चित्रा अग्रवाल

 “अगर न्यूज़ ऑर्गनाइजेशन्स को अपनी विश्वसनीयता बरकरार रखनी हैं, तो उन्हें अपनी आईडियोलॉजीस, अपनी विचारधारा को सार्वजनिक कर देना चाहिए। क्योंकि हम माने या ना माने, एक पत्रकार भी आम इन्सान की तरह अपनी एक विशिष्ट विचारधारा रखता है, जो ना चाहते हुए भी उसके काम में उतर आती है। कुछ ऐसा ही समाचार संस्थानों के साथ भी है। सभी की अपनी विशिष्ट सैद्धान्तिकी और विश्वास हैं। ऐसे में हम जब न्यूट्रल होने की जबरन कोशिश करके अपनी बात सही और दूसरे को ग़लत साबित करने के लिए खबरें देते हैं, तो बहुत जल्दी एक्सपोज हो जाते हैं। आज सोशल मीडिया का दौर है। लोग तुरन्त आपका पूर्वाग्रह भांप लेते हैं और फेसबुक, ट्विटर या ब्लॉग पर आपकी असलियत खोल देते हैं। इस स्थिति से तो बेहतर है कि हम अपनी आईडियोलॉजी को खुलेआम स्वीकारें- कि हमें कॉन्ग्रेस में यकीन है या वामपन्थी विचारधारा में। हम भाजपाई तरीकों से सोचते हैं या हमारा झुकाव समाजवाद की तरफ है। इसके बाद जनता खुद निर्णय करे कि उसे कौन सा न्यूज़ चैनल देखना है, कौन सा नहीं। मुझे लगता है, इस तरह से कम से कम, न्यूज़ चैनलों की विश्वसनीयता कायम रह पाएगी। लोग हमें एक्सपोज नहीं करेंगे, झूठा नहीं कहेंगे और ना ही कोई हमें पूर्वाग्रह से ग्रसित होने का तमगा देगा।” लम्बे समय से पत्रकारिता में सक्रिय न्यूज़ नेशन टीवी समूह के मैनेजिंग एडिटर श्री अजय कुमार ने, ‘वर्तमान परिवेश में टीवी न्यूज़ की विश्वसनीयता’ विषय पर चर्चा के दौरान अपने यह विचार रखे।

मौका था माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के नोएडा कैम्पस में आयोजित प्रतिभा-2018 के समापन समारोह का। आयोजन में मुख्य अतिथि के रूप में पहुंचे अजय कुमार ने पत्रकारिता के छात्रों से संवाद किया और बहुत ही नपे तुले शब्दों में अपनी बात रखी।  पेड न्यूज़ के बारे में बोलते हुए उन्होंने कहा कि पेड न्यूज़ के लिए वर्तमान न्यूज़ व्यवस्था ज़िम्मेदार है। बहुत से चैनल्स दूर दराज के क्षेत्रों में स्ट्रिंगर्स से अपनी खबरें लेते हैं। पूरे दिन मेहनत करके, स्ट्रिंगर जो खबर जुटाता है, उसके लिए उसे बहुत कम मेहनताना दिया जाता है। पेट्रोल का खर्च तक नहीं निकलता। ऐसे में वो इन्सान क्या करेगा। न्यूज़ वो दे रहा है लेकिन उसे अपने परिवार का पेट भी पालना है। जब उसे उसके काम के सही पैसे नहीं मिलेंगे तो वो क्यों नहीं, न्यूज़ सोर्स से पैसे लेकर खबरे देगा। पेड न्यूज़ की जड़ वहीं हैं।

आज जो लगातार चीखते चिल्लाते एन्कर न्यूज़ चैनल की पहचान बन गए हैं, अजय कुमार ने इसके पीछे की व्यथा व्यक्त करते हुए कहा कि आज हर एक चैनल की एडिटोरियल टीम पर बाज़ार की प्रतियोगिता का इतना ज़्यादा दबाब है कि वो चाहकर भी अच्छा काम नहीं कर पाते। टीआरपी के खेल का मोहरा बनना सबकी मजबूरी है। हालांकि कुछ चैनल बदलाव की दिशा में कदम उठा रहे हैं लेकिन इलेक्ट्रॉनिक खबर की दुनिया की आर्थिकी को भी ध्यान में रखना ज़रूरी है। उन्होंने कहा कि आज हर जर्नलिस्ट जो दूर से बहुत बड़ा, ग्लैमराइज़्ड दिखाई देता है, दरअसल ईएमआई जर्नलिस्ट है। उसकी हर चीज़ ईएमआई पर चल रही है।  इस अवसर पर दिल्ली आजतक के सम्पादक, शम्स ताहिर खान ने भी अपराध पत्रकारिता विषय पर अपने विचार प्रस्तुत किए और विद्यार्थियों से सवांद किया।


चित्रा अग्रवाल। आगरा की निवासी चित्रा इन दिनों नई दिल्ली में रहती हैं। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की शिक्षा। प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया का करीब एक दशक का अनुभव।

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