पशुपति शर्मा

घर के दरवाजे पर हाथ में अखबार लिए बड़ी तल्लीनता से खबरों से बावस्ता मेरे फूफाजी। तस्वीर बुआ के बारहवीं का कार्यक्रम संपन्न होने के बाद अलसुबह की है। बुआ और फूफाजी की जोड़ी कमाल की थी। बुआ दुनियावी मायाजाल में जितने गहरे तक धंसी थीं, मेरे फूफा तमाम संवेदनाओं के बावजूद संतों सा स्वभाव अख्तियार कर चुके हैं। आज से नहीं कई बरसों से।

बुआ का निधन बिहारीगंज से करीब दो-ढाई हजार किलोमीटर दूर हैदराबाद में हुआ। आखिरी दिनों में फूफा बिहारीगंज थे और बुआ वहां अस्पताल में। कहते हैं, आखिरी पलों में दोनों ने एक-दूसरे के करीब होने की लाख आरजू की, लेकिन ये मुमकिन न हुआ। करीब 90 साल के फूफाजी को उम्र की वजह से वहां ले जा पाना संभव न हो पाया और बुआ तो डॉक्टरों के हवाले थीं। ज़िंदगी भर रिश्तेदारों से घिरी रहने वाली बुआ की जब सांसें टूटीं तो गिनती के लोग ही मौजूद थे। तमाम रिश्तेदार बस इन पलों को कोसते रहे।

सभी रिश्तेदारों ने अपनी ये कसक बुआ के आखिरी कार्यक्रम में शरीक होकर मिटाई। भरा-पूरा कुनबा मधेपुरा जिले के बिहारीगंज में आ जुटा। वो घर जो बुआ के हुक्मों से गूंजा करता था, उनकी गर्मजोशी से ऊर्जावान रहा करता था, उनकी आत्मीयता से आप्लावित रहा करता था, वो उनकी गैर-मौजूदगी में कैसा होगा, ये तो बस उन गिने-चुने लोगों को ज्यादा महसूस होगा, जो रिश्तेदारों की इस भीड़ के छंटने के बाद यहां अकेले रह गए हैं।

मेरे पिता को भी बिहारीगंज का ये सन्नाटा खलेगा। तीन भाई-बहनों में अब पापा अकेले बचे हैं। पापा के छोटे भाई यानी मेरे चाचा के जाने के बाद से एक कोना सूना था, अब बड़ी बहन- जिसे बाई-बाई कहकर पापा सारा किस्सा सुना जाते थे, वो भी नहीं रही। पापा और बुआ जब एक साथ बैठ जाते तो तमाम लोग रस्क खाया करते। बस भाई-बहन एक हो गये, अब किसकी मजाल जो कुछ बोले।

सबसे ज्यादा अकेलापन शायद फूफाजी ही महसूस करेंगे। गिने-चुने संवादों के बावजूद बुआ को हर पल महसूस करने की ‘मौन साधना’ में व्यव्धान जो पड़ गया है। जब घर से निकलने लगा तो फूफाजी से गले मिलकर बोला- ‘चलता हूं।’ उन्होंने बांथें घाल ली- ”मैं तो नहीं कहूंगा जाने को।” दोनों आंखों में आंसू थे। चल पड़ा।

बुजुर्गों को महसूस करने के लिए हमें थोड़ा वक्त निकालना होगा। उनके साथ वक़्त गुजारना होगा। उनके साथ प्यार से दो बातें करनी होंगी। अगर वो मौन रहें तो भी उनके मौन में खुद को डुबोना होगा। बिहारीगंज से लौट कर ये शब्द न भी लिखता तो काम चल जाता, लेकिन फूफाजी के मन को समझने की बेचैनी और इस उम्र के तमाम बुजुर्गों के साथ युवा रिश्तेदारों से थोड़ी और संवेदनशीलता बरतने की ख्वाहिश के मारे ही ये सब लिख गया।

बुआ को नमन। सभी बुजुर्गों को प्रणाम।


india tv 2पशुपति शर्मा ।बिहार के पूर्णिया जिले के निवासी हैं। नवोदय विद्यालय से स्कूली शिक्षा। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से संचार की पढ़ाई। जेएनयू दिल्ली से हिंदी में एमए और एमफिल। पिछले डेढ़ दशक से पत्रकारिता में सक्रिय। उनसे 8826972867 पर संपर्क किया जा सकता है।

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