पशुपति शर्मा के फेसबुक वॉल से साभार

मित्रो

इन दिनों कुछ लोगों का सम्मान आम लोगों की ज़िंदगी से लाखों-करोड़ों गुना ज्यादा अहम हो गया है। शायद यही वजह है कि हजारों करोड़ के मानहानि के मुकदमों का चलन नज़र आने लगा है। मुझे ये भारी भरकम मानहानि के मुकदमे न्याय के मूल सिद्धांत और बराबरी के संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ प्रतीत होते हैं। एक आम आदमी के लिए मानो ऐसे मुकदमे खामोश रहने की धमकी की तरह हैं। आप अंदाजा नहीं लगा सकते कि हज़ारों करोड़ के ये मुकदमे किसी ग़रीब शख्स के लिए कितना बड़ा ट्रॉमा हो सकते हैं। इसे मैंने कुछ उदाहरणों के जरिए समझने की कोशिश की है-

1. आप ज़रा सोचिए अगर 500 रुपये प्रतिदिन की मजदूरी करने वाला कोई शख्स अगर किसी अरबपति की मंशा पर आशंका जाहिर कर दे और उसके खिलाफ वो अरबपति 1000 करोड़ की मानहानि का मुकदमा कर दे तो उसकी हालत क्या होगा। मान लीजिए कि वो अदालत में कद्दावर वकील खड़े न कर सका तो उसका क्या हश्र क्या होगा, जरा इसकी कल्पना कीजिए।

एक हज़ार करोड़ की रकम यानि उस मजदूर के 2 करोड़ दिनों की मजदूरी। अगर वो 54795 साल तक काम करे तब कहीं जाकर इतनी बड़ी रकम चुका पाएगा। यानी 80 साल औसत के लिहाज से वो करीब 685 ज़िंदगी इस अरबपति के एक मुकदमे के नाम बंधुआ मजदूर हो जाएगा। इतनी बड़ी रकम के लिए उसे जन्म के साथ ही काम पर लग जाना होगा और 80 साल तक बिना थके हर दिन काम करना होगा, तब कहीं जाकर ये रकम पूरी हो पाएगी।

2. इसी तरह अगर एक लाख रुपये प्रतिमाह वाली सैलरी पर काम करने वाले पत्रकार को भी सवाल करने की अपनी आदत से तौबा करनी होगी। इन पत्रकार महोदय के लिए भी एक हज़ार करोड़ रुपये का मानहानि मुकदमा आसान नहीं रहने वाला। इन्हें एक लाख महीने के अपनी एक लाख रुपये की सैलरी अरबपति महोदय को अदा करनी पड़ सकती है अगर वो मुकदमा हार जाए। इतना ही नहीं इसे सालों मे बदल दें तो 8,333 साल और करीब 104 ज़िंदगियां इस एक मुकदमे के मकड़ जाल में फंस जाएंगी। इन पत्रकार महोदय को भी 104 ज़िंदगी जन्म के साथ ही एक लाख की सैलरी का जुगाड़ कर लेना होगा और 80 साल की उम्र तक ये रकम अदा करनी होगी।

3. क्या आपको नहीं लगता कि इतनी भारी-भरकम रकम वाले ये मुकदमे बराबरी के सिद्धांत को चुनौती देते हैं। एक व्यक्ति की अभिव्यक्ति की आज़ादी को मखौल बना देते हैं। एक व्यक्ति के मान को दूसरे व्यक्ति की ज़िंदगी के बरक्स अमानवीय तरीके से ज्यादा तरजीह दी जा रही है। आखिर कोई तो बैलेंस होना चाहिए एक व्यक्ति की आय और इस तरह के जुर्मानों के बीच।

4. आप खुद सोचिए 1000 करोड़ रुपये की ये रकम कई छोटे सूबों के जीडीपी के आस-पास होगी, कई सरकारी महकमों के सालाना बजट के बराबर होगी और लाखों किसानों की सालाना आय इस रकम में समा जाएगी। आखिर इस तरह के एकतरफा मुकदमों का आधार क्या है?

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