Archives for मेरा गांव, मेरा देश - Page 58

मेरा गांव, मेरा देश

आखिर एक पत्रकार किस्से कहानियाँ क्यों लिखने लगा?

पुष्यमित्र विश्व पुस्तक मेले की शुरुआत हो चुकी है, पहली दफा मेरी कोई किताब बिकने के लिये किसी बुक स्टॉल पर है। वैसे तो यह उन लाखों किताबों में महज…
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माटी की खुशबू

आदमी को आदमी बनाने के लिए आंखों वाला पानी चाहिए

चंदन शर्मा हम कैसा समाज बनाना चाहते हैं? जहां प्‍यार के लिए कोई जगह नहीं हो, जहां बस नफरत और हिंसा का पाठ पढ़ाया जाए। हम किसी प्रेमी जोड़े को…
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मेरा गांव, मेरा देश

मुलायम-अखिलेश की मुलाकात का ‘घोषणा पत्र’

टीम बदलाव मंगलवार का दिन समाजवादी परिवार में दंगल में मंगल लेकर आया क्योंकि कई दिन बात मुलायम और अखिलेश के बीच मुलाकात हुई । मुलायम सिंह से उनके घर…
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मेरा गांव, मेरा देश

नये साल पर अजीजों की आवाज़ सुनने को जी चाहता है

अखिलेश्वर पांडेय नये साल पर मुझे कई बधाई संदेश मिले, मैंने भी कई लोगों को 'हैप्पी न्यू इयर' का मैसेज भेजा। स्मार्टफोन आने के बाद किसी भी खास अवसर पर शुभकामनाएं…
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मेरा गांव, मेरा देश

समाजवादी पार्टी में सुलह का फॉर्मूला तैयार !

समाजवादी घराने में पिछले 24 घंटे से चल रहा घमासान खत्म हो रहा है । मुलायम सिंह यादव के आदेश के बाद अखिलेश और रामगोपाल का निलंबन वापस ले लिया…
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चौपाल

पुराने तैमूर पर नया ‘उन्माद’ कहीं ज़्यादा ख़तरनाक है!

कुमार सर्वेश मुझे आज सोशल मीडिया तैमूर लंग से ज्यादा खतरनाक लगता है। तैमूर तो अपने पेशे से खूंखार था। सोशल मीडिया पर तो कई बार एक तबके की सोच…
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एमपी/छत्तीसगढ़

गांवों में छत्तीसगढ़ी फिल्मों का संसार

फिल्म 'प्रेम के बंधना' की टीम बरुण के सखाजी सीमित संसाधन, प्रचुर व्यावसायिकता के अभाव के बावजूद व्यापक दर्शक वर्ग से बात करता छत्तीसगढ़ी फिल्मों का संसार जितना क्षमतावान है…
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बिहार/झारखंड

पटना में प्रकाशोत्सव की रौनक

पुष्यमित्र पटना साहिब दुल्हन की तरह सजाया जा रहा है । हर तरफ प्रकाशोत्सव की तैयारियां चल रही हैं । आखिर गुरु गोविंद सिंह की 350वीं वर्षगांठ जो है ।…
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बिहार/झारखंड

8 घंटे की नौकरी और पगार महज 42 रुपये

ब्रह्मानंद ठाकुर मुंशी प्रेमचंद की कहानी सद्गति का किरदार घासीराम हो या फिर रामवृक्ष बेनीपुरी के ‘कहीं धूप कहीं छाया’ का 'बाबू साहेब’ दोनों तत्कालानी सामंतवादी सोच के वाहक थे…
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मेरा गांव, मेरा देश

चलो देखें फिल्में और याद करें उनकी कुर्बानी

देश की आजादी के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने वाले ऐसे कई बलिदानी हैं जो आज भी गुमनामी की जंजीरों में कैद हैं। अवाम के सिनेमा ने यह तय किया है…
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