Archives for परब-त्योहार - Page 2

परब-त्योहार

मुजफ्फरपुर के वीर सपूत जुब्बा सहनी की शहादत गाथा

ब्रह्मानंद ठाकुर " हां, वायलर को मैंने मारा,  किसी और ने नहीं।"  यही तो कहा था भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के योद्धा जुब्बा सहनी ने और मुजफ्फरपुर के मीनापुर थाने के दारोगा…
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लोकतंत्र की काग़ज़ी खूबसूरती ज़मीन पर कब उतरेगी- उर्मिलेश

पशुपति शर्मा "हिंदुस्तान जितना खूबसूरत लोकतंत्र काग़जों पर है, उतना खूबसूरत लोकतंत्र ज़मीन पर नहीं दिखता। जबकि यूरोप के कई मुल्क ऐसे हैं जहां कोई लिखित संविधान नहीं है, जहां…
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अब न रहा वो फगुआ, अब न रहे वो हुरियारे

प्रशांत पांडेय ज़िंदगी की आपा धापी में प्राथमिकताएँ बदल जाती हैं। मनुष्य समय के चक्र में फँसकर उसी के इशारे पर चलने को मजबूर हो जाता है। पिछले दो साल…
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व्यक्ति की इच्छाओं का द्वंद्व- हयवदन

संगम पांडेय अक्षरा थिएटर में लाइट्स वगैरह की कई असुविधाएँ भले हों, पर इंटीमेट स्पेस में प्रस्तुति का घनत्व अपने आप काफी बढ़ जाता है। फिर वशिष्ठ उपाध्याय की प्रस्तुति…
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समाजवाद के आदि नायक शिव के प्रेम का साझा उत्सव

ब्रह्मानन्द ठाकुर  महा शिवरात्रि यानी आदिम समाजवादी परिवार के मुखिया शिव के विवाह का दिन। हां, आदिम समाजवादी व्यवस्था मतलब जहां परस्पर दो विरोधी प्रवृतियों वाले जीव-जंतु साथ रहा करते…
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श्मशान में जीवन का संगीत और सौंदर्य

पशुपति शर्मा 20 जनवरी, 2018 की उस दोपहर, राजधानी के मंडी हाउस इलाके में 'अलग मुल्क के बाशिंदे' से मुखातिब होने का मौका मिला। संगीत नाटक अकादमी के प्रेक्षागृह में…
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संतूर वादन से झंकृत हो गए पूर्णिया के तार

डॉ शंभु लाल वर्मा 'कुशाग्र' पूर्णिया के विद्या विहार इंस्टीच्यूट ऑफ टेक्नलॉजी में स्पीक मैके की ओर से संतूर वादन की प्रस्तुति हुई। अंतरर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त अभय रुस्तम सपूरी ने…
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काव्य फूलों की तरल मुस्कान से पट गई पूर्णिया की धरती

शंभु कुशाग्र नववर्ष 2018 की पूर्व संध्या पर पुराने साल को विदाई देने और नए साल के स्वागत में पूर्णिया के साहित्यकार भारतीय लेखक मंच के बैनर तले स्थानीय जिला…
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बहू अंजलि ग्रेजुएट हो गई!

मिथिलेश कुमार राय सवेरे जब मैं काम पर निकल रहा था, माँ बोली कि मिठाई लेते आना। कल शुक्रवार है। थान पर चढ़ाना है- पतोहू ग्रेजुएट हो गई। जरूर। यह…
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गए साल को चरण स्पर्श

नीलू अग्रवाल विदा, विदा, विदा...अलविदा। अब मिलेंगे नहीं कभी नहीं हमें है पता। हँसते हुए, फिर भी देते हैं विदा। तुम जाओ यही नियति है। वह आएगा कुनकुनाता, गुनगुनाता चुलबुलाता…
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