18 फरवरी 1994 को मेजर नागेन्द्र प्रसाद की आतताईयों ने हत्या कर दी थी। तब मैं आईपीएफ बोकारो जिला का अध्यक्षऔर मेजर नागेन्द्र प्रसाद उपाध्यक्ष थे। हम दोनों के नेतृत्व में बोकारो जिले की सदियों से दबी कुचली, ठगी-लूटी जनता प्रबल झंझावत और प्रचंड तूफान की तरह उठ खड़ी हुई थी। और पूरे जिले में माफियाई ताक़तों व जनविरोधी शक्तियों के खिलाफ शोषित जनता ने हल्ला बोल दिया था। शोषित – पीड़ित जनता का ऐसा उभार जनविरोधी व्यवस्था के पोषकों को कैसे रास आता ? और वही हुआ जिसका अंदेशा पहले से था। अपराधी पुलिस गठजोड़ ने जनता के बहादुर योद्धा मेजर नागेन्द्र प्रसाद की बोकारो जिला कोचागोडा गाँव में हत्या कर दी। मेजर नागेन्द्र की पाँचवीं शहादत वर्ष में कॉमरेड महेंद्र सिंह ने एक संस्मरण लिखा था। आज कॉमरेड महेंद्र सिंह भी हमारे बीच नहीं रहे। मेहनती समाज के दुश्मनों ने कॉमरेड महेंद्र जी की कायराना हत्या कर किसानों मजदूरों के बीच से हमेशा के लिए छीन लिया। कॉमरेड महेंद्र सिंह का ये लेख  बदलाव के पाठकों के लिए प्रस्तुत किया है काशीनाथ केवट ने।

8 फरवरी पर विशेष

निजी जीवन के सपनों तथा परिजनों की आकांक्षाओं के लिए शायद पैदा नहीं हुए थे कॉमरेड नागेन्द्र। सेना की नौकरी से जल्द ही उनका मन भर गया। जब वे पुनः पारिवारिक जीवन की ओर लोटे तो परिवहन विभाग में एमभीवाई की उस नौकरी की पेशकश को ठुकरा दिया जहाँ पैसों की बरसात होती है . अपनी गतिशीलता के अनुरूप ही उन्होंने दूसरा पेशा चुना . बोकारो इस्पात नगरी के बालिडीह औधोगिक इलाके में लघु उधमी का . इस पेशे के साथ कॉमरेड नागेन्द्र ने उस दौर की राजनीति के तत्कालीन केंद्र कर्पूरी ठाकुर के लोकदल के साथ अपना रिश्ता जोड़ा . लघु उधोग के प्रति सरकारी रवैये तथा पिछड़ी राजनीति की सीमा भी इन्हें बांध न सकी और तब उन्होंने उस दौर की राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय हस्तक्षेप का पर्याय बन चुके आइपीएफ के साथ अपना नाता जोड़ा .
हालांकि यह वह दौर था , जब कॉमरेड नागेन्द्र के कंधे पर कई नाबालिग लड़के – लड़कियों का बोझ था , पर कॉमरेड नागेन्द्र तो बोझ के विरुद्ध सीधी कमर व तनी कमर के आदि थे . उन्होंने तत्कालीन गिरिडीह तथा बोकारो जिले के साथ जुडकर ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को संगठित करने के कार्य में स्वयं को लगाया . कॉमरेड ने सेना की जिन्दगी के ” क्वीक मार्च ” और ‘ सीधी टक्कर ‘ को तो जैसे अपने जीवन के व्यवहार में ढाल लिया था . सच कहा जाय तो वे एक मायने के एक दायरे के चे-ग्वारा थे . वे जिन क्षेत्रों में कार्यरत रहे अपनी अतिरिक्त गतिशीलता , अतिरिक्त चुस्ती और अतिरिक्त आत्मविश्वास के साथ अतिरिक्त संवेदनशीलता  के लिए जाने जाते रहे .जिन्होंने कार्य के दौरान कॉमरेड नागेन्द्र को नहीं देखा वे उनके जज्बे की कल्पना शायद ही कर सकें . उनके इस जज्बे को समझने के लिए मैं उनके एक कार्य का उल्लेख करना चाहूंगा .
यह दौर कांग्रेसी कुशासन तथा पुलिस दमन की निरंकुशता के लिए जाना जाता रहा है .पुलिस नक्सली आंदोलन व इससे सहानुभूति रखने वाले युवाओं व सक्रियकर्मियों की तथाकथित मुठभेड़ में हत्या के लिए पुरस्कृत की जाती थी . इसी दौर में कॉमरेड नागेन्द्र ने बरकट्ठा ( हजारीबाग ) पुलिस की रोंगटे खड़े कर देने वाली हरकतों की चर्चा सुनकर बगैर किसी साथी और कमिटी को बताए बरकट्ठा थाने के घेराव के लिए निहायत नए इलाके के लोगों के बीच पर्चा जारी कर दिया तथा अपनी पुरानी राजदूत मोटरसाइकिल में पीछे बैटरी बांध और आगे वेल्डिंग कर स्टैंड बनाकर फिर उसमें चौंगा लगाकर अकेले ही प्रचार के लिए निकल पडे . और जबतक हमलोग जान व समझ पाते , इसके पूर्व ही उस क्षेत्र के महज एक दर्जन भुक्तभोगियों को लेकर थाने के गेट पर घेरा बनाकर खडे हो गये . उनकी इस दृढ़ता और गजब के आत्मविश्वास ने बरकट्ठा पुलिस सामयिक तौर पर ही सही , कुछ बिन्दुओं पर पुनर्विचार के लिए मजबूर कर दिया .
कॉमरेड नागेन्द्र बोकारो जिले के जरीडीह , कसमार , पेटरवार इलाके के ग्रामीण क्षेत्रों में खासकर आदिवासियों , दलितों व अत्यंत पिछड़ों के बीच अत्यंत ही लोकप्रिय हो गए थे . महज एक दो सालों में वे वे उनके अपने आदमी बन गए थे . रिश्वत वापसी तथा ग्रामीण क्षेत्रों में विकास कार्यों की अभिरुचि के अलावा वे कॉमरेडों के परिजनों को अपने ही ढंग से सही , पर आत्मनिर्भर बनाने के पक्के धुनी थे . उनकी इन गतिविधियों ने उन्हें उन क्षेत्रों में अपनी राजनीतिक दुकानदारी चला रहे नेतानुमा बिचौलियों की आँखों की किरकिरी बना दिया . हालांकि आपराधिक पृष्ठभूमि के नेताओं द्वारा उनकी हत्या कर दिए जाने के लक्षण उन्हें भी दिखने लगे थे , पर कॉमरेड ने जैसे मौत को भी धत्ता बताने की ठान रखी थी . और वही हुआ जिसकी आशंका थी . जरीडीह थाना के एक ग्रामीण आदिवासी बहुल इलाके में एक पेशेवर अपराधी ने अत्यंत कायरतापूर्ण तरीके से बर्बरतापूर्वक कॉमरेड नागेन्द्र की हत्या कर दी . रही – सही कसर सूचना मिलने के बाद भी विलंब कर उनकी मौत को जरीडीह थाने की पुलिस ने सुनिश्चित कर दी. शारीरिक रूप से कॉमरेड नागेन्द्र को खोये वर्षों हो गये .पर अपनी जीवंतता तथा गतिशीलता के कारण वे आज भी उस क्षेत्रों के कॉमरेडों के अंदर जिन्दा हैं. और जिन्दा रहेंगे कॉमरेड नागेन्द्र !