पुष्यमित्र

जरा इस तसवीर को देखिये, आधा दर्जन से अधिक लोगों की बाहों में स्लाइन की बोतलें लगी हुई हैं। फिर भी वे अनशन स्थल से हटने के लिए तैयार नहीं हैं। आज बारहवां दिन है, ये लोग भूखे-प्यासे डटे हैं। हजारों लोग इन्हें घेर कर बैठे हुए हैं। इन लोगों के चेहरों को देखिये, कपड़ों को देखिये। अंदाजा लगाइये, ये किस दुनिया के लोग हैं। इस जमाने में जब पूरी दुनिया अस्मितावादी हुई जा रही है, कोई राम के लिए लड़ रहा है तो कोई कुरान की फिक्र में दुबला हुआ जा रहा है। कोई ट्रम्प की बातों पर निसार हो रहा है, तो कोई मोदी के अपमान का बदला लेने पर तुला है। कोई महिषासुर को देवता बनाने की कोशिश कर रहा है तो कोई शनि मंदिर में प्रवेश का हक पाने के लिए दुनिया हिलाने को तैयार है। उस दौर में हजार-दो हजार लोगों का एक पुल के लिए जान की बाजी लड़ा देना आपको कैसा लगता है? मुझे तो शागिर्द फिल्म का वह गीत याद आ जाता है- दुनिया पागल है, या फिर मैं दीवाना…

कौन हैं ये लोग जो उल्टी रीत चला रहे हैं? ये लोग किस दुनिया से आये हैं, जहां एक पुल इतना महत्वपूर्ण हो गया है कि लोग उसके लिए जान की बाजी लगाने को तैयार हैं? अगर आप जानना चाहते हैं तो जानिये… इस दुनिया का नाम फरकिया है। यह एक फरक की हुई दुनिया है, जिसे टोडरमल ने ही अपनाने से इनकार कर दिया था। कुछ लोग इसे नदियों का मायका भी कहते हैं, क्योंकि इस 30-35 किलोमीटर के दायरे से होकर आधा दर्जन नदियां, कई-कई धाराओं में बहती हैं और पूरे इलाके में अटखेलियां करती हैं। इस दुनिया की कुछ कथाएं ‘रेडियो कोसी’ में भी मैंने लिखी हैं। यहां न सड़कें हैं, न पुल, न स्कूल, न अस्पताल, न थाना-पुलिस और दूसरी चीजें तो छोड़िये, यहां सरकार भी नहीं है। जिस दिन इलाके का कोई पदाधिकारी इन गांवों का दौरा करके लौटता है, पूरे महकमे में अपनी शान के कसीदे खुद गढ़कर सुनाता है कि वह फरकिया घूम कर आय़ा है। जैसे, फरकि या जाना, एवरेस्ट फतह करके लौट आने के बराबर है।

टोडरमल ने अगर इस इलाके को फरक किया तो उसकी वजहें थी। वह पुराना जमाना था। मगर आजादी के 70 साल बाद भी अगर सरकारें इस इलाके के लोगों के दुःखों को दूर नहीं कर पा रही हैं, तो यह सिर्फ और सिर्फ उपेक्षा है। आखिर क्यों इस इलाके के लिए एक अलग तरह की योजना नहीं बन सकती कि इन्हें भी यातायात की सुरक्षित सुविधा उपलब्ध हो, इनके गांवों में भी अच्छे स्कूल हों, अस्पताल की सेवा हो, थाना-पुलिस हो, मोबाइल का नेटवर्क हो, केबल टीवी की पहुंच हो। सरकारें अगर चाह लें तो यह सब मुमकिन है। मगर नहीं, सरकारों को इनके कष्टों से कोई मतलब नहीं है। मैं लगातार इस इलाके में जाता रहा हूं। कुछ रेल की पटरियां हैं और पुराने रेलवे पुल हैं, जिनसे होकर लोग आर-पार करते हैं, जान जोखिम में डाल कर (तसवीर देखें)।

बांकी इलाकों में नावें हैं और धूल भरे मैदानों की पदयात्राएं हैं। अगर जिला मुख्यालय आना हो तो दो नदियां पार कीजिये और पांच किमी पैदल चलिये, तब जाकर पहली सवारी मिलेगी। किसी की तबीयत खराब हो गयी, या किसी को बच्चा होने वाला हुआ तो समझिये कि रास्ते में ही जान चली जाये। एंबुलेंस इन इलाकों में पहुंच नहीं सकते। खाट पर लाद कर मरीजों को जगह पर पहुंचाया जाता है। आखिर इन लोगों को एक पुल और कुछ सड़कें क्यों नहीं मिलनी चाहिये ? एक पुल इन दर्जनों गांवों की दुनिया को बदल सकता है। इनके बच्चों का शहर आकर ऊंची पढ़ाई करना मुमकिन हो सकता है, रोगियों की जान बच सकती है, गांव की फसल शहर की मंडियों तक पहुंच सकती है, शहर जाने का मतलब दिन भर की थकान के बदले मोटरसाइकिल की एक घंटे की यात्रा हो सकती है। यह फरक दुनिया, आपकी हमारी दुनिया से जुड़ सकती है।

मगर नहीं, हमारी सरकारें इन दिनों अलग मसलों में व्यस्त है। राज्य सरकार उत्सवों की दुनिया सजाने में जुटी हैं, तो केंद्र सरकार के राजा यूपी, पंजाब जीतने में। कुछ विपक्षी नेता सक्रिय हुए हैं। प्रधानमंत्री को पत्र लिखा गया है, विपक्षी नेता विधान सभा में सवाल उठाने की कोशिश में हैं। मगर सरकारी गठबंधन की ओर से अब तक कोई बयान नहीं आया है। लोग मरने को तैयार हैं, फिर भी इनकी पेशानियों पर कोई बल नहीं। अगले महीने इसी राज्य में चम्पारण सत्याग्रह का शताब्दी वर्ष आयोजन होगा, धूम-धाम से मनेगा। मगर आज जो लोग अनशन और सत्याग्रह कर रहे हैं, इनकी सुधि कौन लेगा?

PUSHYA PROFILE-1


पुष्यमित्र। पिछले डेढ़ दशक से पत्रकारिता में सक्रिय। गांवों में बदलाव और उनसे जुड़े मुद्दों पर आपकी पैनी नज़र रहती है। जवाहर नवोदय विद्यालय से स्कूली शिक्षा। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता का अध्ययन। व्यावहारिक अनुभव कई पत्र-पत्रिकाओं के साथ जुड़ कर बटोरा। संप्रति- प्रभात खबर में वरिष्ठ संपादकीय सहयोगी। आप इनसे 09771927097 पर संपर्क कर सकते हैं।


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