Archives for गांव के रंग

गांव के रंग

‘आप लोग जैसी हिंदी बोलते हैं उसमें बहुत दोष है’

आज से करीब 30-35 साल पहले की बात है । मैं एक स्कूल में बतौर शिक्षक कार्यरत था ।  घर से 12 किलोमीटर  की दूरी साइकिल से तय करने के बाद…
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रचना प्रक्रिया का ‘अधूरा साक्षात्कार’

पशुपति शर्मा बंसी कौल, रंग निर्देशक 23 जुलाई को ग्रेटर नोएडा में बंसी दा से एक और मुलाकात। कमरे में बिस्तर पर लेटी माताजी और बाहर सोफे पर बैठे बेचैन…
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हक लिए आपको लड़ना ही होगा

पुष्यमित्र पारिवारिक वजहों से लगभग आधा अगस्त महीना सहरसा आते-जाते गुजरा। इस दौरान मैने महसूस किया कि सड़क मार्ग से सहरसा से मधेपुरा जाने में ठीक-ठाक हिम्मती लोग भी घबरा…
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अपने ही गांव में आज हम अजनबी बन गए

धीरेंद्र पुंडीर अपने ही मकान में हम अजनबी या अजनबी मकान में हम कुछ भी कह पाना मुश्किल है। अकेले देवता किसकी सलामती की दुआ मांगे वो खामोश पत्थरों में…
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गांव के रंग

भारत की समकालीन राजनीति और अविश्वसनीयता का ताना-बाना !

वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश के फेसबुक वॉल से कभी-कभी भारतीय राजनीति और उस पर अपने नियमित लेखन से मन उचटने लगता है! वैसे ही जैसे ज्यादातर न्यूज चैनलों और क्रिकेट से…
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क्या उम्मीदवार बदलने से छत्तीसगढ़ का किला फतह कर पाएगी बीजेपी ?

दिवाकर मुक्तिबोध छत्तीसगढ़ लोकसभा चुनाव भाजपा में अप्रत्याशित रूप से चेहरे बदल दिए हैं। यह तो उम्मीद की जा रही थी कि 11 लोकसभा सीटों में से दस पर काबिज…
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राजतंत्र की विलासता और लोकतंत्र के रखवालों का राजशाही ठाट-बाट

  ब्रह्मानंद ठाकुर राजतंत्र में राजा-महाराजाओं के शान शौकत वाली जिंदगी और उनके विचित्र शौक की अनेक कहानियां इतिहास के पन्नों में बिखरी पडीं हैं। कहने के लिए राजतंत्र के…
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एक जिंदादिल इंसान के सपनों का ‘अक्षय’ सफर

अक्षय विनोद के फेसबुक वॉल से साभार हर किसी का एक सपना होता है, हर कोई अपने मनमुताबिक जीने की तमन्ना रखता है, लेकिन कुछ लोग वक्त और हालात से…
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नदी का किनारा और सुबह का सौंदर्य

पुरु शर्मा सुबह घूमना मुझे हमेशा से ही सुहाता रहा है। प्रकाश के आभाव में जब अंधकार का साम्राज्य बढ़ता है तब उम्मीद की रौशनी लेकर निकलता है सूरज। सूर्य…
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भुजइन के भार के बहाने किस्सा गांव का

रज़िया अंसारी  गांव के लहलहाते हरे भरे खेत, खेतों में सरसों के पीले-पीले फूल, कुएं पर पानी भरती गांव की औरतें, जंगल से लकड़ियों का बोझा सर पर ढोकर लाती…
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