Archives for मेरा गांव, मेरा देश

मेरा गांव, मेरा देश

जलकर बढ़ने की सीख देने वाले राष्ट्रीय चेतना के प्रखर कवि दिनकर 

संजय पंकज राष्ट्रीय चेतना के प्रखर और ओजस्वी कवि रामधारी सिंह दिनकर सामाजिक दायित्व और वैश्विक बोध के भी बड़े प्रभावशाली कवि थे । एक तरफ उनकी कविताएँ शौर्य और…
और पढ़ें »
मेरा गांव, मेरा देश

बदलाव पाठशाला: हम चलते रहे, कारवां बनता गया

शिक्षापथ पर बढ़ते बदलाव के कदम ब्रह्मानंद ठाकुर आगामी 2 अक्टूबर को बदलाव पाठशाला  का एक साल पूरा हो जाएगा।  6 साल से 13 साल तक के 8 बच्चों के…
और पढ़ें »
मेरा गांव, मेरा देश

मजदूरी को मजबूर बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री का परिवार

पुष्यमित्र के फेसबुक वॉल से साभार पूर्णिया शहर के मधुबनी बाजार की ये तस्वीर वैसी ही है जैसी किसी भी शहर में काम की तलाश खड़े रहने वाले मजदूरों की…
और पढ़ें »
मेरा गांव, मेरा देश

मौसम का बदलता मिजाज और सियासत का चढ़ता पारा

संजय पकंज मौसम बदल रहा है। वातावरण में सर्दी उतरने के लिए उसाँसें भर रही है । बहुत धीमी चाल से आता है नया मौसम। सर्दी बड़ी नजाकत से दबे…
और पढ़ें »
आईना

समान शिक्षा ही समाज में समानता का बेहतर विकल्प

शिरीष खरे ‘स्कूल चले हम’ कहते वक्त अलग-अलग स्कूलों में पल रही गैरबराबरी पर हमारा ध्यान ही नहीं जाता। एक ओर जहां क, ख, ग लिखने के लिए ब्लैकबोर्ड तक…
और पढ़ें »
गांव के नायक

एसी वाले ‘बाबाओं’ की क्रांति और घोंचू भाई का मंत्र

ब्रह्मानंद ठाकुर फोटो- अजय कुमार, कोशी विप्लव जी इन दिनों गांव आए हुए है। इनका मूल नाम समरेन्द्र कुमार है लेकिन महानगर में जाकर जब लेखकीय पेशा अपना लिए तब…
और पढ़ें »
चौपाल

अखबार के जरिए यथार्थ से जुड़ना, एक मुगालता- आलोक श्रीवास्तव

पशुपति शर्मा पत्रकारिता में वैश्वीकरण के बाद एक नया बदलाव आया है। वो समाज के बड़े मुद्दों पर बात नहीं करती, समाज सापेक्ष न हो कर वो सिविक समस्याओं पर…
और पढ़ें »
गांव के रंग

आलोक श्रीवास्तव की दो कविताएं

एक दिन आएगा एक दिन आएगा जब तुम जिस भी रास्ते से गुजरोगी वहीं सबसे पहले खिलेंगे फूल तुम जिन भी झरनों को छुओगी सबसे मीठा होगा उनका पानी जिन…
और पढ़ें »
मेरा गांव, मेरा देश

गाजियाबाद में आलोक श्रीवास्तव से खुली बात आज

मुसाफिर हूं यारो के तहत बदलाव ने वरिष्ठ पत्रकारों और सृजनशील लोगों से बातचीत का एक सिलसिला शुरू किया है। इस कड़ी में आज आप सभी से रूबरू होंगे वरिष्ठ…
और पढ़ें »
चौपाल

हिन्दी की चिंता ऊपर से नहीं, नीचे से कीजिए

फाइल चित्र ब्रह्मानंद ठाकुर हिंदी दिवस से एक दिन पहले मैंने पूरा दिन 11-4 बजे तक एक उच्च विद्यालय में बिताया। हिन्दी की तीन कक्षाएं लीं। विद्यालय के प्रधान मुझे…
और पढ़ें »