अरुण प्रकाश

कोरोना संकट को लेकर लॉकडाउन के चौथे दिन दिल्ली से जो तस्वीरें सामने आईं वो बेहद खौफनाक और दिल का झकझोर देने वाली थीं । हजारों की संख्या में लोग आनंद विहार बस अड्डे पहुंच गए और उसके बाद जो तस्वीरें दिखीं वो काफी हैरान करने वाली थीं । लोगों का भारी हुजूम, जिधर भी नजर घुमाइए बस जनसैलाब नजर आ रहा था । ये कोई और नहीं बल्कि दिल्ली से पलायन को मजबूर मजदूर वर्ग है । ना सोशल डिस्टेंसिंग और ना ही कर्फ्यू का कोई खौफ इन्हें तो बस सिर्फ घर का रास्ता नजर आ रहा था ।

इसमें कोई शक नहीं कि ये लोग गलती कर रहे हैं जिसका खामियाजा इनको और इनके परिवार के साथ-साथ पूरे समाज और देश को भुगतना पड़ सकता है, ये लोग भी इस बात को जानते हैं कि उनके ऐसा करने से कोरोना और फैल सकता है फिर भी लोग घर जाने की जिद पर अड़े हैं। किसी की गोद में छोटे-छोटे बच्चे हैं तो किसी के सिर पर भारी भरकम बोझा। इन सिर्फ और सिर्फ घर जाना है इस वक्त इनको दूसरा कुछ नहीं सूझ रहा तो सवाल उठता है कि क्या सरकारों पर लोगों का भरोसा नहीं। पहली बात तो ये कि लगता है लोगों को इस बात का यकीन नहीं है कि सरकार उनके रहने खाने का इंतजाम कर पाएगी  और दूसरा ये कि ये लॉकडाउन कितना लंबा चलेगा उसको लेकर लोग आशंकित  है । तीसरा सवाल ये है कि आखिर ये लोग इतनी बड़ी संख्या में घर से क्यों निकले । दो दिन तक 100-50 की संख्या में पैदल निकलने वाले लोग आखिर अचानक लॉकडाउन के तीसरे और चौथे दिन हजारों की संख्या में हो गए ।

26 तारीख को लॉक डाउन का दूसरा दिन था, सड़क पर जब कुछ लोग 200-400 या फिर हजार किमी दूर अपने घर जाने की जिद लिए पैदल ही निकल पड़े तो कुछ राज्यों की सरकारों ने रास्ते में बसों का इंतजाम किया जिससे लोगों को लगने लगा कि  अगर हम घर से निकलेंगे तो सरकार कुछ ना कुछ हमारे लिए इंतजाम करेगी ही । ऐसे में लोग कर्फ्यू की परवाह किए बिना घर से बाहर आने लगे । 27 तारीख को लॉकडाउन के तीसरे दिन यूपी, बिहार या फिर राजस्थान सरकार ने बस अड्डों पर कुछ बसों को भी भेजने का फैसला किया और यही यकीन लोगों को घरों से निकलकर गांव पहुंचने की उम्मीद जगा गया और फिर 100-50 की संख्या कब लाख में बदल गई किसी को पता भी नहीं चला । अगर पहले दिन ही सख्ती दिखाई गई होती तो शायद ये नौबत ना होती।

अब बात सरकारों पर लोगों के यकीन ना करने की, क्योंकि अगर लोगों का सरकारों पर यकीन होता तो लोग जहां हैं वहीं रुके रहते । लेकिन लोगों ने ऐसा नहीं किया । आखिर लोगों के मन में क्या चल रहा है यही जानने के लिए मैं लॉकडाउन के चौथे दिन कॉलोनी के बाहर बने उस सेंटर पर पहुंचा जहां दिल्ली सरकार ने लोगों के लिए खाने का इंतजाम कर रखा था । ये एक स्कूल था, रैन बसेरे की जगह कम पड़ने की वजह से दिल्ली सरकार ने स्कूलों में ही लोगों के खाने का इंतजाम किया हुआ है ।

जब मैं अपने साथी सतेंद्र यादव के साथ स्कूल पहुंचा तो गेट बंद था और बाहर लोगों का हुजूम लगा हुआ था । लिहाजा मैंने एक शख्स से बात करनी शुरू की । मैंने सवाल किया कि आप यहां क्यों खड़े हैं तो विजय नाम के एक शख्स ने बताया कि यहां खाना मिलेगा । विजय दिहाड़ी मजदूर हैं । ना रहने का ठिकाना है और ना खाने का । जहां काम करते वहीं खाना बनाने और खाते थे, लेकिन अब ना काम है और ना आशियाना । फैक्ट्रियां बंद पड़ी हैं, लोग सड़क पर है ।

