फिल्म ‘प्रेम के बंधना’ की टीम

बरुण के सखाजी

सीमित संसाधन, प्रचुर व्यावसायिकता के अभाव के बावजूद व्यापक दर्शक वर्ग से बात करता छत्तीसगढ़ी फिल्मों का संसार जितना क्षमतावान है उतना उसे दायरा नहीं मिल पा रहा। बीते 56 सालों से प्रदेश में छत्तीसगढ़ी फिल्में बन रही हैं। लेकिन वास्तविक स्वर्णकाल राज्य स्थापना के बाद ही आया। साठ के दशक में फिल्म कहि देबे संदेस के बाद सत्तर के दशक में भी एक फिल्म आई, लेकिन जेहन में न उतर सकी। बहरहाल, साल 2000 के बाद आईं फिल्मों ने छत्तीसगढ़ी सिनेमा का अतीत बदल दिया। इसी दौर में इन्हें एक महानायक भी मिल गया और आपसी खींचतान का तोहफा भी। आज 17 सालों से बन रहीं फिल्मों में भले ही आम दर्शक के जेहन में चंद फिल्में ही दर्ज हो पाई हों, लेकिन इनके संगीत की लोकप्रियता दूरदराज तक लोगों के सिर चढ़कर बोलती है। कुछ ऐसा ही इन फिल्मों के महानायक अनुज शर्मा की लोकप्रियता का हाल है, जहां लोग उनकी तुलना सलमान खान, आमिर खान और शाहरुख जैसे नायकों से भी करते हैं। फिल्में व्यावसायिक हो रही हैं, आगे बढ़ रही हैं और अपनी परवाज को तैयार हैं, लेकिन इनके पैरों में लोगों की अपनी सांस्कृतिक बोली, वाणी, रहन-सहन और जीवनशैली के प्रति हीनता बेडिय़ों का काम कर रही है। रही-सही कसर सरकारें पूरी कर दे रही हैं, जिनके तंग दिल से इनके लिए एक अदद फिल्म सिटी, फिल्म विकास के लिए कोई क्रियाशील संस्था, स्थानीय स्तर पर प्रोत्साहन के लिए इकहरी स्क्रीन वाले सिनेमाओं पर दया की दरिया दिली नजर नहीं आती। बीते दिनों इन्हें और करीब से देखने, समझने और जानने का मौका उस वक्त मिला जब हमने तखतपुर (बिलासपुर) में चल रही प्रेम के बंधना फिल्म की शूटिंग देखी।

सीमित संसाधनों में भी रचनात्मकता का चरम

इन फिल्मों की अपनी बजटिंग और दायरा है, लेकिन तमाम दुष्वारियों के बीच जो अंतिम नतीजे आते हैं वह किसी समृद्ध सिनेमा से कम नहीं कहे जा सकते। यह इसलिए, क्योंकि इनसे जुड़े लोगों का कला, अभिनय और तमाम चुनौतियों को मात देने की इच्छाशक्ति अद्भुत है। तखतपुर में चल रही अनुज की फिल्म प्रेम के बंधना की पूरी टीम को करीब 17 साल इसी काम में हो गए हैं। कोई प्रॉपर्टी का काम संभालता है तो कोई परिवहन का। इनमें वे कलाकार भी शामिल हैं जो पेशे से या तो कोई व्यवसाय करते हैं या नौकरी। लेकिन फिल्मों के लिए इसे उनका समर्पण ही कहा जाए कि इनसे अवकाश लेकर भी यहां जुट जाते हैं।

