Archives for चौपाल - Page 2

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सांप्रदायिकता सरकार का सबसे बड़ा अस्त्र है- प्रेमचंद

डा. सुधांशु कुमार कथा-सम्राट प्रेमचंद। हिंदी कथा साहित्य को 'तिलस्म' और 'ऐय्यारी' के खंडहर व अंधेरी गुफा से निकालकर जनसामान्य के दुख-दर्द और यथार्थ से जोड़ने वाले कथासम्राट प्रेमचंद आज…
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बनारस में कथानक को इम्प्रेशन में बदलता ‘मैकबेथ’

संगम पांडेय व्योमेश शुक्ल की नई प्रस्तुति ‘बरनम वन’ का कलेवर मैकबेथ की तमाम होती रही प्रस्तुतियों में काफी मौलिक और नया है। यह खाली-मंच पर पश्चिमी ऑपेरा की मानिंद…
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वीरेन नंदा की किस्सागोई पार्ट-6

सांकेतिक चित्र वीरेन नंदा किस्सागोई के पिछले अंक में आपने पढ़ा कि किस तरह कवि- कहानीकार दोस्तों ने भिक्षा प्रकाशन के लिए एक लाख रुपये का इंतजाम किया और ये…
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ग्रामीण चेतना के महाकवि रामइकबाल सिंह ‘राकेश’

डा. सुधांशु कुमार अवसानोन्मुख छायावाद के साहित्याकाश में मानववाद एवं ग्राम्य चेतना के महाकवि रामइकबाल सिंह 'राकेश' का उदय हिंदी कविता के लिए एक नवीन दृष्टिकोण का सबब बना ।…
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वीरेन नंदा के किस्से पार्ट-3

सांकेतिक चित्र वीरेन नंदा किस्सागोई के पिछले अंक में आपने पढ़ा कि कैसे दो दोस्त, जो साहित्यकार भी हैं, घर से रिक्शे पर सवार होकर बाजार निकले और उनका हर…
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कबीर की परंपरा के कवि नागार्जुन

ब्रह्मानंद ठाकुर अक्खड़पन और खड़ी-खड़ी कहने की परम्परा में बाबा नागार्जुन कबीर के काफी करीब पड़ते हैं। किसी को बुरा लगे या भला, उनको जो सही लगा, बिना किसी लाग-…
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मोदी पर नई किताब “ग्लोबल लीडर” और राष्ट्र की उम्मीदें

गुजरात के राज्यपाल ओम प्रकाश कोहली को किताब भेंट करते हुए राधे कृष्ण और हरिगोविंद विश्वकर्मा । जम्मू-कश्मीर में बीजेपी और पीडीपी के रास्ते अलग हो गए हैं । अब…
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शिक्षा तंत्र के श्राद्ध कर्म के बीच नारद कमीशन

ब्रह्मानंद ठाकुर जिन लोगों ने श्रीलाल शुक्ल का राग दरबारी पढा है, उन्हें नारद कमीशन भी पढना चाहिए। राग दरबारी जहां स्वातंत्रोत्तर भारत के  तत्कालीन सामाजिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक…
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हिक्की, हरीश चंद्र मुखर्जी और कोलकाता की पत्रकारिता

पुष्यमित्र इस साल पत्रकार और मित्र विनय तरुण की याद में आयोजित समारोह में भाग लेने के लिए हमलोग 24 जून को कोलकाता में जुट रहे हैं। विषय है, ‘अतिवाद के दौर…
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अतिवादों के दौर का जनक है पूजीवादी अर्थतंत्र-ब्रह्मानंद ठाकुर

ब्रह्मानंद ठाकुर विनय तरुण स्मृति व्याख्यान 2018 का विषय है- अतिवादों के दौर में पत्रकारिता और गांधीवाद। मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि साहित्य, कला, संस्कृति, नीति-नैतिकता, चिंतन और…
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