चरवाहा विद्यालय के सपने को कौन चर गया ?

चरवाहा विद्यालय के सपने को कौन चर गया ?

ब्रह्मानंद ठाकुर

बिहार में का विधानसभा चुनाव का ऐलान भले ही अभी नहीं हुआ है लेकिन चुनावी बयार बहने लगी है । बिहार के दिल मेें क्या है, ये कोई नहीं जानता । पिछली बार आरजेडी के साथ चुनाव लड़कर जेडीयू सत्ता पर काबिज हुई लेकिन बीच मंझधार में नीतीश कुमार ने लालू की नाव छोड़कर बीजेपी की पतवार पकड़ ली और अपना कार्यकाल पूरा किया । करीब 4 दशक बाद ये पहला मौक होगा जब लालू के बिना बिहार का चुनाव होने वाला है । लालू यादव जेल में है और वो भी चारा घोटाले में सजा काट रहे हैं । चारा घोटाले ने लालू की राजनीतिक करियर पर विराम लगा दिया तो वहीं लालू के ड्रीम प्रोजेक्ट रहे चरवाहा विद्लायल भी दम तोड़ चुका है । शायद बिहार की युवा पीढ़ी चरवाहा विद्यालय के बारे में ठीक से जानती भी ना हो । ऐसे में ये टीम बदलाव ने ये जानने की कोशिश की कि आखिर चरवाहा विद्यालय क्या था और उसके पीछे की सोच क्या थी और अगर वो एक बेहतर फैसला था तो उसने दम क्यों तोड़ दिया ।

इन तमाम सवालों के जवाब तलाश के लिए टीम बदलाव के साथी ब्रह्मानंद ठाकुर ने उन लोगों की तलाश शुरू की जो चरवाहा विद्यालय की आधारशिला के वक्त से उसे ना सिर्फ जानते हों बल्कि उसका हिस्सा भी रहे हैं । ऐसे लोगों की तलाश में हमारे सामने नाम आया सीताराम राय जी का । जो बिहार शुरुआती दिनों में खोले गए तीन चरवाहा विद्यालय में सबसे पहले मुजफ्फरपुर के तुर्क स्थित चरवाहा विद्यालय के प्रधानाध्यापक रहे हैं ।  1991 में  तिरहुत प्रमंडल में  गौरौल ( वैशाली )  तुर्की ( मुजफ्फरपुर ) और  नानपुर (सीतामढ़ी में चरवाहा विद्यालय खोला गया ।  23 जनवरी, 1991 को तुर्की में कृषि विभाग की 25 एकड़ जमीन में राज्य का पहला चरवाहा विद्यालय  मुजफ्फरपुर के तत्कालीन जिलाधिकारी के नेतृत्व में खोला गया था।  स्थापना के छ: सात साल बाद ही यह चरवाहा विद्यालय अपना अस्तित्व खो कर अतीत की सुखद याद मात्र बन कर रह गया । अब  उस जगह सामान्य उत्क्रमित मध्य विद्यालय संचालित है।  पूछने पर लोग बताते हैं  –‘ यहीं था चरवाहा विद्यालय। ‘ 

90 के दशक में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने एक नारा दिया था। भैंस, गाय, बकरी चराने वालों पढ़ना-लिखना सीखो । ‘लालू प्रसाद जब कहीं  अपना भाषण  देते  अक्सर वे यह नारा लगाना नहीं भूलते थे।  इसके पीछे उनका सपना था, शिक्षा की ज्योति उस तबके तक पहुंचाना जो अबतक शिक्षा से वंचित  हैं।  गाय, भैंस, बकरी चरा कर बिहार का एक बड़ा तबका अपना बचपन और किशोरावस्था गुजार देता है फिर ता उम्र शोषण की चक्की में पिसने को मजबूर हो जाता है । शायद  इसी सपने को साकार करने के लिए उन्होंने अपने ड्रीम प्रोजेक्ट  चरवाहा विद्यालय की परिकल्पना की थी। ऐसा कहा जाता है कि इस ड्रीम प्रोजेक्ट  के साथ तब उन्होंन पहलवान विद्यालय खोलने की बात भी अक्सर करते थे। 

