विकास मिश्रा

बाबूजी से मिलकर गांव से लौटा हूं। करीब सात महीने बाद मिला, 93 साल की उम्र हो चली है। उम्र का असर दिमागी और जिस्मानी दोनों तरह की सेहत पर पड़ रहा है। सुना था कि बुढ़ापे में बचपना लौटता है। इस बार वो लौटा हुआ बचपन बाबूजी के भीतर देखकर आया हूं। एक ही सवाल कई बार पूछते हैं। बीस बार तो पूछा ही होगा-समन्वय किस दर्जे में पढ़ रहे हैं, कहां पढ़ रहे हैं..? एक सवाल ऐसा पूछ लिया, जिस पर मैं चौंक पड़ा, बाबूजी ने पूछा-अरे नतिया का जनेऊ कब करोगे..? मैंने कहा-याद नहीं है क्या, साढ़े तीन साल पहले ही जनेऊ हो गया था। फिर हंसने लगे, बोले- हां हां, जनेऊ तो हो ही गया। ऐसे ही 20 बार पूछे- निरुआ (मेरी भतीजी नीरू) का करति बा हो..? मैं जवाब देता-बाबूजी नौकरी करति बा। फिर पूछते-कहां..? मैं कहता-मोबाइल कंपनी में है। हंसते हुए फिर पूछते-तनख्वाह पावेले..? मेरे हां कहते ही हंसने लगते। कई बार तो उनके प्रश्नों का क्रम दूसरे सिरे से शुरू हो जाता-का हो, नतिया 12वीं में पहुंचि गईल..? (नाती 12वीं कक्षा में पहुंच गया..?) नीरू के बारे में पूछते- तब बतावा, निरुआ त नौकरी करति बा। मैं कहता-हां बाबूजी। फिर पूछते-मोबाइल कंपनी में..? मैं-हां बाबूजी। समय का पहिया जैसे घूम गया था। कभी मैंने भी बचपन में उनसे ऐसे ही सवाल पूछे होंगे, एक ही सवाल बार बार पूछे होंगे, तब शायद बाबूजी ने भी बिना खीझे ऐसे ही जवाब दिए होंगे।

हाल फिलहाल की बातें बाबूजी की स्मृति पटल से भले ही आती-जाती रहती हों, लेकिन अतीत की तमाम यादें उनके जेहन में ताजा हैं। मां से जुड़े कई संस्मरण उन्होंने सुनाए। क्षेत्र-जवार के तमाम किस्से-कहानियां सुनाईं। जीवन का एक मंत्र भी बताया। बोले- ‘सफल जिंदगी का सबसे बड़ा सूत्र ये है कि जितनी औकात हो, उससे आधा ही अपना मानो और उसके भी आधे में रहो, सुखी रहोगे।’
बाबूजी कभी अकेले नहीं रहे, घर पर यूं तो ज्यादा टिकते नहीं थे, इलाके में घूमने के लिए रोजाना उनका घोड़ा तैयार रहता था। दूसरे गांवों का झगड़ा निपटाने भी जाते थे। मान सम्मान इतना ज्यादा था कि उनकी बात को ही इंसाफ माना जाता था। कभी गोरखपुर, बनारस, बस्ती की सैर पर भी जाते थे। अब ठंड में कमरे में रहते हैं। बहुओं को हर घंटे आवाज देते हैं। छोटी बहू (मेरे छोटे भतीजे की पत्नी) से उनका खूब मजाक चलता रहता है। वो पूछती-अभी तो पान लेकर आई थी। बाबूजी कहते-बस तुम्हारा हंसता हुआ चेहरा देखने के लिए बुलाए थे। बहू गई तो बोले-क्या करूं, अकेले रहने की आदत नहीं रही। तुम्हारी मां जब तक थी, अकेलापन कभी महसूस नहीं हुआ।
घर पर पता चला कि करीब महीने भर पहले बाबूजी की तबीयत खराब हो गई थी। थोड़ी कमजोरी हो गई थी। बोले-बुधवार को मैं जाऊंगा। भतीजे ने पूछा-कहां जाएंगे। बोले-अब भगवान के पास जाऊंगा। घर में खलबली मच गई। थोड़े स्वस्थ हुए, बोले-अब बड़े वाले पनाती का जनेऊ देखकर ही जाऊंगा।

