Author Archives: badalav - Page 2

यूपी/उत्तराखंड

गरीब उद्यमियों के सपनों के साथ ‘न्याय’ कीजिए

निखिल कुमार दुबे के फेसबुक वॉल से साभार अर्थशास्त्र मेरा विषय नहीं है।नोबल प्राप्त एक्सपर्ट पर कॉमेंट करूँ इतना ज्ञान भी नहीं है,पर एक सामाजिक अनुभव है। अपने छोटे से…
और पढ़ें »
मेरा गांव, मेरा देश

अब तो उनको दुआ से भी डर लगता है

पशुपति शर्मा के फेसबुक वॉल से साभार अल्लामा इकबाल ने एक कविता लिखी थी, बच्चे की दुआ। पीलीभीत के एक स्कूल के प्रिंसिपल साहब ने इसे प्रार्थना सभा में शरीक…
और पढ़ें »
गांव के नायक

ज़िंदगी ‘किताब’ हो गई… चलो झांक आएं आलोक के सपनों की दुनिया

पीयूष बबेले उनके भीतर एक घड़ी है, जो लगातार काम की रफ्तार को सांसों की रफ्तार से तेज किए रहने को आतुर है. मैं जब भी घंटी बजाता हूं तो…
और पढ़ें »
माटी की खुशबू

ग्रीस मेट्रो में ‘गायब पर्स’ और ‘जय हिंद’ के हिलोरे

सच्चिदानंद जोशी पुणे जाना था। हमेशा की तरह आफिस से निकलते निकलते देर हो गयी। शाम के समय फ्लाइट पकड़ना हो खास कर सात साढ़े सात वाली तो ये यक्ष…
और पढ़ें »
मेरा गांव, मेरा देश

‘जंजीर ‘ से ‘चीनी कम’ तक खयाल आता है…

प्रवीण कुमार अमिताभ तमाम खूबियों के बीच दृढ़-संकल्प, सहज , हर मौसम में काम करने वाले इंसान के कारण अजीज लगते हैं. वह पुरुषार्थ का जीता-जागता उदाहरण है. उनकी असफलता,…
और पढ़ें »
परब-त्योहार

इस पल का कोई मोल नहीं

अखिलेश कुमार के फेसबुक वॉल से साभार बच्चों को कहानियां सुनाने का अपना अलग ही मजा है । फिर से बचपन जीने का मौका लग जाता है । ऐसे मौकों…
और पढ़ें »
चौपाल

मानसिक रोगियों की सुध कब लेगी बिहार सरकार ?

पुष्य मित्र आज विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस है। इस मौके पर आपसे एक सूचना साझा करना है कि रांची के कांके स्थित मानसिक आरोग्यशाला में बिहारी मरीजों का इलाज करने…
और पढ़ें »
सुन हो सरकार

गांव पुरैनी में ‘मन का रावण’ जलाएंगे क्या लोग?

पशुपति शर्मा पुरैनी मेरा पुश्तैनी गांव। अब गांव आना-जाना कम ही होता है। बाप-दादा की पुश्तैनी संपत्ति अब वहां रही नहीं। पुरैनी बाजार में एक छोटा सा पुश्तैनी मार्केट पिताजी…
और पढ़ें »
माटी की खुशबू

विकास की अंधी दौड़ में प्रकृति से दूर होता इंसान

  ब्रह्मानंद ठाकुर गांधी और व्यावहारिक अराजकवाद सिरीज के अन्तर्गत  अभी तक आप विभिन्न अराजकवादी  चिंतकों के विचारों   से अवगत हुए।  महात्मा गांधी के व्यवहारिक अराजकवाद पर भी उनके विचारों…
और पढ़ें »
परब-त्योहार

शब्दों की हिंसा फैलाने वालों से भी ‘संवाद’ करना होगा

प्रवीण कुमार लगातार बातों, गरमा-गरम बहसों के दौर मेंसबसे खतरनाक है, सब कुछ सुनकर भी चुप रह जाना ठोस अनुभवों से कह सकता हूं कि हम एक बड़े मंथन के…
और पढ़ें »