 सीताराम जी तक पहुंचने में हमारी मदद की समाजसेवी कुंदन जी ने। मुजफ्फरपुर शहर के पूर्वी छोर पर एक कस्बा है, कन्हौली विष्णुदत्त (रम्भा चौक) ।  शहर के  करीब होते  हुए भी शहरी कोलाहल से दूर बहुत दूर, कच्चे-पक्के मकान । बथान में मवेशियों का झुंड,  गाय के रंभाते बछड़े, सिर उठाए बीजू आम के कुछ पेड़ और सामने लहराते, पीले-पीले फूलों से लदे तोरी के खेत। फूस की एक झोंपड़ी में  अभिनव फाउंडेशन का  एक साधारण- सा बोर्ड लगता हुआ है और यही है सीताराम जी का आशियाना ।जब मैं वहां पहुंचा तो युवा समाजसेवी पत्रकार कुंदन कुमार जिन्होंने मुझे यहां का पता दिया था, वे भी मेरे इंतजार में बैठे दिखे।  झोपड़ी  से थोड़ा हट कर दरबाजे पर  बंसखटिया पर बैठे मिल जाते हैं तुर्की चरवाहा विद्यालय  के  ( अब सेवानिवृत ) संस्थापक प्रधानाध्यापक श्री सीताराम राय जी, धोती और गंजी पहने हुए।  मेरी नजर बगल वाली झोंपडी  पर अभिनव फाउंडेशन का बोर्ड देख कर ठिठक गई और जिज्ञासा भरी नजरों से कुंदन जी की ओर देखने लगा। कुंदन मेरा आशय समझ जाते हैं। वे बताने लगते हैं, अभिनव सीताराम बाबू का इकलौता पोता था, अभिंनव अनल  उनके पुत्र अनिल कुमार अनल का लाडला। दुर्भाग्य से 12 साल की उम्र में उसकी दुखद मौत हो गई।  उसी की याद में अपने पिता सीताराम बाबू और मां की प्रेरणा से अनिल जी ने अभिनव फाउंडेशन की स्थापना 8 अक्टूबर 2018 को किया। इस संस्था में विद्यालय नहीं जाने वाले दलित और अभिवंचित वर्ग के बच्चों को नि: शुल्क शिक्षा दी जाती है। मैं  ज्यादा उस पीड़ा को  कुरेदना नहीं चाहता था, इसलिए सीधे सीताराम बाबू से सवाल करना शुरू कर दिया ‘चरवाहा विद्यालय की स्थापना कैसे और किस उद्देश्य से हुई थी और आप उससे कैसे जुडे ?’

सीताराम बाबू ने बताया कि “23 दिसम्बर 1991 को मुजफ्फरपुर के तुर्की में कृषि विभाग की 25 एकड़ जमीन में चरवाहा विद्यालय खोला गया था। तब हेमचंद सिरोही मुजफ्फरपुर के कलेक्टर और एके विश्वास तिरहुत प्रमंडल के आयुक्त थे।  तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने 15 जनवरी,1992 को एक समारोह में इसका उद्घाटन किया था। बड़ा भव्य समारोह आयोजित था। वे भी लालू जी को सुनने गये  हुए थे। तब लालू जी ने नारा दिया था- गाय, भैंस, बकरी, सूअर चराने वालों पढ़ना- लिखना सीखो। उन्होंने  यह भी कहा था कि अब जमींदारों को मालिक  कहना बंद करो।

