Archives for परब-त्योहार

परब-त्योहार

विंध्य की पहाड़ियों में आस्था और पर्यटन का अद्भुत संगम

पुरु शर्मा विंध्याचल पर्वत श्रृंखलाओं की रमणीय वादियों की गोद में बसा अलौकिक शक्ति और आस्था का केंद्र करीला धाम। कंकरीट के जंगल और शहर के कोलाहल से दूर, शांतिमय…
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‘संक्राति काल’ में कवि नेमि गाते हैं!

नटरंग प्रतिष्ठान की ओर से तीन दिवसीय नेमि शती कार्यक्रम का दिल्ली में आयोजन। सत्येंद्र कुमार यादव अपनी शर्तों पर चलना आसान नहीं होता। सामाजिक मान्यताओं, धारणाओं को तोड़ना सबके…
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रिवायत- राजधानी में लोक-उत्सव की ‘सर्जिकल स्ट्राइक’

पशुपति शर्मा रिवायत लोक उत्सव की आयोजक बिंदु चेरुंगथ। आप सपने देखें तो वो सच भी होते हैं। इसी विश्वास के साथ दिल्ली में लोक कलाओं के अपने पहले उत्सव…
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शादी-विवाह में मैथिल संस्कृति की झलक

अरविंद दास वर्षों पहले किसी पत्रिका में एक लेख पढ़ा था- शादी हो तो मिथिला में। जाहिर है, इस लेख में जानकी और पुरुषोत्तम राम की शादी की चर्चा के…
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विएना ओपेरा हाउस की वो शाम

सच्चिदानंद जोशी के फेसबुक वॉल से साभार हमारे रंगकर्म के गुरु प्रभात दा गांगुली जब मूड में होते थे तो वो अपने विदेश में हुए प्रदर्शनों के किस्से सुनाते थे।…
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‘अच्छे दिन’ वाली सरकार का 5 साल बाद ‘साफ नीयत’ का रोना

राकेश कायस्थ चुनावी नारा राजनीतिक दलों के लिए एक भावनात्मक चीज़ भी होता है। नारा यानी वह सबसे अहम बात जिसे आप दिल की गहराई से महसूस करते हैं, इसलिए…
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बावरवस्ती की महिलाओं के साथ वूमन्स डे की यादें

शिरीष खरे शुक्रवार की तारीख क्यों खास थी यह मुझे पता भी न थी, लेकिन अब यह तारीख फिर भूल जाऊं तो भी इस तारीख से जुड़ी यह घटना मुझे…
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जंजीरों में जकड़े ‘समाजवाद’ की जीत की कहानी

ब्रह्मानंद ठाकुर जार्ज फर्नान्डिस एक ऐसा नाम जो 60-70 के दशक में मजदूरों की बुलंद आवाज बनकर उभरा और देखते ही देखते हिंदुस्तान के सियासी पटल पर अपनी अमित छाप…
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ये कोई रियलिटी शो नहीं, संघीय ढांचे का प्रतीक है !

राकेश कायस्थ राजपथ की पूरी महफिल इस बार अकेले बापू ने लूट ली। अरुणाचल से लेकर गोवा तक शायद कोई ऐसा राज्य हो, जिसकी झांकी में बापू दिखाई ना दिये…
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गणतंत्र बड़ा हुआ, लेकिन हमारी सोच छोटी

ब्रह्मानंद ठाकुर आजादी के 5 साल बाद और भारत को गणतंत्र घोषित होने के दो साल बाद 1952 में मेरा जन्म हुआ। सात साल की उम्र में गांव के बेसिक…
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