तकनीकी भी हो रही समृद्ध

तकनीकी के मामले में अभी क्षेत्रीय फिल्में बहुत पीछे हैं। छत्तीसगढ़ी ही नहीं भोजपुरी में भी बजटिंग के अनुसार तकनीक का चयन हो रहा है। ऐसे में हमारी छत्तीसगढ़ी फिल्मों में कैमरा, एक्शन और लाइट्स के बीच अपडेशन की जरूररत है। लेकिन इन सबके बीच भी जो अच्छी चीज है वह यह कि इन फिल्मों का निर्माण कहीं भी नहीं लगता कि इन्हें 15 साल पुराने पारंपरिक कैमरों से शूट किया गया है। हाल ही में आई फिल्म राजा छत्तीसगढिय़ा भाग-2 में हॉलीवुड स्टाइल के प्रोमो ने गांव-गांव तक नायक और फिल्म निर्माण से जुड़ी टीम की चर्चाएं पहुंचा दी हैं।

अलग-अलग पेशों से फिल्मों में काम का जुनून

इन फिल्मों में काम करने वाले आमतौर पर स्थानीय कला, संस्कृति और परंपराओं से जुड़े लोग हैं। प्रयोगों की ऐसी गंगा सामान्यत: क्षेत्रीय सिनेमा में नहीं देखने को मिलती, जैसी यहां है। कुछ साल पहले आई एक फिल्म मिस्टर टेटकूराम हास्य की एक स्वस्थ्य फिल्म थी। खासे बजट पर तैयार इस फिल्म को भले ही दर्शकों ने खारिज कर दिया, लेकिन अपनी तरह का यह प्रयोग काबिलेतारीफ था। क्षेत्रीय सिनेमा जहां एक तरफ संसाधनों से जूझता है तो वहीं यह पेशेवर फुलटाइमर्स की कमी से भी खूब दोचार होता है। ऐसे में फाइनेंसर भी पैसा लगाने में झिझकते हैं। तब अगर कोई ऐसी प्रायोगिक फिल्में बनाता है तो बड़ी बात है। कुछ साल पहले ऐसे ही प्रयोगों की बुनियाद पर माओवादी को एड्रेस करती एक फिल्म और बनी थी। इसे भी बहुत पसंद नहीं किया गया, मगर फिल्म ने प्रयोग नहीं छोड़ा। गांव, कस्बों में राज करते हैं कलाकार।

चुनावों में भी छाए रहते हैं कलाकार

छत्तीसगढ़ी फिल्मों की माली हालत जो भी हो, परंतु कलाकार की बड़ी प्रशंसक संख्या इनकी बड़ी ताकत है। प्रेम के बंधना के मुख्य कलाकार अनुज शर्मा बताते हैं कि छत्तीसगढ़ी फिल्मों से जुड़े हर कलाकार के पास चुनावों के दौरान बड़ा काम होता है। राजनीति भी यह मानती है कि इनका संवाद लोगों के साथ अधिक जीवंत और विश्वनीय है। इसकी वजह यह है कि इनके साथ लोग आते हैं। सुनते हैं और मानते भी हैं।

कहानियों पर नहीं, एंटरटेनमेंट पर जोर

जब बॉलीवुड में निर्माण लागत इतनी ज्यादा हो गई हो कि वहां भी एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमें और एंटरटेनमेंट जैसे जुमले चलने लगे हों तो क्षेत्रीय सिनेमा से किसी सामाजिक बड़े और व्यापक मसले पर फिल्म की उम्मीद बेमानी है। छत्तीसगढ़ी फिल्मों में मुगेंबो स्टाइल के खलनायकों की भी भरमार है, तो वहीं आम मेलोड्रामा भी भरपूर है। प्रेम के बंधना फिल्म के निर्देशक शिवनरेश केशरवानी बताते हैं कि छत्तीसगढ़ी फिल्में मनोरंजन के मूल पर केंद्रित होती हैं। लेकिन इनमें कोई न कोई संदेश जरूर दिया जाता है। इन फिल्मों में मैच्योरिटी का संकट नहीं है, यह अपने आपमें संपूर्ण हैं। दर्शक एक खास तरह का है, जिसे दिमाग में रखकर ही इन्हें बनाया जाता है। कलााकार नीलम देवांगन कहती हैं हमें एक-एक संवाद के लिए काम करना पड़ता है। वहीं श्वेता शर्मा कहती हैं कि हम जब काम करते हैं तो खुशी मिलती है। आपस में पूरे एंटरटेमेंट मूड के साथ अभिनय को जीते हैं। हल्के-फुल्के हास्य भी करते रहते हैं। वहीं अनुज शर्मा की फिल्म प्रेम के बंधना के सह निर्देशक आलेख चौधरी कहते हैं कि जब तक किसी भी फिल्म में जितनी मेहनत होती है, वह यह तय करती है कि वह कितनी सफल होने जा रही है। फ्लॉप शब्द खासकर छत्तीसगढ़ी सिनेमा से अभी अछूता ही है, विफल होना अलहदा मसला है। परंतु किसी भी फिल्म को दर्शक पूरी तरह से नहीं नकारता। चूंकि हम बहुत कम स्क्रींस के साथ आते हैं। अब देखिएगा राजा छत्तीसगढिय़ा का भाग 2 एक साथ 35 स्क्रींस पर आया है, अच्छा रिस्पॉन्स आना चाहिए।  