  उन्होंने खुद को चरवाहा विद्यालय का प्रधानाध्यापक बनाए जाने की बाबत जानकारी देते  हुए बताना शुरू किया  कि  वे इस प्रखंड के तेलिया प्राथमिक विद्यालय में पदस्थापित थे।  उस दिन वे लालू जी का भाषण सुनने तुर्की सभास्थल पर गये थे। बड़ी भीड़ थी। लालू प्रसाद  घूमते हुए आए  और अधिकारियों से भोजपुरी में पूछा ‘ का हो, मास्टर मिलल की न ?  तब दबी जुबान से एक अधिकारी ने   ‘ जी’  कहते हुए  बलिराम सिंह जी का नाम बता दिया। वे चढुआ स्कूल में शिक्षक थे । लालू जी  ने  गुस्से में तब कहा था, किसी यादव शिक्षक को इस चरवाहा विद्यालय  का  प्रधानाध्यापक बनाइए। “वहां उपस्थित शिक्षा विभाग के एक अधिकारी उस सभा में  उनको देख चुके थे।  बस क्या था उनका नाम पुकारा गया । वे डर से  थरथर कांपते  हुए वहां पहुंचे। वहां डीईओ , डीएसई, डीएम और प्रखंड   शिक्षा अधिकारी समेत अन्य कई  अफसर मौजूद थे। बलिराम बाबू का नाम काट कर उनकी जगह चरवाहा विद्यालय में  बतौर प्रधानाध्यापक  उनकी  नियुक्ति  कर दी गई। इस तरह उन्हें तुर्की चरवाहा विद्यालय का पहला प्रधानाध्यापक बनने का मौका मिला।  उनके सामने ही  लालू जी ने बच्चों का पहला क्लास भोजपुरी में लिया।  मैदान में दरी बिछाई गयी। 5 से 15 साल के नंगधडंग 10-15 चरवाहे उस पर बैठे और लालू जी ने उनको ककहारा लिखना सिखाया और  उनसे ( सीता राम जी से) कहा कि ऐसे ही खूब मन से बच्चों को पढ़ाइएगा।  

 सीताराम बाबू आगे बताते हैं कि  इसके बाद तो उनकी चैन हराम हो गई। घर का खेती-पथारी सब चौपट। बच्चे छोटे थे। खेत बटाई पर लगा दिया। सुबह से देर शाम तक चरवाहा विद्यालय की व्यवस्था छात्रों के भोजन की व्यवस्था और मवेशियों के चारे का इंतजाम। 25 एकड़ के प्लाट को टुकडों में बांट कर विभिन्न मौसम का चारा उगवाना। पूरे क्षेत्र का चार-पांच चक्कर लगाना उनका रुटीन हो गया। देर शाम घर लौटते। यहां भी चैन नहीं। जीप से कभी बीडीओ आते तो कभी कोई दूसरा अफसर। सबों के सवाल का जवाब देना पड़ता।  वे बताते हैं कि कई  जिलों के डीडीसी आकर इस सम्बंध में उनसे फीडबैक  लेते थे।

सीताराम राय

 देखते देखते-चरवाहा विद्यालय में छात्र छात्राओं की संख्या बढ़ कर 400 से ऊपर पहुच गई।  इसमें अनुसूचित जाति के  138 छात्र, 111 छात्राएं तथा पिछड़ी एवं अन्य पिछड़ी जाति के 78 छात्र और 75 छात्राएं थीं। चरवाहा विद्यालय तुर्की में  नामांकित बच्चों की इस संख्या का उल्लेख तत्कालीन आयुक्त, तिरहुत प्रमंडल डाक्टर एके विश्वास ने अपने  एक आलेख ‘चरवाहा विद्यालय- एक दृष्टि में भी किया है।  इन नामांकित बच्चों के   लिए दिन के भोजन  कभी भात-दाल सब्जी कभी रोटी-सब्जी   मंगलवार और गुरुवार के दिन मीट और खीर का भी प्रबंध करना पडता था।   इस मद में अलग से आबंटन मिलता था।  इसके अतिरिक्त  उपस्थिति के आधार पर प्रतिदिन प्रति छात्र-छात्रा एक रूपये तथा 9 रूपये महीना छात्रवृति का भुगतान किया जाता था।  अनुसूचित जाति और जनजाति बाहुल्य क्षेत्र होने के कारण इन जातियों के बच्चे यहां अधिक संख्या में पढ़ने आने लगे। वे अपना-अपना मवेशी लेकर चरवाहा विद्यालय में आते। मवेशी विशाल कैम्पस (करीब 25 एकड़ में चराई करता और बच्चे पढ़ते रहते। शाम में  इसी परिसर से सभी छात्र चारा काटकर चारे का बोझ सिर पर लादे हुए  अपने-अपने घर वापस लौटते थे।

