दयाशंकर मिश्रा के फेसबुक वॉल से साभार/ मेरे पास परिवार के लिए समय नहीं बचता। सुबह, बच्‍चे जब स्‍कूल जाते हैं, मैं ऑफिस निकलने की जल्‍दी में होता हूं। जब घर पहुंचता हूं, वह स्‍कूल, ट्यूशन की चिंता में लगे होते हैं। उनसे बात करने का समय ही नहीं मिलता।’ यह इस समय घर-घर की कहानी है। जहां कोई एक कामकाजी है, वहां कुछ कम, जहां दोनों कामकाजी, वहां का हाल एकदम रोबोटिक है। सबकुछ ‘मुंबई लोकल’ जैसा होता है। इतने बजकर इतने मिनट पर इतनी सांस यहां खर्च होगी, तो इतने बजकर इतने मिनट पर वहां कितनी सांस खर्च होगी। हर चीज का हिसाब है, तभी जिंदगी की मुश्‍किलों का सामना करना संभव हो पाता है। इसमें कहीं कोई समस्‍या नहीं, यह यथार्थ है। जो है, सो है। अब इसे कैसे जीना है। यह सबसे बड़ी बात है।

सांकेतिक चित्र- साभार गूगल

अब तक यहां जिस समय की बात हुई, वह अपने बच्‍चों को दिया जाने वाला है। मैं इससे एक कदम आगे की बात कर रहा हूं, वह समय जो हम अपने माता-पिता के साथ साझा करते हैं।ऐसे परिवार जो मेट्रो सिटी में रह रहे हैं, कुछ अधिक व्‍यस्‍तता से घिरे रहते हैं, क्‍योंकि ट्रैफिक जाम उनकी जिंदगी का एक ऐसा अंधेरा कोना है, जिससे लगभग हर दिन गुजरना होता है। उसके बाद ऑफिस के न खत्‍म होने वाले काम। हम बच्‍चों के लिए तो फिर भी समय निकाल लेते हैं लेकिन उनके लिए नहीं जिनके हम बच्‍चे हैं। बुजुर्ग हमारी संवाद प्रक्रिया से आहिस्‍ता-आहिस्‍ता बाहर हो रहे हैं। हमारे बड़े हमारे साथ दो तरह से हैं।

पहला- वह हमारे साथ रह रहे हैं। दूसरा- वह किसी दूसरे शहर में हैं। अगर माता-पिता हमारे साथ हैं तो उन्‍हें कितना समय दे रहे हैं। इस पर हमें निरंतर विचार की जरूरत है। इस बात को बाकी चीजों की तरह दिमाग में रखने की दरकार है कि उनको दिया जाने वाला समय उनकी दूसरी जरूरत जितना ही ध्‍यान देने योग्‍य है।

अभिभावक, अगर साथ नहीं रह रहे हैं तो उनको कितना समय दिया जा रहा है, यह और भी जरूरी हो जाता है। अक्‍सर दूसरे शहर में रहने वाले माता-पिता बच्‍चों को फोन करते हैं तो वह व्‍यस्‍त पाए जाते हैं। उसके बाद पलटकर हम कितने बार फोन कर पाते हैं, इस बात को हमेशा ध्‍यान रखा जाना चाहिए। ऐसा इसलिए क्‍योंकि हमारे साथ होने पर हम उनसे बातचीत के लिए, उनसे मिलने के लिए कितना समय निकाल रहे हैं। जबकि दूर रहने के कारण उनसे नियमित संवाद का ‘तार’ तो वैसे ही टूटा हुआ है।

इस टूटे ‘तार’ को जोड़ने के लिए जरूरी है कि जैसे भी हो, संवाद नियमित रखा जाए। उनके पास जाने को ‘हिल’ स्‍टेशन, गर्मियों की छुट्टियों जितना ही खास बनाया जाए। समय को भी संपत्ति की तरह बांटने की आदत हम जितनी जल्‍दी डाल लें, जीवन उतना ही बेहतर, सुखद और सुकून का साथी होगा। कुछ दिन पहले एक रेडियो शो में युवाओं के बीच माता-पिता को मिलने वाले समय पर रोचक चर्चा हुई। किसी ने कहा, वह हर दिन अपने अभिभावक को दस मिनट देते हैं। किसी ने बहुत हिसाब लगाने के बाद पंद्रह मिनट कहा। इसमें सबसे अधिक चिंता की बात यह थी कि इसमें हिस्‍सा लेने वालों ने माता-पिता को देने वाले समय को अपनी चिंता से बाहर रखा। सबके केंद्र में स्‍वयं, उनके बच्‍चे और यहां तक कि दोस्‍त भी शामिल थे, अगर कुछ छूटा तो वह माता-पिता थे।

मुझे नहीं लगता कि माता-पिता कभी छूट सकते हैं। अगर आप उन्‍हें अपने से बाहर करने लगे तो यकीन मानिए आप अपने बच्‍चों के केंद्र में कभी नहीं रह पाएंगे। यह प्रकृति का सबसे सरल, सामान्‍य नियम है। भले ही आप उससे असहमत हों।

दयाशंकर। वरिष्ठ पत्रकार। एनडीटीवी ऑनलाइन और जी ऑनलाइन में वरिष्ठ पदों पर संपादकीय भूमिका का निर्वहन। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र। आप उनसे ईमेल : dayashankar.mishra@zeemedia.esselgroup.com पर संपर्क कर सकते हैं। आपने अवसाद के विरुद्ध डियर जिंदगी के नाम से एक अभियान छेड़ रखा है। संपर्क- डियर जिंदगी (दयाशंकर मिश्र), वास्मे हाउस, प्लाट नं. 4, सेक्टर 16 A, फिल्म सिटी, नोएडा (यूपी