ब्रह्मानंद ठाकुर

बात 1965 की है। मैंने गांव के बेसिक स्कूल से सातवीं कक्षा पास कर उसी कैम्पस के सर्वोदय हाई स्कूल की 8 वीं कक्षा मे दाखिला लिया था। हालांकि बेसिक स्कूल में भी उन दिनों आठवीं की पढाई होती थी लेकिन हम साथियों को हाईस्कूल में पढने की ललक थी  जिस कारण बेसिक स्कूल से सातवीं पास करते ही हम लोगों ने हाई स्कूल का रुख  कर लिया। वहां से सातवीं पास का प्रमाणपत्र देने में हेडमास्टर साहब ने थोड़ा ना- नुकुर किया लेकिन अंत मे मान गये थे।

खैर आठवीं में नाम लिखाया। हम खुश थे। मैं शुरू से संकोची स्वभाव का था, लजालु भी कह सकते हैं। कुछ अंतर्मुखी भी था। जनवरी में मेरा वहां नामांकन हुआ और फरवरी में सरस्वती पूजा थी। हमारे हाई स्कूल  में सरस्वती पूजा के अवसर पर नाटक खेलने की परम्परा थी। हमारा गांव भी तब कला और संस्कृति के मामले में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता था। नाटक की अधिकांश सामग्री पर्दा, शामियाना बाजा वगैरह गांव में था।

बचपन से ही मैं अपने गांव में समय- समय पर नाटक  का आयोजन देखता रहा हूं। हमारे रिश्ते के दो चाचा राजेन्द्र प्रसाद ठाकुर, मौजे लाल ठाकुर  (अब दोनो दिवंगत)  की  नाटक में भूमिका इतनी बेहतर होती थी कि उन्हें दूर -दराज के गांवों, कस्बों मे बौरो बुलाया जाता था। एक डाक्टर सच्चिदानन्द शर्मा थे, जो वैशाली के फतहपुर से आकर हमारे गांव में बाद में बस गये (अब वे भी दिवंगत हो चुके हैं)  थे, वे भी नाटक खेलने मे  प्रवीण थे।

दर्शक दीर्घा में ब्रह्मानंद ठाकुर

उस दौर में दूसरी पीढी के युवकों का झुकाव बड़ी तेजी से नाटक की तरफ हुआ था। एक रामानन्द चाचा थे। हाई स्कूल की अध्यापकी उन्होंने घरेलू कारणों से छोड़ी थी। रिहर्सल कराने और मेकअप करने मेंं उनका सानी नहीं था। खैर, मैं बात कर रहा था अपने जीवन के पहले नाटक के बारे में। उस साल हमारे स्कूल में जयशंकर प्रसाद लिखित चन्द्रगुप्त नाटक का चयन किया गया था। नाटक बड़ा था, इसलिए कुछ दृश्यों को कांट-छांट कर उसे हम छात्रों के खेलने के लिए तैयार किया गया। इसमें हमारे दो शिक्षकों का विशेष योगदान था। एक संस्कृत के शिक्षक  आदरणीय पंडित  श्री चंद्रशेखर झा और दूसरे हिन्दी के अध्यापक आदरणीय श्री रत्नेश्वर प्रसाद ठाकुर का। पंडित श्रीं चंद्रशेखर झा जी पिछले साल स्वर्गवासी हो गये। रत्नेश्वरबाबू अभी जीवित हैं।

नाटक का चयन हो गया, पात्र भी चुन लिए गये। चंद्रगुप्त, चाणक्य, सिकंदर और हेलेन की भूमिका सीनियर क्लास  10 -11 वीं के क्रमश: ज्ञानेन्द्र जी, दिनेश जी ,फरमूद अहमद और रामदयाल झा जी को दी गयी। सेल्युकस की भूमिका के लिए कोई छात्र  मिल नहीं रहा था। इस पर गहन विचार विमर्श के बाद पंडित जी ने रत्नेश बाबू को मेरा नाम सुझाया। रत्नेश बाबू ने मेरे  शर्मीले और संकोची स्वभाव के कारण पंडितजी के सुझाव को खारिज कर दिया। इसकी जानकारी मुझे बाद में दूसरे साथियों से मिली थी।