जहां तक अपना बचपन याद आता है, वहां से सफेद घोड़े पर बाबूजी के आगे खुद को बैठा देखता हूं। कहीं बाहर से आते तो लौटकर हम बच्चों को थोड़ी दूर तक घोड़े पर सैर करवाते। उनका एक घोड़ा बहुत बदमाश था, उनको देखते ही खूंख्वार हो जाता था। उसे दो लोग पकड़े रहते थे, तब बाबूजी उस पर चढ़ते। फिर कुछ ही देर में उसे काबू में ही कर लेते। आसपास की जमींदारियों में उन सा कोई घुड़सवार नहीं था, बदमाश से बदमाश घोड़े हमारे यहां सुधरने आते थे। अच्छा खासा कद, पूरे हट्ठे-कट्टे थे बाबूजी। उनका वो रूप अभी भी जेहन में ताजा है और जब जरावस्था में उन्हें देखता हूं तो एक टीस सी उठती है। अपनी उम्र के हिसाब से बाबूजी पूरी तरह ठीक हैं। अपने हाथ पांव पर हैं।
मेरी मां की जब मृत्यु हुई थी, तबसे लेकर अब तक मैं असमंजस में हूं कि आंसू बहाऊं या खुश होऊं। बहुत स्वाभिमानी महिला थी मेरी मां, कभी मजबूरी में किसी के हाथ से एक गिलास पानी तक नहीं पिया। जिंदगी के आखिरी दिन मां मुझसे आधे घंटे फोन पर बात करके खाना खाने गई थी, खाकर लौटी, फिर पान लगाकर खुद खाया, पंडित जी को भी खिलाया। इसके दो मिनट के बाद ही शरीर कांपा, पल भर में पिंजरा खाली हो गया, पंछी उड़ गया। बिना किसी कष्ट के गई। कहती थी अस्पताल से नहीं अपने चौखट से जाऊंगी। वो जैसा चाहती थी, वैसे ही गई।

मृत्यु तो जीवन का अंतिम सत्य है। बाबूजी 93 साल के हो रहे हैं, जिंदगी की शाम ढल रही है। उनकी छाया खुद से हटने की कल्पना ही सिहरा देती है, लेकिन मैं कभी नहीं चाहूंगा कि वो कभी बिस्तर पर बेहाल पड़ें। अपने हाथ पैरों की ताकत के साथ दुनिया को अलविदा कहें। जैसे मेरी मां गई थी, वैसे ही पूर्ण आनंद में जाएं।

बाबूजी के भीतर अब मुहब्बत हिलोर मारती है। अब सबको आशीर्वाद देते हैं-हंसते रहो, हंसाते रहो। मैं घर से चलने लगा तो गला रुंधा हुआ था। बाबूजी से गले मिला। उन्होंने माथा चूमा, बोले-मुहब्बत का पेट कभी भरता नहीं है। आए बहुत अच्छा लगा, जा रहे हो तो गाना याद आ रहा है-अभी ना जाओ छोड़कर कि दिल अभी भरा नहीं….। मैं रुक नहीं पाया, रुकता तो आंखों की बरसात न रुकती।


विकास मिश्रा। आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ संपादकीय पद पर कार्यरत। इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन के पूर्व छात्र। गोरखपुर के निवासी। फिलहाल, दिल्ली में बस गए हैं। अपने मन की बात को लेखनी के जरिए पाठकों तक पहुंचाने का हुनर बखूबी जानते हैं।