शंभु झा

बच्चों के मन की बात कैसे करें, कार्यक्रम में बच्चे और अभिभावक।

रविवार की अलसाई दुपहरी थी। मैं कुर्सी पर बैठे-बैठे ही एक झपकी ले चुका था और अब इस बात पर चिंतन कर रहा था कि कुर्सी पर सोने की प्रैक्टिस जारी रखी जाए या बिस्तर पर जा कर बाकायदा नींद ली जाए। तभी मोबाइल फोन की घंटी बजी। वरिष्ठ सहयोगी मयंकजी की कॉल थी। मयंक जी..इस वक़्त..फ़ोन पर ! नींद उड़ गई। सावधान मुद्रा में आकर फ़ोन रिसीव किया। उन्होंने जो कुछ बताया वह काफी चौंकाने वाला था।

ग़ाज़ियाबाद के वैशाली के दो बच्चे अचानक घर से गायब हो गए। दोनों भाई-बहन थे। 14 और 12 साल के। पीटीएम में टीचर ने मां के सामने बच्चों की शिकायत की। मां ने बच्चों से कहा कि पिता को मालूम पड़ेगा तो वे नाराज़ होंगे। बस इतनी सी बात थी लेकिन बच्चों ने इसे दिल पर ले लिया। ट्यूशन पढ़ने के लिए निकले और फिर घर नहीं लौटे। हंगामा मच गया। बात अड़ोसी-पड़ोसी से मीडिया और पुलिस तक जा पहुंची। करीब 24 घंटे बाद दोनों बच्चे उत्तराखंड के मुंशियारी मिले।

इस घटना ने मुझे झकझोरा। न सिर्फ पत्रकार होने के कारण बल्कि एक पिता के लिहाज से भी। जब से घटना सामने आई है, इसे लेकर बहुत कुछ लिखा-पढ़ा और कहा-सुना गया है। मनोवैज्ञानिकों से लेकर समाजशास्त्रियों तक ने अपनी राय रखी है। कहा गया कि बच्चों को डांटना फटकारना नहीं चाहिेए। उनसे ज्यादा उम्मीदें नहीं रखनी चाहिेए। प्यार से समझाना बुझाना चाहिए। बच्चों से ‘मन की बात’ करनी चाहिए। उनके दिल की बात समझनी चाहिए। वगैरह वगैरह। ये सारी ऐसी सलाह है, जिन्हें सुन कर कोई भी व्यक्ति अपने सिर को ऊपर नीचे हिलाएगा और अपनी आंखों को फैला कर कहेगा कि हां, सऱ, बिलकुल सही बात है। लेकिन आदर्श में ये बातें जितनी आसान लगती हैं, व्यवहार में उतनी ही मुश्किल हैं।

बच्चों से कैसे करें मन की बात, माताओं ने लिए कुछ खास टिप्स

महानगरीय जीवन में नौकरी का प्रेशर, ईएमआई भरने की चिंता, पति-पत्नी के रिश्तों का तनाव, घर से लेकर दफ्तर तक का स्ट्रगल। कई ऐसे कहे-अनकहे कारण हैं, जिनकी वजह से माता-पिता तनाव में रहते हैं। ऐसे में बच्चे अनजाने में ही उनका सॉफ्ट टारगेट बन जाते हैं। और वे अपनी सारी भड़ास बच्चों पर निकाल देते हैं। क्यों ? क्योंकि बच्चे मां पिता पर आश्रित होते हैं। शारीरिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से भी। जरा सोचिए कि अगर बच्चे आप पर निर्भर नहीं हों तो क्या आप उन्हें उस तरह डांट फटकार सकेंगे, जैसे अभी करते हैं। क्या कोई अपने बालिग और नौकरीशुदा लड़के लड़की को उस तरह डांट सकता है जिस तरह आठवीं-दसवीं के बच्चों को।

तो जनाब, इस बात को समझिए कि एकल और नाभिकीय (न्यूक्लियर) परिवारों के बच्चे समय से पहले परिपक्व हो रहे हैं। यह अच्छा है या बुरा है, इस पर ज्यादा दिमाग मत लड़ाइए क्योंकि यह ठोस सामाजिक वास्तविकताओं पर आधारित एक खुरदरा सच है। हम चाहे या न चाहें, मगर यही सच है। इसलिए बच्चा जैसे ही कार्टून देखना बंद करे और अपनी पसंद की मूवीज, सीरियल, गेम्स वगैरह की तरफ उन्मुख हो, तो रिश्तों का गियर चेंज कर लीजिए। मान लीजिए कि अब वह बड़ा हो गया/ हो गई है। उसके साथ दोस्त की तरह पेश आइए।

बच्चों से कैसे करें मन की बात- कार्यक्रम के दौरान विशिष्ट अतिथि

दोस्त भी बेस्ट फ्रेंड टाइप। ऐसा जिगरी दोस्त जिसे आप चार बातें सुना दें तब भी वह आपको छोड़ कर नहीं जाए। लेकिन यह वन साइडेड नहीं हो सकता है। जिस तरह आपका बेस्ट फ्रेंड आपको अगर कुछ भला बुरा भी बोल दे तो आप रिश्तों का लिहाज कर उसे इग्नोर कर देते हैं, वही बात अपने बच्चों पर भी लागू करनी होगी। इसके लिए आपको अपने पैतृक/मातृक अहंकार की पोटली बांध कर उसे ताखे पर रख देना होगा और इस बात के लिए तैयार रहना होगा कि अगर बच्चे को कोई बात बुरी लगेगी तो वह आपके सामने ही आपको फींचेगा-धोएगा और सुखाएगा, आप उसे सुनेंगे और समझेंगे (या कम से कम समझने की कोशिश करेंगे)। अगर बच्चों के साथ ऐसा याराना भरा रिश्ता बन जाए तो आप डांट फटकार तो क्या अगर किसी दिन दो थप्पड़ भी लगा देंगे तो वह आपको छोड़ कर नहीं जाएगा।

बातों बातों में मैंने भी बहुत ज्ञान दे दिया। बस करता हूं। आलेख लंबा हो चला है।


sambhuji profile

शंभु झा। महानगरीय पत्रकारिता में डेढ़ दशक भर का वक़्त गुजारने के बाद भी शंभु झा का मन गांव की छांव में सुकून पाता है। दिल्ली के हिंदू कॉलेज के पूर्व छात्र। आजतक, न्यूज 24 और इंडिया टीवी के साथ लंबी पारी। फिलहाल न्यूज़ नेशन में डिप्टी एडिटर के पद पर कार्यरत। 

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