पंडित जी मेरे नाम पर यह कहते हुए अड़ गये कि वह यह भूमिका करेगा और अन्य पात्रों से बेहतर करेगा। इसकी जिम्मेवारी उन्होंने अपने ऊपर ले ली और हमारे गांव के ही मेरे क्लासमेट द्वारा सेल्युकस की  लिखी हुई करीब 15 पृष्ठों की भूमिका  मुझे भेज दी और अगले दिन से ही रिहर्सल में आने  का आदेश भी दे दिया। रात में करीब 10 दिनों तक रिहर्सल चली। फिर स्टेज रिहर्सल हुई। मुझे सारी एक्टिंग बार- बार वे समझाते थे। अन्य पात्रों के साथ भी वैसा ही किया जाता था।

धीरे- धीरे मेरा संकोच दूर हुआ और हमें स्टेज शो के लिए फिट मान लिया गया। नाटक में एक  सीन था- चंद्रगुप्त के कारागार में बंद सेल्युकस और चंद्रगुप्त के वार्तालाप का। इस दृश्य को पर्दे के पीछे एक छोटे से कमरे को कारागार बना कर दिखाया गया था। दृश्य समाप्त होने और पर्दा गिरने के बाद पंडित जी ने स्टेज से इस दृश्य में सफल भूमिका के लिए मुझे एक पार्कर कलम ईनाम में दिया। बाद में मालूम हुआ कि स्कूल मे खेले गये अबतक के नाटकों मे पंडित जी ने किसी पात्र को पुरस्कृत नहीं किया था। बस इसके बाद  स्कूल में ही दो नाटकों मे मैंने मुख्य पात्र की भूमिका की। एक था नकली नेता। इसमे मेरी भूमिका नेता की थी। पहला डायलॉग था –

 नेता ( सेक्रेटरी से )– सेक्रेटरी !
 सेक्रेटरी —जी श्रीमान्
नेता — आगे का प्रोग्राम?
सेक्रेटरी — महात्माओं के नाम , सारा काम तमाम।
फिर   ‘ तमाशा ‘ नाटक खेला। यह नाटक एक पत्रकार ( सम्पादक ) और पत्र के मालिक सेठ के अन्तर्द्वन्द्व की कहानी थी। इसमें पत्रकार सुधीर की भूमिका का निर्वाह मैंने किया था। उस नाटक के एक गाने की कुछ पंक्ति याद है। एक पात्र भिखारी गाता है-
 दुनिया एक तमाशा बाबा, दुनिया एक तमाशा
कोई महल मे मौज मनाए ,पेड़ तले कोई रैन बिताए
किसी के आगे छप्पन भोजन, कोई भूखा – प्यासा
 एक हाथ सोने की थाली, एक हाथ माटी की प्याली
 एक ठोकरों में उलझा है, एक स्वर्ण का पाशा
 बाबा दुनिया एक तमाशा।
और , अंतिम नाटक उस स्कूल में 1975 में खेला, जहां मेरी पहली नियुक्ति  हुई थी। नाटक का नाम था दानवीर कर्ण। कर्ण की भूमिका मैंने की थी। आज जब सिंहावलोकन करता हूं तो अनायास मुंह से निकल पड़ता है – ‘ जाने कहां गये वो दिन !’  ग्रामीण रंगमंच आधुनिकता की भेंट जो चढ गया। हमे मनोरंजन के लिए कमरे में टीवी के ईर्द- गिर्द समेट दिया। पूंजीवाद ने हमारी गौरवपूर्ण विरासत को छिन्न-भिन्न कर मटियामेट कर दिया।

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