‘सुशासन बाबू का फ़ैसला गांधीद्रोह से कम नहीं’

‘सुशासन बाबू का फ़ैसला गांधीद्रोह से कम नहीं’

पहली बार जिस खपरैल में गांधी का स्कूल शुरु हुआ था

ब्रह्मानंद ठाकुर

बिहार सरकार के एक फैसले को लेकर पिछले दिनों अखबारों में ‘बुनियादी विद्यालयों को खत्म करने पर तुली सरकार, शिक्षक करेंगे सत्याग्रह ।‘ की हेडिंग के साथ अखबार में ख़बर छपी तो एक विचार आया कि वाकई यह बुनियादी विद्यालयों को बचाने की चिंता है या शिक्षकों को अपनी नौकरी बचाने की। ऐसा इसलिए भी कि  महात्मागांधी की बुनियादी शिक्षा की अवधारणा को नष्ट करने की कोशिश कोई आज से तो शुरु नहीं  हुई है। ये तो बहुत पहले ही  तब शुरू हो गई थी जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने पूर्व के कार्यकाल में  गठित अनिल सदगोपाल, मदन मोहन झा समेत तीन सदस्सीय समान शिक्षा आयोग की सिफारिशों को ठंडे बस्ते में डाल दिया और बुनियादी शिक्षा बोर्ड को खत्म कर दिया था। तब तो शिक्षकों की तरफ से इसके विरोध में आवाज़ नहीं उठाई गयी । आज जब पानी सिर से ऊपर आ गया तो  इस कदर बेचैनी बढ़ गयी कि इसके विरोध में धरना, अनशन और सत्याग्रह तक की बात की जाने लगी है।

मेरी चिंता दूसरी है जो कि सम्पूर्ण शिक्षा व्यवस्था को नष्ट करने वाली सरकार की नीतियों से उत्पन्न होती है । मैं खुद बुनियादी विद्यालय का छात्र रहा हूं और वह भी बुनियादी विद्यालय के स्वर्णकाल का। बिहार में बुनियादी विद्यालयों की स्थापना आजादी से लगभग तीन दशक पहले महात्मागांधी के चम्पारण आगमन के साथ चम्पारण से शुरू हुई। महात्मा गांधी अप्रैल 1917  में चम्पारण आए थे। बुलाए तो गये थे  वे चम्पारण के किसानों को निलहे साहेब के अत्याचार से छुटकारा दिलवाने के लिए लेकिन यहां आकर उन्होंने पाया कि यहां के गांवों के बच्चों की दशा बड़ी दयनीय है। लोगों में  ज्ञान का बडा अभाव है। बच्चे मारे-मारे फिर रहे हैं। उनके मां-बाप उनसे दो-दो, तीन-तीन पैसे की मजदूरी के लिए पूरा दिन नील की खेतों में मजदूरी कराते हैं। बापू ने अपने साथियों से विचार-विमर्श के बाद सबसे पहले छ: गांवों में बच्चों की पाठशाला खोलने का निर्णय किया।  यहीं से बुनियादी शिक्षा की नींव पडी। बिहार के सभी जिलों में धड़ल्ले से बुनियादी विद्यालयों के लिए लोगों ने दान में जमीन दी। भवन निर्माण चंदे से हुआ।शिक्षक भी आए।  वक्त की जरूरत के अनुरुप छात्रों में उद्यमिता विकास और चरित्र निर्माण  की दिशा में प्रगति के पथ पर बढ चली बुनियादी शिक्षा। आज जब  पूरा देश और खास कर बिहार  महात्मागांधी के चम्पारण सत्याग्रह शताब्दी वर्ष बड़े धूमधाम से मना रहा है, ऐसे में बुनियादी विद्यालयों के संचालन का दायित्व डीएवी (निजी स्कूल संगठन) को सौपने का  जो फैसला नीतीश सरकार ने  लिया है यह किसी भी शिक्षाविद के लिए गम्भीर चिंता का कारण हो सकता है।  मैं कोई शिक्षाविद नहीं हूं लेकिन शिक्षा के प्रति संवेदनशील होने के कारण मैंने प्रख्यात गांधीवादी और शिक्षाविद डाक्टर रामजी सिंह से इस मामले में फोन पर बात की।

मेरा उनसे सवाल था- बुनियादी विद्यालयों को डीएवी के हवाले करने सम्बंधी नीतीश कुमार के फैसले को आप किस रूप में देखते हैं ?

