शंभु झा

दोस्तो, 

समाज में सार्थक और सकारात्मक बदलाव के लिए वैल्यू एजुकेशन एक बुनियादी जरूरत है। लेकिन हमने विकास का जो मॉडल अपनाया है, उसमें समाज के बहुत बड़े भाग को अच्छी तालीम से वंचित होना पड़ रहा है (या कहा जाए, उन्हें वंचित रखा जा रहा है)। देश के लाखों बच्चे  स्कूल का मुंह नहीं देख पाते हैं या फिर प्राइमरी स्कूल में ही पढ़ाई छोड़ कर भूख की भट्टी में अपना बचपन झोंकने को मजबूर हो जाते हैं। इसके लिए कौन जिम्मेदार है ? जवाब है- हम सब। आखिर ये सिस्टम हमने ही तो बनाया और अपनाया है। और सबसे दिलचस्प बात ये है कि हम दिन रात इस बात के जुगाड़ में लगे रहते हैं कि हमारे बच्चे इस सिस्टम के शिकार नहीं बनें। हमारी जद्दोजहद इस बात के लिए होती है कि हमारे बच्चे अच्छी से अच्छी शिक्षा हासिल करें और पढ़-लिख कर तथाकथित ‘बड़े आदमी’ बनें। ऐसा ‘बड़ा आदमी’, जिसके आगे बाकी लोग छोटे और बौने नज़र आएं। ‘छोटे लोग’ कौन होंगे, वो जिन्हें बचपन में क्वालिटी एजुकेशन नहीं मिली इसलिए वो कभी अपना करियर गढ़ ही नहीं पाए।

अब सवाल है कि आखिर बदलाव कैसे होगा। ये सवाल मुझे काफी अरसे से परेशान कर रहा है। जवाब आसान नहीं है क्योंकि समस्या समंदर जैसी विशाल और गहरी है। लेकिन जिस तरह भगवान राम जब समुद्र पर सेतु बना रहे थे तो एक नन्ही सी गिलहरी ने उनकी मदद की थी, उसी तरह हम भी समाज में ठोस बदलाव के लिए गिलहरी जैसी छोटी सी, मगर महत्वपूर्ण, कोशिश कर सकते हैं।

क्या किया जाए ?

मेरा सुझाव है कि हम ‘बदलाव’ संस्था के तहत वंचित और उपेक्षित बच्चों के लिए सपोर्ट करने के लिए एक मिशन शुरू करें। शुरुआत में हम प्राइमरी क्लास (पहली से पांचवीं) क्लास के एक बच्चे को चुनें। ऐसा बच्चा, जो पढ़ाई में दिलचस्पी रखता हो लेकिन उसके पास संसाधनों की दिक्कत हो। बच्चे का टेस्ट लिया जाए, अगर वो इसमें पास हो जाता है तो फिर हम उसे 12 वीं क्लास तक लगातार हर महीने छात्रवृत्ति देने का वचन देंगे ताकि पैसों की कमी की वजह से उसे पढ़ाई छोड़नी ना पड़े।

कैसे किया जाए ?

प्राइमरी क्लास के बच्चे को हर महीने 1000 रु. छात्रवृत्ति दी जाए। अगर बदलाव के सिर्फ 20 साथी हर महीने सिर्फ 50 रु. की सहयोग राशि देने को तैयार हो जाएं तो ये रकम जुटाना मुश्किल नहीं होगा। 50 रुपये की राशि हमारी या आपकी जेब पर बोझ नहीं डालेगी, लेकिन इससे एक बच्चे की लाइफ़ बन जाएगी। लेकिन हर महीने 50 रु. का कमिटमेंट करने से पहले एक और बात समझ लेना जरूरी है। अगर हम किसी प्राइमरी के बच्चे को 12 वीं क्लास तक सपोर्ट करने का संकल्प लेते हैं तो उसकी छात्रवृत्ति राशि को लगातार बढ़ाना होगा। आप किसी बच्चे को अगर 2017 में 1000 रु. की सहायता दे रहे हैं तो शायद उसका काम चल जाए, लेकिन 2022 में यह राशि कम पड़ सकती है क्योंकि एक तो महंगाई बढ़ेगी, साथ ही, वो बड़ी क्लास में जाएगा या जाएगी तो उसके खर्चे भी बढ़ेंगे।
एक मोटा अनुमान है कि महंगाई हर साल करीब 10 फीसदी की दर से बढ़ती है तो हमें भी हर साल 10 फीसदी की दर से सहायता राशि को बढ़ाते रहना चाहिए। जैसे अगर पहले साल में 1000 रु. की स्कॉलरशिप है तो दूसरे साल 1100 रु, तीसरे साल 1200 रु.। इसी लिहाज से आपके द्वारा देय सहयोग राशि भी बढ़ जाएगी। यानी पहले साल 50 रु. प्रति महीना। दूसरे साल 55 रु. प्रति महीना। तीसरे साल 60 रु. प्रति महीना और दस साल बाद 100 रु. प्रति महीना। यानी आपको न्यूनतम 50 रु. और अधिकतम 100 रु. की राशि प्रति माह देनी होगी। इसलिए टेंशन की कोई बात नहीं है। अगर 20 से ज्यादा साथी इस मिशन से जुड़ कर सहयोग राशि देने के लिए तैयार हो जाते हैं, तो हम और ज्यादा बच्चों को इस मिशन के तहत सपोर्ट कर सकते हैं।

विशेष

बदलाव की वेबसाइट पर हर सहायता प्राप्त बच्चे का एक पेज होगा। उस बच्चे की एजुकेशनल और ओवरऑल ग्रोथ को ट्रैक किया जाएगा। बदलाव की एक टीम उस बच्चे के परिवार के संपर्क में रहेगी और इस बात को सुनिश्चित करेगी कि जो सहायता राशि उसे मिल रही है, उसका सही उपयोग हो।
निवेदन- यह मेरा प्रस्ताव है। बस एक ख्याल है, आप सब बताइएगा कि आप इससे किस हद तक सहमत या असहमत हैं। 


sambhuji profile

शंभु झा। महानगरीय पत्रकारिता में डेढ़ दशक भर का वक़्त गुजारने के बाद भी शंभु झा का मन गांव की छांव में सुकून पाता है। दिल्ली के हिंदू कॉलेज के पूर्व छात्र। आजतक, न्यूज 24 और इंडिया टीवी के साथ लंबी पारी। फिलहाल न्यूज़ नेशन में डिप्टी एडिटर के पद पर कार्यरत। 

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