डा. सुधांशु कुमार

अवसानोन्मुख छायावाद के साहित्याकाश में मानववाद एवं ग्राम्य चेतना के महाकवि रामइकबाल सिंह ‘राकेश’ का उदय हिंदी कविता के लिए एक नवीन दृष्टिकोण का सबब बना । हिंदी साहित्य में उनकी उपस्थिति ऐसे समय में दर्ज  हुई, जब छायावाद ढलान पर था,  व्यक्तिनिष्ठता एवं प्रकृति के आवरण को हटाकर जनसरोकार से जुड़ने के लिए हिंदी कविता व्याकुल थी । प्रगतिवादी मार्तण्ड की लालिमा छायावादी क्षितिज पर दस्तक देने की तैयारी कर रही थी । सत्तर साल के प्रयोगों के बाद मरणासन्न मार्क्सवादी विचारधारा कविता की लकुटी के सहारे पुनः उठने की पुरजोर कोशिश कर रही थी । श्रमिकों, मजदूरों, वंचितों, शोषितों आदि की बात करते-करते साम्यवाद चकमक पूंजीवाद की आत्मा में घुसने के बहाने ढूंढ रहा था । इन स्थितियों में रामइकबाल सिंह ‘राकेश’ ने कविता को विचारधारा विशेष के दलदल से बचाते हुए उसे मानवतावाद के स्वस्थ धरातल पर स्थापित किया ।

ललित बिंब योजना, सुगठित भाव विन्यास, ग्राम्य चेतना एवं मानवतावाद के चितेरे कवि का जन्म 14 जुलाई 1912 को हिमालय की गोद में अवस्थित मुजफ्फरपुर जिले के ‘भदई’ ग्राम में हुआ । यह गांव कलम के जादुगर महान गद्यकार रामवृक्ष बेनीपुरी के साहित्यिक व सांस्कृतिक गतिविधियों का भी केंद्र रहा है । साहित्यिक यात्रा एवं कुछ पत्र पत्रिकाओं के सेवा-समय को छोड़ दें, तो महाकवि राकेश की संपूर्ण साहित्य साधना इसी गांव की एक कुटिया में अनवरत चलती रही, जिस पर नियति ने 27 नवंबर 1994 की मध्य रात्रि को पूर्ण विराम लगा दिया । मध्यरात्रि में खुशबू बिखेरने वाले दो विशाल मौलश्री-वृक्ष के मध्य बनी यह झोपड़ी आज भी उनकी सूक्ष्म उपस्थिति का आभास कराती है जो उनकी विराट साहित्य साधना की स्मारक है ।

उन दिनों जब एक तरफ हिन्दी कविता छायावादी व्यक्तिनिष्ठता एवं प्रकृति के आवरण को हटाकर जनसरोकार से जुड़ने के लिए बेचैन थी तो दूसरी ओर प्रगतिवादी मार्तण्ड की लालिमा भी छायावादी धुंधलके को चीरकर बहुजन हिताय का राग अलापने की तैयारी कर रही थी । इन स्थितियों में छायावादी-प्रगतिवादी अतिवादिता से इतर महाकवि राकेश ने सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय की पगडंडियों से गुजरते हुए यह उदघोषणा की-

पिघल उठे यदि अंतर मेरा, उद्वेलित अनजान में।

गंगा यमुना फूट बहे तब जग के रेगिस्तान में।।

इन स्थितियों में प्रगतिवाद की एक पक्षीय जीवन दृष्टि से इतर महाकवि ‘राकेश’ ने हिन्दी कविता को मानवतावादी संवेदना व सरोकार के धरातल पर प्रतिष्ठित किया । यह हिंदी काव्य जगत में एक युगांतरकारी घटना है जिसकी घोर उपेक्षा हिंदी के आलोचकों ने की है । हालांकि कथासम्राट प्रेमचन्द इनकी जीवनदृष्टि का बड़ा सम्मान करते थे यही कारण है कि उन्होंने ‘हंस’ में मानवतावाद के इस पुरोधा को हमेशा प्रकाशित किया । इसके साथ ही विशालभारत आदि में इनकी कविताएं प्रकाशित होने लगीं तो सहज ही तत्कालीन प्रख्यात साहित्यकारों एवं आलोचकों जैसे- हजारी प्रसाद द्विवेदी, सुमित्रानन्दन पंत, बनारसी दास चतुर्वेदी, पण्डित अमरनाथ झा, पण्डित रामदहिन मिश्र, ‘निराला’, प्रेमचन्द आदि मूर्धन्य साहित्यकार इनकी ओर आकृष्ट हुए और इनकी कविताएं चर्चा के केंद्र में आ गयीं। खासकर इनके निर्माण और इनकी पहचान में ‘हंस’ की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण रही । इसी के बाद राम इकबाल सिंह पर हिन्दी के स्वच्छंद आलोचक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, प्रो. चंन्द्रबली सिंह ने भी इनके काव्य में निहित मानवतावादी राग और प्रगतिशीलता की आग  को पहचाना । मनुष्य की शक्ति और उसकी जय यात्रा में उनकी गहरी आस्था थी । अपने जीवनदर्शन में उन्होंने मानवतावाद को ही सर्वोच्च स्थान पर प्रतिष्ठित किया। उनकी दृष्टि में कोई भी विचारधारा मानवतावाद से श्रेष्ठ नहीं, क्योंकि यही वह समंदर है जहां सारी विचारधाराओं की नदियां आकर विलीन हो जाती हैं । उनका मानना है कि विश्व की जितनी भी विचारधाराएं हैं उनमें कहीं भी मानवमात्र के लिए स्थान नहीं है-

