जूली जयश्री

बदलाव बाल क्लब की फाइल तस्वीर

सावधान ! उपर वाला आपका वीडियो बना रहा है। आज कल सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में एक बच्चे को उसकी मां जबरदस्ती मार-मार कर पढा रही है , बच्चा तनाव में गुस्सा और आग्रह दोनों ही दिखा कर मां से छोड़ने को कहता है। अपेक्षा की अंधी मां बच्चे की मनोदशा नहीं देख पा रही है। लोग बच्चे के प्रति अपनी संवेदना जताते हुए इस वीडियो को खूब वायरल कर रहे हैं। वायरल करने वाले लोगों में कितनों ने इस वीडियो से क्या सीख ली पता नहीं।

इस बीच गाजियाबाद के वैशाली से एक और हैरान कर देने वाली ख़बर आई। छठी और 8वीं कक्षा में पढ़ने वाले बहन-भाई घर से अचानक भाग गए, वजह थी पीटीएम (स्कूल में पैरेंट-टीचर मीटिंग) में टीचर ने बच्चों की शिकायत की थी जिस पर मां ने कुछ फटकार लगाई और बच्चों ने घर से भागने जैसा कदम उठा लिए ।

पहली नजर में ये दोनों घटनाएं भले ही दो तरह की लग रही हों लेकिन मुद्दा एक है और वो है मां-बाप की अपेक्षा के अनुरूप बच्चों का प्रदर्शन न होना यानी बच्चों का पढ़ाई में “अव्वल न आना’’। इन दोनों ही घटनाओं में पढ़ाई के दबाव से उपजी मनोवृति है। जी हां, जब हम इन घटनाओं के जड़ में झांकते हैं तो जो समानता नजर आती है वो है माता पिता के खौफ की मनोवृति। बात थोड़ी कड़वी जरूर है पर यही सच है।

बच्चों से कैसे करें मन की बात

ढाई आखर फाउंडेशन, बदलाव और बदलाव बाल क्लब के संयुक्त प्रयास से जल्द ही हम अभिभावक और बच्चों के बीच एक संवाद कार्यक्रम का आयोजन करेंगे। इसमें बच्चे भी अपने मन की बात रखेंगे। अभिभावक भी। इसके साथ ही बाल मनोविज्ञान के विशेषज्ञ, शिक्षण के पेशे से जुड़े एक्सपर्ट और लेखक-साहित्यकारों के साथ संवाद किया जाएगा।

पढाई के आतंक से बच्चे ने अपनी जान ले ली, भाग गए या कोई और गलत रास्ता अपना लिया। आए दिन हम इस तरह की घटनाओं से दो चार होते रहते हैं या यूं कहें कि ऐसी घटनाएं समाज में तेजी से बढ़ने लगी हैं। स्थिति सुधरने की बजाय और बदतर होती जा रही है। अब हम सबको गहनता से विचार करने की जरुरत है। जरा सोचिए ये कैसी शिक्षा व्यवस्था है ,जिसमें पढ़ाई जान से ज्यादा जरुरी होती जा रही है ? आज हम सभ्यता के उस दौर से गुजर रहे हैं जहां वेस्ट कुछ रहा ही नहीं हर किसी चीज या इंसान की अपनी अहमियत है ,यदि जरुरत है तो सिर्फ उसे सही जगह पर पहुंचाने की ।

आओ करें मंथन- कहीं हमसे कोई चूक तो नहीं हो रही!

हम किस तरह की मानसिकता से ग्रस्त हैं कि किसी भी कीमत पर हमारा बच्चा क्लास का फर्स्ट बच्चा ही कहलाए। उजागर भले ही कुछ एक घटनाएं ही होती हैं पर कमोवेश हर घर की यही कहानी है। बच्चे के साथ बच्चा बनने, उसका मित्र बनने का समय नहीं है हमारे पास, लेकिन उनसे हमारी अपेक्षाएं बड़ा बनने की रहती हैं। ज्यादातर मामलों में तो मां बाप अपनी असफलता का सारा तनाव बच्चे पर ही निकालते हैं और ऐसे में उनकी अपेक्षा और बढ़ जाती है , जो वो नहीं कर पाए वो बच्चे से करवा कर ही दम लेंगे।

बचपन में जब सीखने की क्षमता सबसे तेज होती है ,उस उम्र से ही आप सिखाने के बदले लादना या ठूंसना शुरू कर देते हैं और उस पर भी अपेक्षा की बच्चा पढाई से प्रेम करे। आप से प्रेम करे। इसी उम्र में कई कीर्तिमान गढ़ ले। पर ये कैसे मुमकिन है। जोर-जबरदस्ती कर आप उसके अंदर सिर्फ आतंक और नफरत ही बढ़ा सकते हैं। हम सबने अपने बुजुर्गों से गुरुजी के डंडे खाने की कहानी जरुर सुनी होगी। पर क्या कभी स्वतंत्र बचपन की कहानी नहीं सुनी। तो जरा गौर कीजिए उन दिनों मासूम बचपन गुजरने के बाद ही बकायदा संस्कार के साथ शिक्षा-दीक्षा की प्रक्रिया शुरु की जाती थी। उस समय की शिक्षा सिर्फ किताबों में सीमित नहीं थी। प्रकृति देश समाज , व्यवहार, आचार, व्यवहार, जीवनोपयोगी कार्य सब सिखाए जाते थे।

न डिजिटल बोर्ड, न यू ट्यूब, न ई बुक और न ही भारी बैग सब कुछ व्यवहार के जरिए सिखाया जाता था। विश्व प्रसिद्ध साइंटिस्ट अलबर्ट आइंस्टीन का पीटीएम (उनके बारे में शिक्षकों की राय) कभी अच्छी नहीं हुआ करती थी, यहां तक कि कहते हैं उन्हें स्कूल से भी निकाल दिया गया था लेकिन उनकी मां ने अपने बच्चे पर विश्वास कायम रखा। नतीजा आज दुनिया के सामने है। खैर ये तो इतिहास की बात रही , अभी कुछ दिन पहले तक टीवी पर एक हेल्थड्रिंक का एक एड आता था, आपके 10th में कितने नंबर आए थे।  मेरे 10th में 59% आए थे फिर भी मैं आपके बच्चे की प्रिंसिपल हूं। ऐसा कोई रिपोर्ट कार्ड आज तक बना नहीं जो बच्चों की काबिलियत बता सके।

रिपोर्ट कार्ड बताते हैं तो सिर्फ नंबर, जो वैसे भी किसी को याद नहीं रहने वाले। मार्क्स छोड़िए और सीखने पर जोर डालिए। एड में भी एक पीटीएम ही दिखाया गया है, जहां प्रिंसिपल आपको अपने बच्चे की काबिलियत समझने पर जोर दे रही है न कि नंबर पर। मौजूदा माहौल में जरुरी हो गया है कि सभी माता-पिता बच्चे के रिपोर्ट कार्ड से पहले अपनी रिपोर्ट कार्ड और अपना बचपन याद करके देखें। बहुत सारी समस्याएं खुद ब खुद सुलझ जाएंगी।


जूली जयश्री। मधुबनी की निवासी जूली इन दिनों ग़ाज़ियाबाद के वसुंधरा में रहती हैं। आपने ललित नारायण मिश्रा यूनिवर्सिटी से उच्च शिक्षा हासिल की है। पत्रकारिता का उच्च अध्ययन उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से लिया है। कई मीडिया संस्थानों में नौकरी के बाद अब वो बतौर फ्री-लांसर काम कर रही हैं।

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