पशुपति शर्मा के फेसबुक वॉल से साभार

दीपक चौरसिया। पत्रकारिता का एक बड़ा नाम। मैं और मेरे हम-उम्र साथी जिस दौर में पत्रकारिता में प्रवेश का द्वार तलाश रहे थे, उस वक्त तक दीपक चौरसिया पत्रकारिता के स्टार बन चुके थे। ‘स्टारडम’ के साथ चाहे-अनचाहे एक व्यक्ति के बारे में कई तरह की धारणाएं ‘पब्लिक स्पेस’ में बन जाती हैं और आम लोगों के लिए ऐसी शख्सियतों के साथ संवाद करना सहज नहीं रह जाता। टीवी टुडे ग्रुप में जब साल 2007 में नौकरी लगी तो दीपक चौरसिया कभी-कभार फ्लोर पर आते, बस दूर से ही देखता। चाह कर भी कभी कोई संवाद नहीं कर पाया। करीब 12 साल बाद, 5 महीनों के लिए आपका सान्निध्य हासिल हुआ। शुरुआत में संवाद की झिझक रही। मुस्कुराहटों से काम चलाता रहा। और इस दौरान उनकी शख्सियत के कई और रंग सामने आते चले गए।

सुबह की न्यूज़ मीटिंग में कई बार आउटपुट के बाकी साथियों से पहले ही आ पहुंचते। कई बार इस विलंब के लिए हमें शर्मिंदगी होती लेकिन उनका बड़प्पन ये कि कभी इस ‘खीझ’ का एहसास तक नहीं होने दिया। बड़ी ख़बरों वाले दिनों में स्टूडियो में पहुंच गए तो फिर ‘नॉन-स्टॉप’ डटे रहने का जुनून आज भी जस का तस बरकरार। न्यूज़ रूम में बैठे साथियों ने सहमते हुए आग्रह भी किया कि सर ‘ब्रेक’ लेना चाहें तो ले लीजिए… तो मना करते देर नहीं लगती… ना-ना मैं ठीक हूं। हद तो ये कि कभी अगले दिन के एंकरिंग चार्ट के लिए बात की तो कहा- ” आपने पिछली बार अच्छी ड्यूटी लगाई थी, कल भी आप जो ड्यूटी लगाएंगे, मैं हाज़िर हो जाऊंगा। मुझे कोई दिक्कत नहीं। “

न्यूज़ रूम के जूनियर से जूनियर साथियों के बर्थ-डे केक की सूचना मिलते ही केबिन से आकर एक कुर्सी पर बैठ जाया करते। शुगर होने की वजह से केक खाते तो नहीं लेकिन बाकी लोगों के चेहरे की मिठास से अपना मन तर करने का मौका नहीं चूकते। ऐसा ही आलम समोसे-जलेबी की ‘दावतों’ के दौरान भी होता। स्वास्थ्य वजहों से समोसा-जलेबी खाएं भले ही न लेकिन एक पत्रकार की भांति ‘सूत्रों’ से ये पता जरूर लगा लेते कि किसके ‘सौजन्य’ से ये समोसे आए हैं। ऐसे मौकों की तस्वीरें खुद अपने अकाउंट से ट्वीट करते, सबसे पहले, सबसे तेज़। न्यूज़ रूम में आते तो दो मिनट का वक्त मेरे हिस्से भी आता। क्या हेडलाइन है, इस हेडलाइन का संदर्भ बदल दीजिए। इसी तरह किसी कार्यक्रम का प्रस्ताव लेकर जब भी गए तो उनकी उत्सुकता और स्वीकार्यता हैरान करने वाली रही। अपने सुझावों के साथ उसे समृद्ध किया और एक डेडलाइन में उसे अमल में लाने का संकल्प भी दिखाया। लोगों की कमी, संसाधनों की कमी को कभी ‘एक्शन’ के आगे आड़े नहीं आने दिया।

व्यक्तियों के बारे में हर किसी की अपनी धारणाएं होती हैं और वो बेहद निजी अनुभवों पर आधारित होती हैं। हां, कभी भी दूर बैठकर बनाई गई धारणाओं को अंतिम न मान बैठें, ये दीपक चौरसिया सर के साथ गुजारे पलों में मैंने महसूस किया। 5 महीने में दीपक सर को थोड़ा सा महसूस किया है। उनके लंबे अनुभव से बावस्ता होने की ख्वाहिश है। उनसे मैंने कई बार आग्रह किया है, अपने अनुभवों को कलमबद्ध कर पुस्तक का रूप दें। आपको मिली तालियों के शोर के पीछे के ‘सन्नाटे’ ज्यादा मायनीखेज होंगे। उन ‘सन्नाटों’ को शब्द दें।

‘सफ़रनामे’ का इंतज़ार रहेगा।