 विद्यालय में 5 शिक्षक, नेहरु युवा केन्द्र के 5 स्वयंसेवी और 5 शिक्षा अनुदेशक की तैनाती की गई थी। इस चरवाहा विद्यालय के संचालन की जवाबदेही कृषि, सिंचाई, उद्योग, पशुपालन, ग्रामीण विकास और शिक्षा विभाग को संयुक्त रूप से दी गई थी। किसी मवेशी के बीमार होने की स्थिति में पशुपालन विभाग का डाक्टर आकर उसका इलाज करता था। ग्रामीण विकास विभाग की ओर से इस चरवाहा विद्यालय में  ट्रायसम  योजना के  तहत 12 ट्रेडों , टाइपिंग, जूते बनाना, पत्ता प्लेट निर्माण , लोहारगिरी, बढ़ई गिरी, पापड़-तिलौरी  बनाने, मचिया निर्माण, टोकरी बनाने आदि का प्रशिक्षण  दिया जाता था।  यह कार्यक्रम  जनवरी 97 में किन्हीं कारणों से बंद कर दिया गया। शिक्षा अनुदेशक एवं नेहरू युवाकेन्द्र के शिक्षा स्वयंसेवकों ने भी धीरे-धीरे विद्यालय आना बंद कर दिया। बताते हैं कि विभिन्न विभागों में ठीक से समन्वय नहीं होने के कारण ऐसे कार्यक्रमों की स्थिति लगातार  बद से बदतर होती  चली गई ।  इसतरह देखें तो लालू प्रसाद के शासन काल में ही यह चरवाहा विद्यालय एक सामान्य विद्यालय में तब्दील हो गया। 

 सीताराम बाबू बताते हैं कि अपने 5 साल के  कार्यकाल के दौरान उन्हें इस चरवाहा विद्यालय के परिसर में 18 हजार शीशम के पेड़ लगवाए थे लेकिन अब वहां एक भी पेड़ नहीं है।  मछली के लिए तालाब भी खोदवाया था। फिलहाल वह तालाब जीर्णशीर्ण अवस्था में है। वे बताते हैं कि जून 1997 में एक दिन वे छात्रों की अर्धवार्षिक परीक्षा के लिए प्रश्नपत्र लाने मुजफ्फरपुर गये हुए थे। शिक्षा विभाग के  जिलास्तरीय एक अधिकारी ने उसी दिन विद्यालय का निरीक्षण किया और उन्हें बिना सूचना विद्यालय से गायब रहने के आरोप में निलंबित कर दिया। फिर उनका स्थानान्तरण जिले के सुदूर विद्यालय, चंदौली  (  बंदरा प्रखंड  में) में कर दिया गया। फिर वे विद्यालय के अन्य शिक्षक को प्रभार सौंप कर चरवाहा विद्यालय से विदा हो गये।

 फिलहाल लालू प्रसाद के ड्रीम प्रोजेक्ट चरवाहा विद्यालय का अस्तित्व अब समाप्त हो चुका है। इसकी जगह एक उत्क्रमित मध्य विद्यालय संचालित है। पूछने पर स्थानीय लोग  उंगली से इशारा करते हुए बताते हैं—-‘वहीं था चरवाहा विद्यालय।’  

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