 रामजी बाबू ने बताया कि गांधी जी को बुनियादी शिक्षा बड़ी प्यारी थी। बिहार के करीब 450  बुनियादी विद्यालयों के लिए जनता ने पर्याप्त जमीन उपलब्ध कराई थी। उद्देश्य था इन विद्यालयों के माध्यम से जन जन में शिक्षा के व्यापक प्रचार-प्रसार का। ऐसी शिक्षा जो हमे ज्ञान के साथ साथ जीवन के सभी क्षेत्रों में सक्षम बना सके। लर्निंग बाय डुइंग। कुछ करते हुए सीखो। माओत्से तुंग ने भी चीन में आधा समय पढ़ो, आधा समय काम करो की नीति लागू की थी। इससे ज्ञान के साथ-साथ उत्पादन भी बढता है। यह व्यापक राष्ट्र हित में है। गांधी इस बात को समझते थे। तभी उन्होंने बुनियादी शिक्षा पर जोर दिया था।

केन्द्र सरकार ने अपने बजट में बुनियादी शिक्षा के लिए 47  करोड का प्रावधान किया, वह भी नहीं मिला। नीतीश जी ने समान शिक्षा आयोग का गठन किया। बाद में इस आयोग की सिफारिश रद्दी की टोकरी में डाल दी । समान शिक्षा बड़ा ही लुभावना शब्द है। सरकार ने नेत्रहाट की तर्ज पर सिमुलतल्ला में एक स्कूल खोल कर समान शिक्षा के कनसेप्ट का श्राद्ध कर दिया। आज महात्मागांधी के चम्पारण सत्याग्रह शताब्दी वर्ष में बुनियादी विद्यालयों को डीएवी के हवाले करने का निर्णय एक तरह से गांधी द्रोह ही कहा जा सकता है।

रामजी बाबू की एक बड़ी चिंता इस बात को लेकर भी है कि आज बच्चों को उनकी मातृभाषा में शिक्षा दिए जाने की स्थापित परम्परा का बड़ी तेजी से ह्रास हो रहा है। वे कहते हैं ‘ मातृभाषाय मातृदुग्धाय च ‘  मातृभाषा और मां के दूध का कोई विकल्प आज तक सामने नहीं आया है। बच्चों की शिक्षा उसकी मातृभाषा में होनी चाहिए।  डीएवी जैसे शिक्षण संस्थान इस कसौटी पर खरे नहीं हो सकते। प्रख्यात शिक्षा शास्त्री मेरिया मांटेसरी को  उद्धृत करते हुए वे कहते हैं, वे शिक्षण में लर्निंग वाई डुइंग वाले सिद्धांत के जन्मदाता माने जाते हैं। उनका विश्वास काम के द्वारा सीखने पर था। बुनियादी शिक्षा का आधार भी यही है। वर्तमान शिक्षा प्रणाली के बारे में वे दुखी मन से कहते हैं, आज की शिक्षा में न जीवन है, न जीविका की गारंटी। आज की शिक्षा व्यवस्था विषमता मूलक समाज बना रही है।

जाहिर है इस विषमता मूलक समाज में हिंसा बढेगी , आतंकवाद बढेगाः जरूरत इस बात की है कि गांधी जी की  बुनियादी शिक्षा सम्बंधी शिक्षा आयोग की सिफारिशों को लागू कर बुनियादी विद्यालयों को ठीक से संचालित किया जाए और उस अनुशंसा को पूरे देश में लागू किया जाए। लेकिन ऐसा करने के बदले सरकार ने बुनायादी शिक्षा को ही नष्ट करने की ठान ली है।ऐसा करते समय सरकार ने सर गणेश दत्त और सच्चिदानन्द सिंहा जैसे महान शिक्षाविदों  के शिक्षा सम्बंधी विचारों से भी कोई सीख नहीं दी। अंत में वे कहते हैं कि सरकार ने यदि बुनियादी विद्यालयों को डीएवी के हवाले करने का निर्णय ले ही लिया है तो उसे चाहिए कि वह इन विद्यालयों की वह सारी जमीन उन दाताओं को वापस कर दे, जिन्होंने इन विद्यालयों के लिए जमीन दान किया था। नियमानुसार , ऐसा करना इस लिए भी जरूरी है कि जिस संस्था के लिए जमीन दान की जाती है, दुर्भाग्य से वह संस्था जब बंद हो जाती है तो उस जमीन पर दान दाता का अधिकार हो जाता है। सनद रहे कि इन बुनियादी विद्यालयों को कृषि योग्य जमीन बड़े पैमाने पर दान में दी गई थी।


ब्रह्मानंद ठाकुर। BADALAV.COM के अप्रैल 2017 के अतिथि संपादक। बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के निवासी। पेशे से शिक्षक। मई 2012 के बाद से नौकरी की बंदिशें खत्म। फिलहाल समाज, संस्कृति और साहित्य की सेवा में जुटे हैं। गांव में बदलाव को लेकर गहरी दिलचस्पी रखते हैं और युवा पीढ़ी के साथ निरंतर संवाद की जरूरत को महसूस करते हैं, उसकी संभावनाएं तलाशते हैं।