 बातचीत

            छत्तीसगढ़ी फिल्में अपने आपमें एक धरोहर हैं। सरकार ने भी कोशिश की है, कि इन्हें अच्छे मौके मिलें और स्थानीय कलाकार भी फुलटाइमर अपना करियर यहां दे सकें। हमारी कोशिश है नित नए प्रयोग करें। हाल ही में हमने राजा छत्तीसगढिय़ा फिल्म को हॉलीवुड स्टाइल में पेश किया है। हमारे लिए अच्छे दिन ये हैं कि आज हम प्रदेश के बड़े दायरे तक पहुंचते हैं। बलरामपुर के एक छोटे से गांव की बात हो या राजनांदगांव के। इन फिल्मों की रीच है। अब राजा छत्तीसगढिय़ा की सीक्वल 2 दिसंबर को रिलीज किया गया है। आप यकीन मानिए इसे प्रदेश के सारे के सारे सिंगल स्क्रींस मिले हैं।

    – अनुज शर्मा, अभिनेता, छत्तीसगढ़ी फिल्म

            हम सब एंजॉय करते हैं। इतना वक्त हो गया कि अभिनय में अब रम गए हैं। अच्छा लगता है जब दूरदराज गांवों तक में हमारे अभिनय के कद्रदान मिलते हैं। संकट तो है, पर वैसा नहीं जैसा राज्य बनने से पहले था। अब देखिए इन 16 सालों में प्रदेश में जहां सालभर में एक फिल्म भी नहीं बन पा रही थी, वहीं अब औसतन 30 से 35 फिल्में बन रही हैं। अगर व्यावसायिक संभावनाएं कम होती तो यह कैसे संभव होता।

    – चंद्रकला, कलाकार

            छत्तीसगढ़ी का प्रभाव हमारे 27 जिलों की 3 करोड़ जनता में तो है ही, साथ ही मध्यप्रदेश के छत्तीसगढ़ से जुड़े जिलों में भी खासा है। एक तरह से हम मोटामोटी देखें तो 4 करोड़ दर्शक वर्ग के साथ एक मैच्योर सिनेमा की ताकत रखते हैं। आने वाला दौर है, जिसमें छत्तीसगढ़ी फिल्मों में जोखिम वाले प्रयोग भी होने लगेंगे। चूंकि बजटिंग एक बड़ा मसला है, ऐसे में जोखिम वाले प्रयोग करना मुमकिन नहीं। इसके अलावा इन फिल्मों को अंडरएस्टिमेट करने की एक वर्ग विशेष की आदत भी कई बार घातक है, लेकिन उन्हें भी जवाब मिल रहा है।

