ब्रह्मानंद ठाकुर

मुज़फ्फरपुर जिले के औराई प्रखण्ड में आने वाले जनाढ पंचायत का एक गांव है बेनीपुर जो समाजसेवी, पत्रकार और साहित्यकार बेनीपुरी के नाम पर पड़ा है । 23 दिसम्बर 1899 को रामवृक्ष बेनीपुरी इसी गांव में पैदा हुए थे । शुक्रवार को उनकी 116वीं जयंती मनाई गई । बेनीपुरी से गहरा लगाव होने के नाते सर्द सुबह में कोशों दूर बागमनी नदी को पार कर मैं भी पहुंच गया बेनीपुर गांव । मुझे लगा कहीं मैं अकेला तो नहीं जो इतनी सुबह अपना घर बार छोड़ यहां आ रहा हूं लेकिन जैसे ही गांव के नजदीक पहुंचा तो पता चला मुजफ्फरपुर ही नहीं बल्कि आसपास के जिले से बड़ी संख्या में लोग बेनीपुरी को याद करने उनके पैतृक गांव आ रहे थे । खैर गांव पहुंचा तो सोचा कुछ महीने पहले जब यहां आया था उसके मुकाबले स्थिति में थोड़ा तो बदलाव हुआ होगा लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ ।

बेनीपुरी की प्रतिमा उसी तरह जमीन में गरीब 10 फीट नीचे गड़ी हुई है ऐसा लग रहा था जैसे एक महान साहित्यकार समाज और सरकार की हालत को देखकर जमीन में समा जाने को आतुर हो । हालांकि ये हालात भी सरकार और समाज की बेरुखी की वजह से ही हुआ है जो बेनीपुरी के स्मारक और उनकी विरासत को संजोने की बजाय नदी के सिल्ट में डूबने के लिए छोड़ दिया है । रामबृक्ष बेनीपुरी ने बड़ी शिद्दत से जो मकान बनवाया था और जिसे वे अपना स्मारक कहा करते थे, वह आज बागमती की बाढ में बह कर लायी गयी मिट्टी से खिडकी तक जमींदोज हो गया है। उनकी प्रतिमा जो कभी जमीन की सतह से 15फीट ऊंची थी अब मात्र ढाई -तीन फीट उंची रह गयी है ।

बेनीपुरी के बेटे डाक्टर महेन्द्र बेनीपुरी ने बताया की गांव और बेनीपुरी की धरोहर को बचाने को लेकर बिहार सरकार से कई बार अनुरोध किया गया लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ । अब आलम ये है गांव के पास बने बेनीपुरी रेलवे हॉल्ट का नाम बदलने से गांव को लोगों काफी नाराज हैं । लेकिन राज्य और केंद्र सरकार को इसकी परवाह नहीं ।

खैर कलम के जादूगर रामबृक्ष बेनीपुरी की 116वीं जयंती के मौके पर बेटे डॉक्टर महेन्द्र बेनीपुरी के प्रयास से प्रकाशित लाल चीन, लाल रूस, रूस की क्रांति, कार्लमार्क्स की जीवनी समेत उनकी 6 पुस्तकों का विमोचन किया गया । कार्यक्रम में शिरकत करने वाले वक्ताओं ने बेनीपुरी को समाजवादी चेतना से लैस और किसान, मजदूरों, छात्र, नौजवानों और महिलाओं की बेहतरी के लिए आजीवन संघर्ष रत रहने वाला साहित्यकार बताया । साथ ही बागमती परियोजना से पूरी तरह विस्थापित हो चुके बेनीपुर और बेनीपुरी जी के स्मारक को बचाने में सरकारी उपेक्षा के प्रति क्षोभ भी व्यक्त किया गया । । बेगुसराय प्रगतिशील जनवादी लेखक संघ के भगवान सिंह ने इस अवसर पर राष्ट्र कवि दिनकर की पंक्ति ‘मुझे गुण ने नहीं गोत्र ने मारा है ‘उद्धृत करते हुए कहा कि आज जातिवाद सम्प्रदायवाद का जहर इतना फैल गया है कि सत्ता में बैठे लोग साहित्यकारो को भी उसी नजरिए से देखने लगे है ।बेनीपुरी की विरासत को यदि बचाना है सरकारी तंत्र पर निर्भर रहने के वजाय उन लोगों को आगे आना होगा जिनके लिए बेनीपुरी जी ने बेहतरी का सपना देखा था । जनता के लेखक को जनता ही बचा सकती है, आज के राजनेता नहीं ।

brahmanand


ब्रह्मानंद ठाकुर/ बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के रहने वाले । पेशे से शिक्षक फिलहाल मई 2012 में सेवानिवृत्व हो चुके हैं, लेकिन पढ़ने-लिखने की ललक आज भी जागृत है । गांव में बदलाव पर गहरी पैठ रखते हैं और युवा पीढ़ी को गांव की विरासत से अवगत कराते रहते हैं ।

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