अपने ही गांव में आज हम अजनबी बन गए

अपने ही गांव में आज हम अजनबी बन गए

धीरेंद्र पुंडीर

अपने ही मकान में हम अजनबी या अजनबी मकान में हम कुछ भी कह पाना मुश्किल है। अकेले देवता किसकी सलामती की दुआ मांगे वो खामोश पत्थरों में बदल चुके है। “खता इतनी सी थी कि मजबूर थे हम, सजा इतनी कि मजदूर है हम”। क्या कोई मेहमान भी इस तरह आता है। बहुत देखभाल कर घर के अंदर घुसना। बहुत सी चीजों को याद करना। कुछ पुराने दरख्तों को खोजना। किसी कोने को उदास निगाहों से देखना। ये किसी अजनबी का दीदार नहीं है । ये किसी अजनबी से किसी अजनबी का दीदार भी नहीं है। ये बिखरते हुए घर की कहानी है। उन उदास चौखटों के अपने अदंर से खो जाने की कहानी है। परकोटे के भीतर के गोले से आरपार झांकती घर की नई बहुओं या फिर बुजुर्गों की खांसी की आवाज पर परकोटे के पीछे जा बैठती हुई ताई-चाची या मां की कहानी भी है। जिस दर पर कहकहों की आवाज से पेड़ों में कोठर बनाएं बैठे हुए पक्षियों की नींद टूटती हो उस घर को बेजुबां देखना।

कुछ नए पत्थरों के जुड़ने और ऊंचे गेट के दरवाजों के बंद होने से जैसे अंदर भी बहुत कुछ सुनसान कमरों में बंद हो चला है। ऐसे कमरे जिनके कोई दरवाजे नहीं है। चीख उठती है भी तो अदंर दब जाती है। ये किसी एक घर की कहानी नहीं है । ये उजाड़ होते हुए गांव उनसे निकल कर कही शहर में बसे हुए बच्चों की वो दबी सी कहानी है जिसको अहसास हर कोई करता है और सुनना कोई नहीं चाहता। शहर से गांव तक के सफर में बहुत कुछ हासिल भी हुआ लेकिन उस हासिल का घाटा उम्र के तकाजों के साथ बढ़ता जाता है। घेर या घऱ दोनों में हर तरफ से अजनबी हो कर जाने किस खुशफहमी की तलाश करता हूं। घर के दरवाजों के आस खो देने के बाद वहां जाकर भी क्या हासिल होता है सिर्फ एक दो बुजुर्गों के शांत होने की कहानी या फिर एक दो घरों के उजड़ कर फिर शहर चले जाने के किस्से के अलावा।

कई बार किस्सा सुनाने वाला भी सोचता है कि क्यों सुनते हैं सालों बाद आकर ये जनाब उन मकानों की कहानी जिनमें अब घास उग रही है। लंबी खोर बहुत पहले ही दीवारों में बदल चुकी है। उनकी ईंट को निकाल कर चाहरदीवारी को ऊंचा किया जा चुका है। अब कोई कोठा अंधा नहीं है जिसके अंदर रोशनी नहीं जाती हो और मोटी दीवारों के पार लू और सूरज की गर्मी मात खा जाती हो। गांव की गलियों में बिछी नई टाईलों के सामने नए मकानों में बहुत कुछ नया हो चुका है। पुरखों की मिट्टी,अपना घर और अपनी जमीन की दबी कुचली सी इच्छायें मौका मिलते ही फन उठाने लगती है और जैसे ही गांव के कस्बे तक पहुचते है तो लगने लगता है कि अब वहां तो कोई है ही नहीं जिसे तुम्हारा इंतजार हो। कार में जा रहे हो लेकिन निगाहे बस स्टैंड के बुकिंग काऊंटर पर बैठे एजेंट को तलाश रही है। बस में बेतकल्लुफ लोगों को जो बस में चढ़ते हुए हर आदमी को नाम और गाम दोनों से पहचानते थे । साथ ही नाराज होने पर खानदान का शिजरा पढ़ने बैठते थे। न बस न बस एजेंट और न वो लोग कुछ भी तो नजर नहीं आता। कई बार पैर खींच कर गए तो वहां न पेड़ मिला न सुस्ताते हुए लोग बस इतंजार करती हुई उमसहीन निगाहों की भीड़ दिखती है जिसको आपके तो आपके परिवार के बारे में भी कुछ मालूम नहीं है।

