ब्रह्मानन्द ठाकुर

त्रिपुरा में बीजेपी की जीत का जश्न

भारत के पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा में  वामपंथ का गढ़ ध्वस्त हो गया। बंगाल में सत्ता हाथ से खिसकने के बाद त्रिपुरा ही वामपंथ का गढ माना जाता था। यहां वाम मोर्चा  पिछले 25  सालों से सत्ता मे  था। इस  बार यह भी  हाथ से निकल गया। अब  लेफ्ट केवल केरल में ही सिमट कर रह गया है। आखिर क्यों वामपंथ को यह दुर्दिन देखना पड़ रहे हैं।

इस बात से तो कतई इन्कार नहीं किया जा सकता कि राष्ट्रीय नवजागरण आंदोलन के दौरान हमारे स्वतंत्रता सेनानियों, मनीषियों ने आजादी के बाद देश में जिस शोषण मुक्त वर्ग विहीन समाज की स्थापना का सपना देखा था और उसके लिए यातनाएं सहीं थीं , अपनी कुर्बानी दी थी , वह आज तक पूरा नहीं हो सका है। यह काम मार्क्सवाद -लेनिनवाद के आधार पर किया जा सकता था। सोवियत रूस ने जारशाही का समूल नाश कर इसे पूरा कर दिखाया था। लेनिन और स्टालिन के नेतृत्व में वहां समाजवाद की स्थापना की जा चुकी थी। तब अपने देश में इस उद्देश्य को पूरा करने वाली कोई सही कम्युनिस्ट पार्टी नहीं थी।
हमारे राष्ट्रीय आजादी आंदोलन का नेतृत्व  बुर्जुआ पार्टी के हाथ में था। बड़े राष्ट्रीय बुर्जुआ समझौतापरस्त थे। वे अंग्रेजी साम्राज्यवाद के साथ सांठ-गांठ कर रहे थे। जबकि छोटे बुर्जुआ और पेटी बुर्जुआ क्रांतिकारी थे। वे अंग्रेजी साम्राज्यवाद के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष कर रहे थे। स्टालिन ने तब  भारतीय आजादी आंदोलन के सम्बंध में 1925  में कहा था कि  कम्युनिस्टों को चाहिए  कि वे इन पेटी और छोटे बुर्जुआ लोगों  के साथ अपनी एकता स्थापित कर समझौतावादी ताकतों को आजादी आंदोलन से अलग-थलग कर दें। लेकिन ऐसा उन्होंने नहीं किया। तथाकथित कम्युनिस्ट पार्टी ने तब  सुभाषचंद्र बोस का समर्थन नहीं किया जब समझौतापरस्त गांधीवादियों ने सुभाष बाबू  को दरकिनार कर  उन्हें कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देने को मजबूर कर दिया था। जब सुभाष बाबू पर अनुशासन भंग करने का आरोप लगाकर  उन्हें कांग्रेस से निष्कासित किया गया तब  इन तथाकथित कम्युनिस्टों ने गांधीवादियों का ही समर्थन किया था।
माणिक सरकार की सरकार क्यों गई?- लेफ्ट के लिए आत्ममंथन का वक्त।

यहां यह बताना अप्रासंगिक नहीं होगा कि चीन में भी माओ-त्से-तुंग ने राष्ट्रवादी क्रांतिकारी सनयात सेन के साथ एकता स्थापित कर वहां क्रांति की पृष्ठभूमि तैयार की थी। सुभाषचंद्र बोस ने भी रामगढ सम्मेलन  की तैयारी के दौरान कांग्रेस के अंदर के तमाम प्रगतिशील , क्रांतिकारी और साम्राज्यवाद विरोधी ताकतों से एक न्यूनतम साझा कार्यक्म बनाने का आह्वान किया था लेकिन उस समय भी समझौतावादी ताकतों ने इसकी पूरी अवहेलना कर दी। इतना ही नहीं, 1942  में जब आंदोलन चल रहा था , तब भी कम्युनिस्ट पार्टी उसमें शामिल न होकर वह अंग्रेजों के पक्ष में खडी रही। तब स्टालिन ने इनको  साम्राज्यवाद की दलाली करने  वाला कहा था।

