जूली जयश्री

कहते हैं कि बच्चों की कल्पना का संसार अपरिमित होता है। हम बड़े चाह कर भी उनकी इस उड़ान में बराबरी नहीं कर सकते। वे अपनी सोच में किसी भी बात को लेकर पूरी कहानी गढ़ लेते हैं। अब ये हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम उनकी रचनात्मकता को किस तरफ ले जाएं। आज मेरे साथ कुछ ऐसा वाकया हुआ, जिसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया।

मैं उस वक्त हैरान रह गई, जब मेरी आठ साल की बेटी ने वेटेनरी डॉक्टर को लेकर अपनी समझ की जानकारी मुझे दी। अमूमन किसी भी बात को लेकर उसकी समझ इतनी व्यापक रहती है कि मुझे उसकी उम्र के हिसाब से यकीन करना भी मुश्किल लगता है। आज ये बताते हुए उसका रुप कुछ और था। पहले तो उसकी बात पर मुझे हंसी आई पर अगले ही पल मैं सोच में पड़ गई कि आखिर उसने अपनी कल्पना में इस तरह का चरित्र गढ कैसे लिया !

उसने विस्तारपूर्वक बताया कि, किस तरह वो जब भी सुनती थी कि किसी जानवर का इलाज हुआ तो, वो सोचती थी कि जंगल में भी हमारे जैसा कोई अस्पताल होता होगा। दरअसल, वो अब तक यही समझती आयी थी कि वेटेनरी डॉक्टर भी कोई जानवर ही होता है। और हम इंसानों की तरह उनकी भी दुनिया में इलाज का सब काम उनके द्वारा ही किया जाता है। वो महज जानकारी तक सीमित नहीं थी ,जानवरों के इलाज को लेकर उसके मस्तिष्क में व्यापक प्रक्रिया बसी थी।

उसकी इस बात से मैं तो गहरे सोच में पड़ गई हूं। जरा सोचिए किस तरह कार्टून की दुनिया बच्चों के मनोविज्ञान को प्रभावित कर रही है। वो कार्टून की तिलिस्मी दुनिया में कैद हो रहे हैं। फिर चाहे वो कोई सुपर मैन की कहानी हो, कोई परी कथा या फिर डॉरेमोन की कहानी। कार्टून आजकल के बच्चों के जीवन का अनिवार्य हिस्सा बन चुके हैं। अनेक अध्ययनों से भी साबित हो चुका है कि कार्टून देखने से बच्चों की काल्पनिक शक्ति पर दुष्पभाव पड़ता है। दिलचस्प बात तो ये है कि बच्चे कार्टून देखते भर नहीं हैं बल्कि उसके साथ खुद को जोड़ भी लेते हैं। बच्चे इंसानी हाव भाव में बात करने वाले कार्टून की नकल करना शुरु कर देते हैं। कार्टून की वजह से बच्चे वास्तविक संसार और वास्तविक जीवन से बहुत दूर हो जाते हैं। जरुरी है कि हम सब बच्चों के हक में इस बात पर गहराई से सोचें।


जूली जयश्री। मधुबनी की निवासी जूली इन दिनों ग़ाज़ियाबाद के वसुंधरा में रहती हैं। आपने ललित नारायण मिश्रा यूनिवर्सिटी से उच्च शिक्षा हासिल की है। पत्रकारिता का उच्च अध्ययन उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से लिया है। कई मीडिया संस्थानों में नौकरी के बाद अब वो बतौर फ्रीलांसर काम कर रही हैं।

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