाथ लंबे घूंघट से कुछ भी दिखना असंभव सा था, फिर बिजली भी तो नहीं थी वहां। बुझी-बुझी सी गैस या पेट्रोमैक्स (जो भी रहा हो ) की रोशनी में पारंपरिक कुछ हाथों ने उसे हाथों हाथ थाम लिया और हवा से बातें करने वाली अजिता उन हाथों के सहारे सीधा चलती गई।

“दुलहिन सीढियाँ हैं “

उसने अंदाजे से अपने पैरों को सीढियों पर चढ़ने तक ऊँचा उठाया , आह! लगा ज्यों ऊंगलियां किसी चट्टान से टकरा गई हो। शायद यहाँ की सीढियां “उसके घर” नहीं-नहीं “मायके” की सीढ़ियों से कुछ ऊँची थी या कदम अब से ही हार मान रहे थे उसके। कुछ कदम चलने के बाद फिर से आवाज आई –

“दुलहिन सीढियां उतरनी है”

उसने खुद को संयत कर चढ़ती सीढियों की ऊंचाई के हिसाब से पैर को साधा पर यह क्या पाँव के नीचे तो कुछ पता ही नहीं लग रहा था कि जमीन कहाँ पर है “धम्म्” सी गिरने को हुई, उसे कई हाथों ने संभाल लिया था। यह शायद “उसके घर ” नहीं-नहीं ससुराल का आंगन था और वह पहले कदम में ही वहाँ के लोगों के बीच फूहड़ साबित हो चुकी थी। फिर वही चढ़ने की सीढियाँ पर इस बार उसने खुद को भीड़ के भरोसे ही सौंप दिया। तभी एक बुजुर्ग सी, सधी सी, अनुभवी सी आवाज आई –“दुलहिन तनी लम (झुक)जा “

वह जितना झुक सकती थी, झुककर आगे बढ़ी ।”खट्ट् “उफ्फ्फ् ! शायद दरवाजे की चौखट थी ।

एक टीस सी उभर आई सिर के उस हिस्से में जिससे वह बीस वर्षों से उस चौखट को ठोकर मारती आ रही है ।

इस वीरता के अभिमान से अजाने ही एक व्यंगात्मक मुस्कान आ गई उसके होठों पर …..

मुस्कान हुंह !

“शुभे-शुभे, शुभे बोलहु कनियाँ

जब ले गंगा जमुनवा में रहे पनियाँ “

उसने खुद को संयत कर लिया मानो दूर से आती आवाज शारदा सिन्हा जी की नहीं उसके अपने मन की आवाज हो ।

शायद रात्रि का चौथा पहर था, उसने जोर से अपने कान बंद कर लिए पर गाने की आवाज अभी भी स्पष्ट थी –

“आ गे माई हरदी हरदिया दूभ पातर ना

आ गे माई कौने बाबा हरदी चढ़ावेला ना

आ गे माई बाबा से बाबा अपन बाबा ना

आ गे माई कौने मामा हरदी चढावेला ना

आ गे माई मामा से मामा अपन मामा ना

आ गे माई कौने भईया हरदी चढावेला

ना

आ गे माई भईया से भईया अपन भईया ना

आ गे माई चाचा से चाचा अपन चाचा ना…….”

उसे लगा कि ये “अप्पन” शब्द सदा के लिए मर गया हो और इस शब्द की अंत्येष्टि के लिए उसके पास कोई साधन न हो बर्फ की सिल्लियां भी न हो जिसमें वह इस शब्द के पार्थिव शरीर को रख सके तब तक जब तक अंत्येष्टि के लिए साधन न जुटा ले। बीस साल से कंधे पर उठाए-उठाए  शब्द के इस पार्थिव शरीर से एक सरांध सी उठने लगी है हलक तक !

सांस की नली चिपक सी गई हो जैसे ,

कंठ सूखने लगा उसका

प्यास …….

हाँ शायद प्यास लगी थी उसे

कमरे में एक लोटा पानी रखकर सोती है वह पर आज उसका मन ठंडा और ताजा पानी पीने का हो रहा है। सबसे पास वाला चापाकल बाहर दालान की ओर है जहाँ आंगन के सभी मर्द सोते हैं। फिर लगभग एक बाल्टी पानी भर लेने के बाद ही चापाकल से ठंडा पानी आ पाता है सो पानी चलाने की आवाज भी तो होगी, उसने सिर पर पल्ला डाला और आंगन के दूसरी ओर बने दरवाजे से गली की ओर बाग वाले चापाकल की तरफ जाने को उठी। “खट्ट्” उफ्फ्फ !

“दुलहिन तनी लम जा “

उसने खुद से कहा, हुंह! बीस साल हो गए पर तुम्हें तो कुछ सीखना ही नहीं है जैसे। और पल्लू संभालती हुई आगे बढ गई।


डॉक्टर प्रीता प्रिया। मुजफ्फरपुर, बिहार की निवासी डॉ प्रीता प्रिया इन दिनों हलद्वानी में रहती हैं। साहित्यिक अभिरुचि। रचनात्मक संसार में खुशियां बटोरने की कोशिश।


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