ब्रह्मानंद ठाकुर

जेएनयू की हालिया घटनाओं  से शिक्षा जगत में उबाल है।  छात्रों के आंदोलन को लेकर पक्ष-विपक्ष में विभिन्न तर्क गढ़े जा रहे हैं। कुछ लोग छात्रानाम् अध्ययन तप: की दुहाई देकर छात्रों को राजनीति करने के खिलाफ हैं तो  कुछ लोग  इस आंदोलन का समर्थन भी कर रहे हैं। आज नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 123 वीं जयंती है।  सुभाष बाबू  को भी प्रेसीडेंसी कालेज से निष्कासित कर दिया गया था। ऐसा इसलिए किया गया था क्योंकि सुभाष बाबू ने तब कालेज के एक अंग्रेज  प्राध्यापक द्वारा  कुछ भारतीय  छात्रों से दुर्व्यवहार किए जाने के कारण उक्त प्राध्यापक के विरुद्ध छात्र आंदोलन का नेतृत्व किया था। इस घटना ने सुभाषचंद्र बोस के जीवन की दिशा बदल दी।  फिर उन्होंने 19 अक्टूबर, 1929 को  लाहौर में  पंजाब छात्र सम्मेलन में अपना  जो अध्यक्षीय भाषण दिया  वह  छात्रों को राजनीति में भाग लेने के लिए प्रेरक  तो है ही, वैसे लोगों की आंखे खोलने वाला भी है जो छात्रों को राजनीति या आंदोलन करने के खिलाफ हैं। यहां प्रस्तुत है, सुभाष बाबू के उस ऐतिहासिक भाषण का एक अंश

 “मैं भारत के एक विश्व विद्यालय का निष्कासित छात्र हूं, आज लाहौर में छात्रों के बीच  वक्तव्य दे रहा हूं, यह एक विडम्बना है। दोस्तों, यदि इस वक्तव्य में मैं  अधिकांशत: राजनीति की चर्चा करता हूं तो इसके लिए मैं कोई कैफियत नहीं देना चाहता। मैं जानता हूं  कि इस देश में ऐसे लोग हैं यहां तक प्रसिद्ध व्यक्ति भी जो यह सोचते हैं कि  गुलाम कौम की कोई राजनीति नहीं होती और यह कि विशेष रूप से विद्यार्थियों को राजनीति में भाग नहीं लेना चाहिए। परंतु मेरा विचार यह है कि एक गुलाम कौम के पास राजनीति के अतिरिक्त कुछ होता ही नहीं है। एक पराधीन देश में  प्रत्येक समस्या जो आप सोंच सकते हैं, उचित प्रकार से विश्लेषित किए जाने पर मूलत: एक राजनीतिक समस्या सिद्ध होगी। जैसा कि स्व. देशबंधु चित्तरंजन दास कहा करते थे ‘जीवन एक पूर्ण इकाई है ‘ और इसलिए आप राजनीति को शिक्षा से अलग नहीं कर सकते। मानवजीवन को विभागों में नहीं बांटा जा सकता । राष्ट्रीय जीवन के सभी पहलू परस्पर सम्बंधित होते हैं और इसकी सभी समस्याएं गूंथी हुई रहती हैं। इस कारण एक गुलाम कौम की सारी बुराइयों और कमियों का कारण राजनीति यानि राजनीतिक दासता ही होगा। परिणामत: विद्यार्थी  देश की राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करने की अति महत्वपूर्ण समस्या की अनदेखी नहीं कर सकते।

 मैं यह नहीं समझता हूं कि राजनीति में भाग लेने पर विशेष पाबंदी क्यों लगाई जाये जबकि सामान्य रूप से राष्ट्रकार्य में भाग लेने पर कोई पाबंदी नहीं लगाई जाती। सारे राष्ट्रकार्य पर पाबंदी लगाने की बात तो मेरी समझ में आती है  किंतु मात्र राजनीतिक कार्य पर पाबंदी निर्रथक है। एक पराधीन देश में, यदि  समस्याएं मूलत: राजनीतिक हैं तो सारे क्रियाकलाप भी वास्तव में राजनीतिक ही हैं किसी भी स्वाधीन देश में राजनीति में भाग लेने पर पाबंदी नहीं है, इसके विपरीत विद्यार्थियों को राजनीति में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, क्योंकि विद्यार्थियों में  से ही राजनीतिक विचारक और राजनीतिज्ञ पैदा होते हैं।

