डॉक्टर प्रीता प्रिया

बचपन के दिन 
बिताए हैं मैंने 
सूरज की किरणों की डोली पर
चंदा के पलने पर मैंने
 बचपन की रात गुजारी है 
बचपन में मैंने जीवन की 
कुछ काली-काली स्लेटों पर
मस्ती से, लापरवाही से 
उजली रेखाएं खींची हैं,
पीली रेखाएं खींची हैं,
नीली रेखाएं खींची हैं 
सतरंगे सपने देखे हैं
बचपन की काली स्लेटों पर
जीने के अक्षर सीखे हैं
इस बचपन की नादानी में 
मैंने तो काले पर्दे पर
उजली तस्वीर उतारी है 
सौ बार भंगरिया की पत्ती से
स्लेटों की 
रेखाएं मैंने पोंछी हैं 
जिन शब्दों को सीखा उनको 
निर्मम हो होकर पोंछा है 
बचपन में माँ के आंचल की
छाया में आँखें मीची हैं 
उजली साड़ी के धागों ने 
यह फसल उमर की सींची है 
बचपन से भूल भुलैया में 
लपटाने की अभ्यासी हूं 
चलती हूं जब- जब 
पाँवों से नादानी होने लगती है 
जब कदम बहकने लगते हैं
मैं ही मुस्काने लगती हूँ
इस आंखमिचौनी  का बचपन
जब कभी याद आ जाता है 
तो जाने अनजाने 
बचपन की घाटी में 
मैं पाँव बढ़ाने लगती हूँ 
काली स्लेटें
मुस्कानों की रेखा से 
उजली होती हैं
 जब भी बचपन मुस्कुराता है 

तब मौत सहमने लगती है


डॉक्टर प्रीता प्रिया। मुजफ्फरपुर, बिहार की निवासी डॉ प्रीता प्रिया इन दिनों हलद्वानी में रहती हैं। साहित्यिक अभिरुचि। रचनात्मक संसार में खुशियां बटोरने की कोशिश।

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