हे कार्ल मार्क्स के वरदपुत्र, हे कोतल के अरबी घोड़े,

नाहक मारे-मारे फिरते, क्यूँ स्टालिन के खाकर कोड़े।

श्लोकत्व शोक को दे न सकेगा मतवादों का विज्ञापन,

मार्क्सिज्म गलत, फासिज्म गलत, सभी इज्म चिथड़े समान।

है सिर रखने को भी न कहीं मानवपुत्रों के लिए स्थान ।।

महाकवि राम इकबाल सिंह ‘राकेश’ पहला काव्य संग्रह ‘चट्टान’ (1946) है जिसकी भूमिका में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी लिखते हैं –“इतिहास और राजनीति हमें बार-बार याद दिलाते हैं कि मनुष्य कितनी बार हारा है, थका है, रुक गया है और लोकगीत हमें बराबर आगे की ओर मुख किए हुए दुर्जय मानव की विजय यात्रा का संवाद सुनाते हैं । ‘राकेश’ जी की कविताओं में इस बात के सबूत हैं कि वे मनुष्य के इस रूप से बहुत प्रभावित हुए हैं।” इसके अलावा ‘गांडीव’ (1949) , मेघदुन्दुभि (1979) , गंधज्वार (1990) काव्य कृतियाँ इनके मानवतावादी दृष्टिकोण के साथ साथ उनके दार्शनिक एवं क्रांतिकारी विचारों को भी हमारे सामने प्रस्तुत करती हैं । उत्तर छायावाद का कवि होने के कारण इन पर छायावादी प्रभाव भी देखा जा सकता है-

मंदपवन तुलसी मंजरियों के परिमल से लदकर,

ऊपर-नीचे प्राणकोश में संजीवन देता भर ।

‘गांडीव’ की दो कविताएं ‘ईश्वर’ और ‘ओरछा के जंगल’ में मुक्तिबोध और भवानीप्रसाद मिश्र की दो कविताओं – ‘एक शून्य के प्रति’ और ‘ सतपुरा के घने जंगल’ का पूर्वाभास कराती है । इन दोनों कविताओं में अंतर्वस्तु और शैली की समानता देखी जा सकती है । ओरछा के जंगल में भ्रमण करने का अवसर ‘राकेश’ जी को तब मिला जब वे कुण्डेश्वर में पं. बनारसीदास चतुर्वेदी के अतिथि हुआ करते थे । इनके काव्यगत व्यक्तित्व से प्रभावित होकर कभी प्रभाकर माचवे ने ‘कल्पना’ नामक पत्रिका को साक्षात्कार दिया था कि-“यदि मैं ‘तारसप्तक’ का संपादक होता तो उसके एक कवि रामइकबाल सिंह राकेश भी होते।” राकेश जी अपनी कल्पना और शैली में तारसप्तक के किसी कवि से कमतर नहीं थे । कविता ‘बेतवा के किनारे’ की इन पंक्तियों से यह स्पष्ट हो जाता है –

सुन रहा हूँ बेतवा के गगनभेदी घोष,

जैसे बज रहा रण-ढोल अथवा वेग से उठकर बवंडर

घहर हर हर फूँकता जाता समुद्री शंख पूरे जोर से ।

कविता के अलावा गद्य साहित्य की भाषा और शैली भी महाकवि ‘राकेश’ की अतुलनीय है । उदाहरणतः ‘स्मृतियों के रंगचित्र'(1979) , ‘मैथिली लोकगीत’ (1942) , ‘भारतीय लोकगाथा’ (अप्रकाशित) । मैथिली लोकगीत विलुप्त हो रही ग्राम्य संस्कृति का संग्रहालय है । इसकी भूमिका में पं. अमरनाथ झा लिखते हैं कि-‘ काल इतना परिवर्तनशील है, रुचि इतनी शीघ्रता से बदलती रहती है कि कुछ ही दिनों में ग्राम्य साहित्य टीका की अपेक्षा रखता है । ‘ स्मृतियों के रंगचित्र’ में पं. अमरनाथ झा, सुमित्रानंदन पंत, पं. बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ , पं. बनारसीदास चतुर्वेदी, महापंडित राहुल सांकृत्यायन सहित तमाम प्रख्यात साहित्यकार-आलोचकों से संबंधित संस्मरण हैं । वहीं भारतीय ‘लोकगाथा’ में भारत की विभिन्न संस्कृतियों का दिग्दर्शन है । इस महान कवि साहित्यकार को इनकी 107वीं जयंती के अवसर पर नमन ।


डॉ सुधांशु कुमार- लेखक सिमुलतला आवासीय विद्यालय में अध्यापक हैं। भदई, मुजफ्फरपुर, बिहार के निवासी। मोबाइल नंबर- 7979862250 पर आप इनसे संपर्क कर सकते हैं। आपका व्यंग्यात्मक उपन्यास ‘नारद कमीशन’ प्रकाशन की अंतिम प्रक्रिया में है।