गांव की चौहद्दी में बाग कट चुके हैं या फिर बाग लग चुके है और आप न लगने में शामिल है और न कटनें में ऐसे में आपके लिए अजनबी बन चुके वो बाग भी आपको किसी अजनबी की तरह से देखते हैं न तो किसी पेड़ का नाम रख सकते हैं और ऩ उसके नाम को पुकार सकते हैं। घर की गलियां जैसे आपकी निगाहों को हर तरह से धोखा देने पर तुली हुई हो। गांव की पाठशाला के बच्चे उस तरह से किसी को नहीं देखते हैं क्योंकि अब वो समझदार बच्चे हैं। गौहर रहा नहीं, गांव जैसे अब है नहीं। कंधे पर हाथ मारने वाले लोग तो गांव से विदा हो चुके है। उनको जैसे हवा ले गई । अब दुनियादार लोग हैं और सालों बाद आने वाले लोगों के लिए उनके पास कोई संवाद नहीं। गांवसुलभ दुनियावी ताल्लुकात बचा हुआ है तो पूछते है कि बड़े दिन बाद आणा हुआ सब ठीक तो है। दुनिया ये आप को सिखा चुकी है कि अब आने के पीछे घर बेचना तो नहीं है। पता नहीं उनकी नजर में आप हैं या फिर अकेला पड़ा हुआ घर जिसकों मिलाने से उनका घर बड़ा हो सकता है या फिर नई जगह में ढांगर और खुल कर बांधे जा सकते हैं।

 ऐसे घरों के सामने से चोरी से गुजरना चाहते हैं जैसे हवाओं से भी छुप जाएँ जहां सिर्फ तन्हा से बुजुर्ग बैठे हो और वो इस बात की आस में रहते हैं कि किसी को बाहर जाकर पैसे कमा रहे अपने बेटों की कहानी सुना सके। वो कहानी जिसमें बड़ा मकान, बड़ी गाड़ी और बड़े रसूख की बात हो लेकिन आवाज में छिपी उदासी आपके दिल तक चली जाती है जो ये बताती है कि हमारी मेहनत की फसल हमारा अकेलापन है। गांव के बाहर हम जा नहीं सकते है और गांव के अंदर हमारे बेटों की जवानी नहीं आ सकती है। क्योंकि आप भी उसी कहानी के एक किरदार हो जिसका अहसास तब आपको बार बार होता है जब अपने से बात करते हुए बुजुर्ग आपसे बार बार गांव में जल्दी जल्दी आने की बात कहते है। घर का आंगन अब पत्तों से भरा हुआ है। पत्ते उड़ उड़ कर आपके चेहरे की ओर आने की कोशिश करते है क्योंकि पेड़ की टहनियां आपका बोझ तो संभाल सकती हैं लेकिन आपकी उम्र ही आपकी इस कोशिश को बर्दाश्त नहीं कर पाएंगी।

बुझे हुए चूल्हों की दास्तां अब अनकही है। घरों में गैस है चाय या रोटी जल्दी आ जाती है और अगर आप शहर में चूल्हें का स्वाद बताने की कोशिश करते है तो अपनी आंख से ज्यादा सामने वाले की आंख को कसैला कर देते हैं जैसे जिंदगी और उम्र का धुवां दोनों के दर्म्या आ गया हो। बगड़ से घेर, घेर से घर और घर से फिर खेत और खेत से फिर घर बनते हुए किस्सों में बैठे हुए बुजुर्ग तो अब किस्सों से गायब हो गए। पिताजी भी जैसे मुझे गांव के जो किस्से बता रहे हैं वो बूढ़े किस्से अपने अंत की ओर जा रहे हों। गांव की गलियों में बैठे बच्चे एक दूसरे से बतियाते हुए एक बाप बेटे को अजनबी की तरह देख रहे हैं। किसी दुकान वाले से पूछने पर पता चलता है वो नहीं रहे या फिर गांव से चले गए। गांव से चल कर अमेरिका का सफर ही किस्सों में बदल गया। गांव में भूत-चुडैल अब किस्से नहीं रह गए अब कहानी बस गांव छोड़ जाने की है। और सालों बाद उदास सी परछाईंयों के लौटकर अजनबियों की तरह से अपनों में अजनबी होने का दर्द लेकर लौटने की अनसुनी कहानियां हैं। देवताओं को अकेले छोड़ कर चले आएँ लोग त्यौहारों पर भी अब गांव नहीं लौटते हैं। देवता अकेले राह देखते हैं दुआएं दे भी तो किसको जिनके लिए उस दुनिया में दुआ मांगते होंगे वो तो दर छोड़ चुके हैं। 
अब जिस शहर में हम हैं उस शहर को इतना सा ही कहते हैं कि मेराज फैजाबादी साहब के शब्दों में
“अब चाहे जो सुलूक़ करे आपका ये शहर
हम गाँव से तो आ गये घर बार बेचकर”

dhirendra pundhir

धीरेंद्र पुंडीर। दिल से कवि, पेशे से पत्रकार। टीवी की पत्रकारिता के बीच अख़बारी पत्रकारिता का संयम और धीरज ही धीरेंद्र पुंढीर की अपनी विशिष्ट पहचान है। 

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