    – शिवनरेश केशरवानी, फिल्म निर्देशक

            हम लोग तो थिएटर के लोग हैं। छत्तीसगढ़ी फिल्में हमे प्रतिभा निखारने का तो मौका देती ही हैं साथ ही एक प्लेटफॉर्म भी हैं जहां हम लगातार कुछ न कुछ नया करने के लिए तत्पर रहते हैं। थिएटर स्तर की गंभीरता फिलहाल तो बॉलीवुड में संभव नहीं है तब क्षेत्रीय सिनेमा से उम्मीद बेमानी होगी। बहरहाल, हम सब मिलकर एंजॉय करते हुए इन फिल्मों में कुछ न कुछ नया करने की कोशिश करते हैं।

    – अनिल शर्मा, कलाकार

            रिमोट लोकेशंस में शूट के सिलसिले में दूर रहना पड़ता है। पर जैसे ही हम कैमरे के सामने होते हैं तो यकीन मानिए कि खुशी होती है। लंबी शूटिंग की सारी थकान कहीं खो जाती है।

    – धर्मेंद्र चौबे, हास्य कलाकार

            संगीत पक्ष इन फिल्मों को जबरदस्त है। साथ ही डांसिंग को लेकर भी दर्शक अब मांग करने लगे हैं। प्रयोगों से लबरेज कोरियोग्राफी की डिमांड है। छत्तीसगढ़ी फिल्मों में एक तरह से हर तरह का तड़का लगा होता है। कोरियोग्राफी के भी पेशेवर स्थानीय स्तर पर ही मिलने लगे हैं। फाइटिंग के लिए भी निर्भरता खत्म हो रही है। चूंकि 4 करोड़ दर्शकों की बड़ी संख्या वाला यह सशक्त सिनेमा है।

    – निशांत उपाध्याय, कोरियोग्राफर एवं कलाकार

            फिल्में पैसा वसूल स्टाइल पर अभी नहीं आई हैं। हम लोग ऐसी फिल्में बनाना चाहते हैं जो दर्शक के मन में स्थान बनाएं। सिर्फ पैसा लगाकर पैसा निकाल लेना तो आम बात है। छत्तीसगढ़ी सिनेमा आने वाले दिनों में पर्याप्त रूप से समृद्ध होगा।

    – अशोक ठाकुर, फिल्म निर्माता, प्रेम के बंधना

            परिपक्वता तो पर्याप्त है। संसाधनों की कमी है, लेकिन इससे न तो निर्माण पर असर पड़ता है और न ही कहीं भी प्रस्तुतिकरण पर। अगर पूर्वाग्रह छोड़ दें तो यकीनी तौर पर फर्क करना मुश्किल होगा कि कौन सी फिल्म बॉलीवुड की है और कौन सी छत्तीसगढ़ी।

    – अशरफ, फिल्म कलाकार

            कैमरा फिल्म की जान होता है। अभिनय, निर्देशन, आलेख, संपादन, संगीत, गीत, वादन तमाम फिल्मी शाखाएं अपनी तरह से महत्वपूर्ण हैं, लेकिन कैमरे का काम चुनौतीपूर्ण है। चूंकि रिटेक्स, लोकेशंस और सिचुएशन के हिसाब से शूटिंग में घंटों खड़े रहना। जब तक संतुष्ट नहीं होना तब तक कि शॉट डिमांड के अनुरूप नहीं आया कठिन है। फिल्म किसी भी बजट की हो, मेहनत बराबर लगती है।

    – राजकुमार, कैमरामैन

            क्षेत्रीय फिल्मों में काम करना अपने आपमें बड़ा मेहनती है। आपको बहुत क्रिएटिव होना चाहिए। दर्शक के अनुरूप अभिनय देना, संगीत, नृत्य की प्रधानता इन फिल्मों की बैकबॉन होती है। हमें खुशी होती है कि छत्तीसगढ़ में हम औसतन 30 से 35 फिल्में सालाना बना रहे हैं।

    -लवली, अभिनेत्री


 बरुण के सखाजी, माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई। किताब-‘परलोक में सैटेलाइट’। दस साल से खबरों की दुनिया में हैं। फिलहाल छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में पत्रिका न्यूज के संपादक।

साभार- sakhajee.blogspot.in

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