श्वेता जया पांडे

क्या है छठ पूजा का महत्व, सदियों से क्यूँ इसे मनाया जाता है। आपने कभी सोचा है कि हमारे तमाम त्योहार हमें क्या संदेश देते हैं? क्या सिखाते हैं? आज हम छठ पूजा की बात करते हैं। क्योंकि आज सूर्य को पहला अर्घ्य दिया गया और सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य देने के साथ चार दिन तक चलने वाला छठ पर्व कुछ संदेशों के साथ हमें छोड़ जाएगा ।

पहला संदेश स्वच्छता का- पूजा से पहले घाटों, घरों और सड़कों की साफ सफाई की जाती है और बाकायदा इसके लिए गीत भी हैं – “कोपी कोपी बोलेली छठीय माई, सुनी ए सेवक लोग, हमरा घाटे दूबिया उपज गइले, मकड़ी बसेर लेली। कर जोड़ी बोले ले सेवक लोग, सुनी ए छठीय माई, रउरा घाटे दूबिया उजाड़ी देहब , चंदन छिड़िक देहब। ” साथ ही इस पूजा में चढ़ाई जाने वाली सामग्रियों को पूरे स्वच्छता से तैयार किया जाता है।

दूसरा संदेश प्रकृति पूजा- इस व्रत में सूर्य और उनकी बहन षष्ठी यानी छठ की पूजा की जाती है। संदेश ये कि प्रकृति के नज़दीक रहिए, आडंबर से दूर साथ ही इसमें मौसम के सारे फल पूजा में चढ़ाए जाते हैं यानी फल-मूल को ज़्यादा से ज़्यादा जीवन में शामिल करने का संदेश । गीत भी है “केरवा जे फरेला घवद से, ओह पर सुगा मेड़राय।

तीसरा एकता का संदेश- आपने ध्यान दिया होगा किसी मंदिर की तरह इसमें VIP गेट का कल्चर नहीं है, बल्कि एक ही नदी या पोखर के घाट पर राजा-रंक, ना जाति का बंधन ना समाज का आडंबर । श्रद्धाभाव से हर कोई अर्घ्य देने के लिए पहुंचता हैं और इस संदर्भ में भी गीत है कि राजा राम की पत्नी सीता भी आम लोगों के साथ घाट पर पैदल ही गई थीं और रास्ते में गीत गाया था “काँच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाय, होईं ना ए राम जी कहंरिया, बहंगी घाटे पहुंचाय।

चौथा संदेश बुरे वक्त में भी साथ ना छोड़ना- अमूमन हर कोई उगते सूर्य को प्रणाम करता है, लेकिन छठ इकलौता ऐसा पर्व है जहां उगते सूर्य से पहले ढलते सूर्य को प्रणाम किया जाता है ।  संदेश ये कि सच्चा साथी वो ही है जो बुरे वक्त में भी साथ दे।

पांचवा संदेश ये कि आप खुद ईश्वर के करीब जाओ- ना पंडित, ना पुजारी, पूजा करने के लिए किसी तीसरे को माध्यम बनाना ज़रूरी नहीं है। क्योंकि ये ऐसा पर्व है जिसमें किसी पुरोहित या बाबा की ज़रूरत नहीं होती, घर के सदस्य ही व्रती को अर्घ्य दिलाकर पूजा करा देते हैं।

ये छठ के लिए सजा ‘बाज़ार’ है। फोटो-रुपेश।

बेटा-बेटी की समानता का छठा संदेश – व्रती कहती है “रूनुक-झुनुक बेटी दीह, पढ़ल पंडितवा दामाद” जहां ज़्यादातर व्रत त्योहार सिर्फ बेटे की चाह में किए जाते हैं वहां इसमें बेटी की कामना इस व्रत को एक अलग ऊंचाई देती है।

सातवां और सबसे महत्वपूर्ण संदेश- समाज में महिला-पुरुष और सबकी बराबरी का संदेश… ये व्रत सभी समान रूप से करते हैं, औरत मर्द, बूढ़े बच्चे, सुहागिनें-विधवा, कुष्ठ रोगी। सबको ये व्रत करते देखा जाता है। किसी पर रोक नहीं।

आठवां जीवों पर दया का संदेश- खरना के दिन व्रती गाय को प्रसाद खिलाकर ही खुद भोजन करते हैं। संदेश में यह भी छिपा है कि सभी जीव-जंतु हमारे साथ निर्भीक होकर रहें, उनका शोषण ना हो और हम सभी ख्याल रखें।

नौवां संदेश पानी की महत्ता- इस व्रत में अर्घ्य देने से पहले व्रती घंटों पानी में खड़े होकर आराधना करते हैं। इसमें दो संदेश छुपा है, एक नदी अगर साफ सुथरी होगी तभी आप उसके पानी में घंटों बिता पाएंगे, दूसरा पानी से कई रोगों का इलाज होता है। आज जो दवाइयों पर हमारी निर्भरता बढ़ी है, पहले कई बीमारियों को महज़ पानी के ज़रिए दूर कर दिया जाता था। साथ ही सूर्य प्रकाश में खड़े रहकर विटामिन डी की कमी पूरी की जा सकती है।

दसवां संदेश शरीर के विकारों को दूर करने का- पहले दिन लौकी-चावल खाकर सादे और सुपाच्य भोजन का संदेश, दूसरे दिन गुड़ की खीर और रोटी खाकर सादगी भरा शुद्ध भोजन किया जाता है तो तीसरे दिन जब शरीर व्रत के लिए तैयार हो जाता है तो बिना पानी के व्रत कर लगभग डेढ़ दिन बिताया जाता है और कई वैद्यों और महापुरुषों ने सप्ताह में एक दिन के उपवास को शरीर के लिए उत्तम बताया है। इससे शरीर विकारों से मुक्ति पाता है और बीमारियां दूर होती हैं।

संदेश तो और भी कई छिपे हुए हैं इस लोक आस्था के महापर्व में… ज़रूरत है उन्हें समझने और उन पर अमल करने की।  जय छठी मइया।


 

श्वेता जया पांडे /  इलाहाबाद यूनिवर्सिटी की पूर्व छात्रा । इलाहाबाद से ही पत्रकारिता की शुरुआत कर आज दिल्ली में अपनी अलग पहचान बनाने में मशगुल ।

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