अनुशक्ति सिंह के फेसबुक वॉल से साभार

कभी किसी को कहते सुना था, जहाँ न जाये रवि वहाँ जाये बिहारी. एक बार कश्मीर के किसी सुदूर गाँव में ठेले वाले से भूँजा खरीदने रुकी तो ठेला वाला बिहार का निकला.  चेन्नई में समोसे अकेले बिहारी की दुकान पर मिले. सुदूर उत्तरीपूर्व के इलाके धेमाजी में पारम्परिक कपड़ों की दुकान समस्तीपुर के झाजी की थी. सिक्किम के अलग-अलग इलाकों में बिहारियों की बस्ती बसी हुई है. अंडमान में टूर गाइड बेतिया के साहब थे. मतलब यह कि देश के जिस कोने में गयी वहीं बिहार मिल गया.

ऐसा नहीं है कि सिर्फ बिहार ही जगह-जगह है. बंगाल और पंजाब का फैलाव भी बिहार जितना ही है पर जो बात बिहारियों को अलग करती है वह यह है कि बंगाल और पंजाब अंग्रेजीदां तो हो गए पर इसके साथ अपनी संस्कृति को भी जिंदा रखा. पंजाबियों के पराठे कनाडा तक ग़दर मचाते हैं, बंगाली समुदाय कितना भी लघु क्यों न हो अपनी कालीबाड़ी की स्थापना करना नहीं भूलता. बिहारी इसके ठीक उलट हैं. चाल-ढाल में अंग्रेजी ठसक लायें या न लायें, भाषा का लिंग दोष सुधारें या न सुधारें, हम से मैं पर और फिर तू-तड़ाक पर फटाफट आ जाते हैं.
बोलने का लहज़ा पहचान लिए जाने पर अगर आपने पूछ लिया कि बिहार में कहाँ से हैं तो सीधा नकार देंगे कि उनका वास्ता बिहार से है. अगर है भी तो पूरी जमात पटना से ही आयी है. उनकी बात सुनकर लगता है कि बिहार का मतलब सिर्फ पटना है.

ऐसा नहीं है कि प्रवासी बिहारियों को अपने प्रान्त से प्यार नहीं. उन्हें प्रान्त तो प्रान्त अपने क्षेत्र की भाषा से भी भयंकर प्रेम है. कभी-कभी ऐसा लगता है कि बिहार में दंगे हुए तो वो धर्म के लिये नहीं होंगे, भाषा के लिये होंगे. भोजपुरी वाले बज़्ज़िका वाले को पीट रहे हैं. बज़्ज़िका वाले मगही वालों को हड़का रहे हैं. मगही मैथिली के सामने चौड़ी हुई जा रही है. मैथिली अंगिका पर अपने आप को थोप रही है. पर यह सारा प्रेम संस्कृति को सहेजने के वक़्त गायब हो जाता है. दिल्ली में बिहारी भोजन ढूंढें नहीं मिलता है. ग़लती से एक रेस्तरां है भी तो वह खाना कम, गोली ज़्यादा देता है.

लिट्टी चोखा स्ट्रीट फूड है. बिहारी मेनकोर्स खाना है तो किसी बिहारी से दोस्ती गाँठिये, वह भी वैसे बिहारी से जिसको बिहार का कहलाने पर गर्व हो. खोज मुश्किल है पर असंभव नहीं. हाँ, दिल्ली में पंजाब या बंगाल ढूँढना हो तो तरीका आसान है, या तो पश्चिमी दिल्ली का रुख कीजिये या फिर चितरंजन पार्क का. बिहार ढूँढना हो तो? साहब, यही तो बिहार का गुण है. शक्कर की तरह परदेस की आबो-हवा में हम घुलमिल जाते हैं. दिल्ली में हमें ढूँढना है तो दो ही जगहें मुनासिब होंगी,आम दिनों में आनंदविहार रेलवे स्टेशन और छठ के वक़्त यमुना का किनारा.

हाँ, हम बिहारी लोग छठ के वक़्त असली बिहारी हो जाते हैं. विद्यापति की तरह गड्ढे को भी गंगा मानकर सूर्य को अर्ध्य देने के लिए खड़े हो जाते हैं. यमुना तो फिर भी नदी है, प्रदूषित है तो क्या हुआ… यही हैं हम ‘प्रवासी बिहारी’ अर्थात ‘बिहारी स्लीपर सेल’. अपने-आप में इतना मगन कि जब तक ज़रूरी नहीं होता, अपनी पहचान भी छिपा लेते हैं. जब बात सर पर आ जाती है तो जो मिलता है उसी में धमाका कर देते हैं. ख़ैर, धमाका मेरे दिमाग में भी हुआ है.छठ की वज़ह से अंदर का देसीपना ख़ूब गरथैया कर रहा है. बड़ा मन कर रहा है कि छठ के घाट की मिट्टी से सामा-चकेवा बनाकर, देवउठनी के दिन चौक पुराकर उसमें प्राण फूँका जाए. पाँच दिन तक ढोल-पिपही के साथ गीत-नाद हो. पूर्णिमा को भसान हो, पर मुश्किल है. हम स्लीपर सेल लोग छठ में एक्टिव हो गये वही बहुत है. बाकी दिनों के लिये हमारी पहचान गुप्त रखी जाय.


अनुशक्ति सिंह। बीबीसी मीडिया से जुड़ी हैं। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा। सोशल मीडिया पर सक्रिय हस्तक्षेप।

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