Archives for गांव के रंग - Page 6

फिरंगी लुट गयो रे हाथुस के बाज़ार में

धीरेंद्र पुंढीर लोकगीतों का सिलसिला अनंत है। देश के हर हिस्से में अंग्रेजों को मार भगाने की ललक उनके लोकगीतों में दिखती है। लोकाचार में दिखाई देती है। लेकिन जिन…
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नटुआ… ‘सरकारी नाच’ पर मत करिहो सवाल

कलाकार जब सवाल पूछते हैं तो कईयों को तकलीफ़ हो जाती है। फोटो- गांव जवार संस्‍कृति समाज का निर्माण करती है और कलाएं संस्‍कृति व समाज का संरक्षण। इसे ताक…
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पगला नथुनिया… तेरा बऊआ आया गांव रे!

  बदलाव के बयार में कहीं टूट ना जाएं संवेदनाओं के तार। तब ये ट्रेन कहां थी गांव जाने के लिए। रामेश्वर घाट पर मिनी बसें छोड़ जातीं और फिर…
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ट्रिंग-ट्रिंग… चल पड़ी है बेटी मेरे गांव की

बिहार में साइकिल ने बदली बेटियों की ज़िंदगी। फोटो स्रोत बिहार में इन दिनों सड़कों पर आशाएं और उम्मीदें साइकिल पर सवार दिखती हैं। जिधर देखिए उधर टिन-टिन घंटी बजाते…
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