अनिल पांडेय

कभी बाल मजदूर रहे सुनील और शिवम के जज्बे को सलाम। दोनों मेरे बहुत प्रिय हैं। दोनों से मिल कर मन में सकारात्मक उर्जा का संचार हो जाता है। जिंदगी की अंधेरी सुरंग से निकल कर अब ये दोनों अपने सपने पूरे करने में जुटे हुए हैं। दोनों ने अपने सपनों की एक मंजिल पार भी कर ली है। सुनील और शिवम इंजीनियर बन गए हैं। दोंनो ने बीई (इलेक्ट्रिकल्स) की परीक्षा पास कर ली है। शिवम ने तो एमटेक में दाखिले की प्रवेश परीक्षा के साथ-साथ स्कॉलरशिप की भी परीक्षा पास कर ली है।

सुनील ईंट भट्टे पर बंधुआ मजदूर था तो शिवम एक ढ़ाबे पर बाल मजदूरी करता था। दोनों को करीब 15 साल पहले नोबेल शांति पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी ने छुड़ाया और पढ़ने लिखने के लिए प्रेरित किया। दोनों ने बचपन बचाओ आंदोलन की ओर से संचालित और  सत्यार्थी द्वारा स्थापित “बाल आश्रम” में रह कर 12वीं तक पढाई की। फिर कड़ी मेहनत से इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा पास कर राजस्थान के एक इंजीनियरिंग कालेज में दाखिला लिया।

सुनील बिहार का रहने वाला है। उसके पिता ईंट भट्टे पर मजदूर थे। मां खेतिहर मजदूर। भट्टा मालिक की राशन आदि की दुकान थी। राशन का कर्ज बढ़ गया तो इस उधार के बदले भट्टा मालिक सुनील को घर से उठा कर ले गया और काम पर लगा दिया। जबकि राजस्थान का रहने वाला शुभम जब 10 साल का था तो उसके पिता की मानसिक स्थिति खराब हो गई। ऐसे में शुभम को ढाबे पर काम करना पड़ा।

सुनील और शुभम ने बाल मजदूरी के दौरान अपने मालिकों से जो यातना सही, उसकी कल्पना नहीं की जा सकती। दोनों उस यातना को याद कर आज भी सिहर जाते हैं। दूसरों का बचपन उनकी तरह गुलाम न रहे, इसके लिए दोनों कालेज के दिनों से ही इसके खिलाफ अभियान चला रहे हैं। दर्जनों बच्चों को बाल मजदूरी से छुड़ा कर उनका स्कूल में दाखिला भी कराया है। सुनील और शिवम देश के नौजवानों के लिए एक मिसाल हैं कि कैसे सामाजिक सरोकारों के साथ अपने सपनों को भी जिया जा सकता है।


अनिल पांडेय। घुमक्कड़ पत्रकार, ये विशेषण खुद अनिल पांडेय अपने लिए इस्तेमाल करते हैं। जनसत्ता, द संडे इंडियन, न्यूज बेंच और स्टार न्यूज जैसे मीडिया संस्थानों में वरिष्ठ पदों पर रहे। अध्ययन, शोध और अध्यापन की अभिरूचि की वजह से कई शैक्षणिक संस्थाओं से भी आपका नाता रहा। समाज सेवा की धुन की वजह से योगी वाले भावे से भटकना ही इस राहगीर को पसंद है।

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