ब्रह्मानंद ठाकुर

बदलाव पाठशाला, पियर, मुजफ्फरपुर

पिछले साल 2 अक्टूबर को टीम बदलाव के साथियों की पहल और प्रेरणा से मुजफ्फरपुर जिले के अपने गांव पियर में हमने बदलाव पाठशाला की शुरुआत की।  शिक्षा में उपेक्षित और अपेक्षित वर्ग के  6-13 बर्हीष आयुवर्ग के  तब 9 लड़के -लड़कियों को लेकर इस पाठशाला की शुरुआत हुई। आठ महीने होने को हैं पाठशाला में 16 छात्र पढ़ रहे हैं। इस अवधि में अनेक समाजसेवी, शिक्षाप्रेमियों  ने पाठशाला के लिए पुस्तकें, बच्चों की यूनिफार्म और खेल सामग्री उपलब्ध करा कर उत्साहवर्द्धन किया है।

बदलाव पुस्तकालय विशेष

गत 26 जनवरी को बदलाव पाठशाला के लिए एक छोटा-सा पुस्तकालय भी स्थापित किया गया। इस पुस्तकालय के लिए अनेक लेखकों, साहित्यकारों ने पुस्तकें उपलब्ध कराईं। कल रात  करीब नौ सवा नौ बजे  न्यू जर्सी ( यूएसए )से  भारतीय मूल ( किशनगंज, बिहार ) के युवा कम्प्युटर इंजीनियर प्रेम पियुषजी का फोन आया – ‘  प्रणाम। मैं यूएसए से प्रेम पियूष बोल रहा हूं। मैं बदलाव पाठशाला के लिए अपनी पूजनीया माता जी के नाम से एक पुस्तकालय स्थापित करना चाहता हूं। इसके लिए मैंने बालोपयोगी ज्ञानवर्द्धक पुस्तकें, आलमीरा, स्टेशनरी वगैरह उपलब्ध कराने का निश्चय किया है। आप अपना डाक का पता और उपयोगी पुस्तकों की सूची हमें उपलब्ध कराने की कृपा करें।’

मैं प्रेम पियूष जी से बात करते  हुए इतना अभिभूत हो गया कि लग ही नहीं रहा था कि मैं यूएसए के एक कम्प्युटर इंजीनियर से बात कर रहा हूं। मानवीय संवेदनाओं से लवरेज प्रेम पियूष जी का प्रत्येक शब्द मुझे उनके निकट खींचता जा रहा था। लगा कि अपने घर का ही कोई युवक बदलाव के इस मुहिम में अपना बहुमूल्य योगदान करने को तत्पर है। चिंता भी हुई कि क्या मैं ऐसे लोगों की उम्मीदों पर खड़ा उतर पाऊंगा, जिस उम्मीद से सात समुन्दर पार बैठा यह युवा इंजीनियर टीम बदलाव की इस मुहिम में अपने सहयोग का हाथ बढा रहा है।

मैंने बात पियूष जी की पारिवारिक पृष्ठभूमि जानने से शुरू की। पियूष जी अपनी माताश्री  मीनूजी  के नाम से यह पुस्तकालय का एक सेक्शन विकसित करना चाहते हैं। उन्होंने बताया कि वे आज जिस मुकाम पर हैं, इसमें उनकी माता जी का बड़ा योगदान है। वे एक सरकारी विद्यालय में शिक्षिका थीं। 2009 में सेवानिवृत हो चुकी हैं। मैं भी तो 2012 में सरकारी स्कूल से सेवानिवृत हो चुका हूं। इस लिहाज से वे मुझसे वरिष्ठ हैं। पियूष जी से बात करते हुए मेरा सिर उनकी माताजी के प्रति श्रद्धा से झुक गया। सोचा, मातृ दिवस के अवसर पर एक पुत्र का अपनी मां  के प्रति इससे बड़ा उपहार और क्या हो सकता है?

बात आगे बढी। पियूष 8  साल के थे तो अपने साथियों के साथ खेलना छोड़,दौड़ते हुए चले जाते थे गांव के पुस्तकालय में और घंटों वहां पुस्तकें पढा करते थे। उनमें स्वध्याय के प्रति यह ललक उनकी माताजी ने ही पैदा की। स्वयं शिक्षित होने के साथ साथ दूसरों को भी शिक्षित करने की प्रेरणा इनको उन्हीं से मिली है। इसी का प्रतिफल है कि प्रेम पियूष जी ने यूएसए में रहते हुए भी बिहार के सुदूर गांव पियर ( मुजफ्फरपुर )  में संचालित बदलाव पाठशाला में अपनी मां के नाम पर पुस्तकालय का एक सेक्शन बनाने में दिलचस्पी दिखाई है। मातृ दिवस पर एक होनहार पुत्र का अपनी मां के प्रति  इस तरह का कृतज्ञता ज्ञापन विरले ही देखने को मिलता है।

बदलाव के साथियों को ये भी बताना चाहूंगा कि पियुषजी के मुताबिक करीब 3000 (तीन हजार रुपये) की पुस्तकें उन्होंने एमेजॉन और ऐसी ही दूसरी वेबसाइट के जरिए पियर गांव भिजवा दी हैं। इसके अलाव करीब सौ पुस्तकों की सूची उन्होंने मुझसे मांगी है, जिसमें मैं जुटा हुआ हूं। पुस्तकों को लेकर आप भी कुछ सुझाव मुझसे या पियुषजी से साझा कर सकते हैं।


ब्रह्मानंद ठाकुर। बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के निवासी। पेशे से शिक्षक। मई 2012 के बाद से नौकरी की बंदिशें खत्म। फिलहाल समाज, संस्कृति और साहित्य की सेवा में जुटे हैं। मुजफ्फरपुर के पियर गांव में बदलाव पाठशाला का संचालन कर रहे हैं।

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