 यदि भारत में छात्र राजनीति में भाग नहीं लेंगे तो हम अपने राजनीतिक कार्यकर्ता की भर्ती कहां से करेंगे और हम उन्हें प्रशिक्षित कहां करेंगे ?  इसके अतिरिक्त यह स्वीकार करना होगा कि राजनीति में भाग लेना चरित्र और पौरुष के विकास के लिए आवश्यक है। विश्वविद्यालयों को केवल किताबी कीड़े , स्वर्ण पदक विजेता और कार्यालय लिपिक पैदा नहीं करने हैं, बल्कि ऐसे चरित्रवान व्यक्ति पैदा करने हैं जो जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में  महानता को प्राप्त कर अपने देश के लिए यश अर्जित करें।

 छात्र आंदोलन का दूसरा अधिक महत्वपूर्ण पहलू भावी नागरिक को प्रशिक्षित करना है। यह प्रशिक्षण बौद्धिक और व्यावहारिक दोनों होगा। हमें छात्रों के सामने आदर्श समाज  के प्रारूप की छवि रखनी है, जिसे उन्हें अपने जीवन में चरितार्थ करने का  प्रयत्न करना चाहिए ताकि विश्वविद्यालय के बाद जीवन की बड़ी जिम्मेवारियों के लिए छात्र खुद को तैयार  कर सकें। इस कार्यक्रम में वे अपने अधिकारियों की ओर से काफी बाधा पाएंगे। अगर दुर्भाग्यवश इसमें विरोध होता है तो निर्भीक और आत्मनिर्भर होकर सोच और कार्य में भविष्य में पूर्णत: तैयार होने के सिवा छात्रों के समक्ष कोई और उपाय नहीं है।

 भावजगत में क्रांति लानी है तो हमें एक एसे आदर्श को सबके सामने पेश करना होगा जो बिजली की तरह हमें शक्ति के उन्मुख कर डाले। वह आदर्श है स्वतंत्रता। लेकिन स्वतंत्रता एक ऐसा शब्द है  जिसके विभिन्न अर्थ हैं और हमारे देश में भी, स्वतंत्रता की अवधारणा का तात्पर्य विकास की प्रक्रिया है। स्वतंत्रता से मेरा तात्पर्य है सर्वोत्मुखी स्वतंत्रता, व्यक्ति और समाज, अमीर और गरीब, नर और नारी, सभी के लिए स्वतंत्रता । इस स्वतंत्रता का तात्पर्य  मात्र राजनीतिक बंधनों से मुक्ति नहीं है वरन इसका तात्पर्य है धन का समान बंटवारा, जातिगत अवरोधों और सामाजिक असमानताओं की समाप्ति , साम्प्रदायिकता और धार्मिक असहिष्णुता का विनाश। यह आदर्श है जो कुंठित विचार वाले नर-नारियों के लिए सपना प्रतीत हो सकता है लेकिन मात्र यही आदर्श आत्मा की भूख को शांत कर सकता है।

” इस देश में ऐसे लोग हैं और कतिपय प्रख्यात और आदरणीय पुरुष हैं जो स्वतंत्रता के सिद्धांतों को पूर्णतया लागू करने के पक्ष में नहीं होंगे। हमें दुख है कि हम उन्हें  प्रसन्न नहीं कर सकते किंतु किसी भी परिस्थिति में हम सत्य , न्याय  और समानता पर आधारित आदर्श को नहीं छोड़ सकते। हम अपने रास्ते चलेंगे चाहे कोई साथ दे या न दे। हमें बंधन, अन्याय और असमानता से कोई समझौता करना नहीं है।”

 नेताजी सुभाषचंद्र बोस : जीवन और संघर्ष पुस्तिका से साभार।