जब आजादी मिली तो भारत-पाकिस्तान बंटवारे पर कम्युनिस्टों ने यह कहते हुए समर्थन किया था कि हिन्दू और मुस्लिम राष्ट्रीयता अलग-अलग है। यह व्याख्या सीपीआई की थी। तब से आजतक नामधारी कम्युनिस्ट ऐसे अनेक महत्वपूर्ण मौके गंवाते आए हैं, जिसके आधार पर शोषित-पीड़ित मिहनतकश आवाम की चट्टानी एकता कायम करते हुए पूंजीवाद विरोधी समाजवादी आंदोलन की जमीन तैयार की सकती थी।
कम्युनिस्टों ने कभी इन्दिरा गांधी को प्रगतिशील मानते हुए आपातकाल और बीस सूत्री कार्यक्रम का समर्थन किया था। जयप्रकाशजी के नेतृत्व में चलाए गये व्यापक छात्र-जनान्दोलन में कम्युनिस्ट पार्टियों ने भाग नहीं लिया। सीपीआई ने तो घोषित रूप से इन्दिरा गांधी का समर्थन किया था जबकि सीपीएम ने गुपचुप तरीके से उसका समर्थन किया। देखा जाए तो इसी का फायदा उठा कर तब जनसंघ ने अपनी ताकत में इजाफा किया।
त्रिपुरा विधानसभा चुनाव परिणाम आने के बाद माकपा नेता सीताराम येचुरी ने ( जैसा कि अखबारों में पढने को मिला है )  कहा है कि त्रिपुरा में भाजपा की जीत धनबल की जीत है। उन्होंने कहा है कि इस चुनाव में भाजपा ने खूब पैसे खर्च किए। यदि ऐसा कुछ है तो ये पूंजीवादी पार्टियां अपने वर्ग हित में ईमानदारी से ही तो काम कर रही हैं। अपने को वामपंथी कहने वाले दल क्या कर रहे हैं? अपनी विफलता के लिए दूसरे को दोष देना उचित नहीं है। तब का जनसंघ ही आज भाजपा है। यदि ये कम्युनिस्ट पार्टियां उसी समय स्थिति की गम्भीरता को भांप लेती, आंदोलनों में शामिल होती तो भाजपा आज इस जगह पर नहीं पहुंच पाती।
सीपीआई एम के नेताओं ने 1977  में उस जनता पार्टी के साथ गठजोड़ किया, जिसमें आरएसएस भी शामिल था और जनसंघ भी। इसी जनता पार्टी के समर्थन से 1977  में वे बंगाल में सत्ता में आए। सीपीआई एम ने भाजपा के साथ हाथ मिला कर वीपी सिंह की सरकार का समर्थन किया था। ज्योति बसु और अटल बिहारी बाजपेयी ने एक ही मंच से सभा  को सम्बोधित किया था। त्रिपुरा  विधानसभा का चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद भाजपा और उसके समर्थक लोग गदगद   हैं। उन्हें इतना तो जान ही लेना चाहिए कि चुनावों से केवल सरकारें बदलती हैं , लेकिन शोषणमूलक पूंजीवादी समाजव्यवस्था और इसका दमनकारी तंत्र नहीं बदलता।
चुनावों में सत्ताधारी पूंजीपति वर्ग अपनी जरुरत के हिसाब से सिर्फ अपने राजनैतिक मैनेजर को पुनर्नियुक्त करता है या बदलता है। यह जनता के साथ छलावा है और उसे क्रांति के रास्ते से भटकाने का प्रयास है। इसमें रुपये-पैसे , मीडिया, प्रशासन और बाहुबल की ताकत का इस्तेमाल जगजाहिर है। इसमें जनता का वास्तविक जनादेश नहीं, पूंजीपति वर्ग का जनादेश ही प्रतिबिम्बित होता आया है। कांग्रेस कई  दशकों तक सत्ता में रही है। भाजपा भी इससे पहले दो बार सत्ता में रह चुकी है।  यह उसकी तीसरी पारी है।
पश्चिम बंगाल की वाम मोर्चा सरकार के कार्यकाल में  नन्दीग्राम और सिंगूर की घटनाएं शायद लोग भूले नहीं होंगे। तो फिर क्या फर्क पड़ता है, इस या उस पार्टी की सरकार में ?  वर्गीय चेतना से लैस लोगों को शायद यह समझने में कोई परेशानी नही  होगी कि हर चुनाव में  शोषक पूंजीपति अपनी ही हिफाजत के लिए सत्ता का संचालक तय करता है। त्रिपुरा मे लेफ्टफ्रंट की पराजय पर  हाय-तौबा मचाने के बदले सही मार्क्सवादी विकल्प की जमीन तैयार करने की जरूरत है। क्या त्रिपुरा की हार के बाद टुकड़े- टुकड़े में बंटी वामपंथी पार्टियां व्यापक जनहित में अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा त्याग कर एक हो सकेंगी ?


ब्रह्मानंद ठाकुर। बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के निवासी। पेशे से शिक्षक। मई 2012 के बाद से नौकरी की बंदिशें खत्म। फिलहाल समाज, संस्कृति और साहित्य की सेवा में जुटे हैं। गांव में बदलाव को लेकर गहरी दिलचस्पी रखते हैं और युवा पीढ़ी के साथ निरंतर संवाद की जरूरत को महसूस करते हैं, उसकी संभावनाएं तलाशते हैं।

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