Archives for आईना

आईना

कविता मायूस, गीत उदास… गुबार देखते रहो

पीयूष बबेले कफन बढ़ा, तो किस लिए, नजर तू डबडबा गई कल शाम बाती का 50 साल पुराना शिकवा दूर हो गया। वो मचल कर कहती थी, दिया तो झूमे…
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हैरी पॉटर से कहीं ज्यादा पॉपुलर रहा खत्री का उपन्यास चंद्रकांता

वीरेन नंदा बात 1963 की है, तब मैं नौ साल का था और एक फ़िल्म मुजफ्फरपुर के चित्रा टॉकीज में  लगी थी, राज कपूर की संगम। हमउम्र दोस्तों को घर…
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चंपारण सत्याग्रह के सौ बरस- गांधी के संकल्प का एक और पाठ

पशुपति शर्मा कोलकाता में विनय तरुण स्मृति कार्यक्रम हो रहा है। कार्यक्रम के दूसरे सत्र 'अपनी हांडी अपनी आंच' सत्र में पुष्यमित्र की पुस्तक चंपारण 1917 पर परिचर्चा रखी गई…
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क्योंकि मैं सड़क हूं!

मैं सड़क हूं, मेरे यहां आपका स्वागत है, लेकिन WALK AT YOUR OWN ! अरे, अरे, घबराइए नहीं, मेरा मतलब तो सीधा सा बस ये है कि चलिये मगर सावधानी…
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दलितों का रोजमर्रा का संघर्ष -“लाइफ ऑफ एन आउटकास्ट ”

चित्रा अग्रवाल फिल्म लाइफ ऑफ एन आउटकास्ट का दृश्य मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई करने वाले अच्छे से जानते हैं कि सिनेमा बस मनोरंजन नहीं बल्कि अपनी बात को जनमानस तक…
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छुट्टियों में घर गया तो समेट लाया कुछ प्यारी यादें

सुबोध कांत सिंह मंजिल यूं ही नहीं मिलती राही को जुनून सा दिल में जगाना पड़ता है पूछा चिड़िया को की घोंसला कैसे बनता है वो बोली तिनका तिनका उठाना…
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पाठकों को मिलेगा ‘नारद कमीशन’ का आनंद

डा.सुधांशु कुमार ... बात यदि मानवों तक की रहती तो एक बात थी किंतु यहां तो 'छिच्छकों' का अति पेचीदा मामला था। देखने- सुनने में मनुष्य के आकार-प्रकार की तरह…
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रंगकर्म की दुनिया, निजी ज़िंदगी और स्त्री पात्र

अनिल तिवारी वरिष्ठ रंगकर्मी अनिल तिवारी अपने रंगकर्म के 50 बरस के अनुभवों को फेसबुक पर साझा कर रहे हैं। हम इस सीरीज को बदलाव के पाठकों के साथ साझा…
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दुलहिन तनी लम जा

डॉ. प्रीता प्रिया गर्मियों की शादी के मौसम में एक अजीब सा खालीपन होता है, एक उदासी सी होती है, एक खलिश होती है मानो मौसम बोझिल सा उदास सा…
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