विजय से बात का सिलसिला आगे बढ़ा तो पता चला कि वो पास में जो चौक है वहीं सड़क पर सोता है, पुलिस वाले परेशान भी करते हैं, कभी वहां से भगा भी देते हैं । किसी तरह दिन और रात काट रही है । विजय से जब मैंने पूछा खाने-पीने का क्या इंतजाम है, तो उनका जवाब सुन मैं हैरान रह गया । विजय ने बताया कि सुबह से खाना नसीब नहीं हुआ है साहब। दिल्ली सरकार के रैन बसरों में जगह नहीं, खाना खाने जाइए तो खाना भी पर्याप्त नहीं हो पाता । आज सुबह जब मैं यहां आया तो लाइन में लगा था, लेकिन जब तक मेरा नंबर आया खाना खत्म हो गया और मैं भूखा रह गया । अब देखता हूं शाम को 7 बजे खाना मिलने वाला है मिल पाता है या नहीं । जब मैंने पूछा कि खाना खत्म होने के बाद क्या दोबारा खाना नहीं मंगाया जाता तो उसने बोला सुबह तो नहीं आया था अब रात में देखता हूं क्या होता है । विजय से बातचीत चल रही रही थी तभी आसपास खड़े कुछ और लोग वहां आ गए और बोलने लगे भैया यहां कुछ लोग बड़े-बड़े बर्तन लेकर आते हैं खाना भर-भर ले जाते हैं और जब तक मेरा नंबर आता है खत्म हो जाता है ।

उस मजदूर की बात पर यकीन करना मुश्किल हो रहा था कि क्या इस मुश्किल घड़ी में भी ऐसा हो रहा है, लिहाजा गेट के आसपास खड़े लोगों पर नजर घुमाई तो देखा कि एक सज्जन कुर्ता-पायजामा और ऊपर से हॉफ जैकेट पहने खड़े थे । उनके हाथ में एक बड़ा सा थैला था शायद उसमें कुछ बर्तन खाना लेने के लिए रखा हो । अब ये साहब कौन थे ये तो पता नहीं लेकिन जब थोड़ी देर बाद खाना बंटने लगा उनके अलावा भी कई सज्जन लोग खाना लेकर गए । लेकिन मान भी लिया जाए कि अगर कुछ लोग खाना ज्यादा ले जा रहे हैं तो उसका मतलब है कि फेंकने के लिए तो नहीं ले जा रहे होंगे । हो सकता है इनके पास घर में खाने के लिए अभी हो, लेकिन वो चाह रहे हों कि जब तक सरकार दे रही है तब तक खाना यहां से ले चलो क्या पता लॉकडाउन कब तक चले और बात में सरकार खाना भी खिला पाए या नहीं ऐसी हालत में जो घर में है उसे सुरक्षित रखो ।मैं यहां किसी की बुराई नहीं कर रहा, लेकिन ऐसे लोगों को अभी उन गरीबों के बारे सोचना चाहिए जिनको एक वक्त का भी खाना नसीब नहीं हो रहा ।

हालांकि दिल्ली सरकार से मयूर विहार फेस 3 में गर्ल्स ब्वॉयज सिनियर सेकेंट्री स्कूल में बने इस सेंटर (रेड फोक होटल के बगल में सेंटर है) पर जो लोग खाना लेने के लिए लाइन में खड़े थे उनको सोशल डिस्टेंसिंग की बिल्कुल परवाह नहीं थी और ना ही वहां मौजूद गार्ड या फिर पुलिसवालों को । हालांकि पुलिसवाला बार-बार लोगों से अपील कर रहा था कि सामाजिक दूरी बनाकर रखिए, लेकिन सुबह से भूखे इन लोगों को लग रहा था कि कहीं ऐसा ना हो सुबह की तरह खाना फिर खत्म हो जाए और  वो भूखे रह जाएं । हालांकि थोड़ी देर बाद स्थानीय विधायक के आने के बाद उनके कहने पर लोग कतार में थोड़ी दूरी बनाकर खड़े हो गए ।

ऐसे में ये समझा जा सकता है कि जो मजदूर दिल्ली से बाहर नहीं जा रहे हैं और अपनी सामाजिक जिम्मेदारी को पूरी तरह निभाने की कोशिश कर रहे हैं उनके सामने क्या चुनौतियां । लिहाजा सरकार को चाहिए कि पहले तो जहां खाना मिल रहा है वहां ये सुनिश्चित किया जाए कि जो भी सेंटर पर आएगा उसको खाना मिलेगा । दूसरा ये कि गेट के बाहर लोगों के खड़े होने के लिए गोल घेरे का निशान बनाया जाए जिससे लोग बिना कहे आकर अपनी जगह खड़े हों और तीसरी और जरूरी बात ये कि ऐसे लोग जो खाने के बाद सड़क पर रहने को मजबूर हैं उनके लिए किसी स्कूल या फिर किसी और जगह सुरक्षित रात बिताने का इंतजाम किया जाए । इससे पहले कि इनका भी यकीन सरकार से उठ जाए और बाकी लोगों की तरह ये भी अपने घर के लिए निकल पड़े । अगर ऐसा हुआ तो सरकारों की मुश्किलें और बढ़ेंगी और फिर हालात को काबू कर पाना मुश्किल होगा और लॉकडाउन और लंबा खींचना पड़ेगा जो लोगों की मुश्किलें कम करने की बजाय और बढ़ेगा ।